Sunday, January 17, 2010

अटूट


विश्वास नहीं फिर भी छूटा

जिसको था अपना जाना
जिसको था अपना माना
मदहोश किया उसी ने पहले
और सभी कुछ लूटा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जिसने था मेरा सच जाना
जिसने था मन को पहचाना
आँखें फेरी उसी ने पहले
और कहा फिर झूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जीने की अपनी शैली थी
मस्ती की अपनी रंगरेली थी
मुझको छीना मुझसे तूने
कैसा ये प्रयोग किया अनूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
हम तो फिर भी जी ही लेंगे
अपने आँसू पी ही लेंगे
पश्चातापों के साए नीरव

ताउम्र करेंगे तेरा ही पीछा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।