Friday, October 18, 2013

शरद-पूर्णिमा, नहीं!



जब-जब
तुम अपना वजूद पहचानती हो
चमकते सूर्य की परछाई बन दमकता चाँद बनना नकारती हो
दुनिया में बढ़ जाती है शान, यकीन मानो,
चमक-दमक के इतर तुम अस्तित्व स्वीकारती हो
मेरे लिए स्वयं सूर्य बन जाती हो
मैं ऐश्वर्य नहीं ऐशवर्यपूर्ण सादगी पर मरता हूँ
शरद-पूनम नहीं,सघन-मावस मनाता हूँ
(कवि हूँ न. अँन्धेरों से रोशनी पाता हूँ)
जितनी भी हो खुद से हो रोशन तुम
मैं अपनी चमक को ढँक
तुम्हारे साथ तुम्हारा दिन गुजारना चाहता हूँ

Thursday, September 19, 2013

निचाट एकांत



बजता हो
भले संगीत
मुझे व्यवधान लगता है
हमारे बीच
..................
कुछ नहीं हमारे बीच
केवल रहें हम
निष्कवच
...............
कुछ जुमले तुम्हारे
मेरी हाँ-हूँ
कभी-कभी तो
लगते हैं
ये भी व्यवधान
करते व्यथित
...............
हम तुम जब अकेले हों
काश, हमेशा
बाकी हो तो केवल
रहसंलाप
हमारी आत्माओं के बीच



Thursday, September 12, 2013

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी


सब भर जाता है तो सब मर जाता है
खाली कर दो खुद को, तो वक्त लौट आता है

हार कर बैठना भी ईलाज है एक किस्म का
हर वक्त जीतने से, इसका मायना मर जाता है

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी
जिंदादिली से मरना भी, अमर कर जाता है

हम अपने ही प्रेत के होते हैं ग़ुलाम
गुज़रा हुआ तो भूत है, कहाँ लौट पाता है

वक्त जिया तो ठीक, गुज़ारा-गँवाया तो ठीक
हम जो मानें, बही-खाते में वही नजर आता है

Friday, September 6, 2013

ईजाद...!



मैंने ईजाद कर ली है
एक कला
शोर-गुल के बीच
ध्यानस्थ रहने की
तुम भी चाहो तो
इसे आजमा सकते हो,
शांति के लिए...
शहर हो या गाँव
बढ़ती ही जा रही है
आवाज़ें, चिल्लपों, शोर
कहीं वाहनों का, कहीं मशीनों, कहीं मशीनी-इंसानों का
हर कहीं, हर वक्त एक शोर-सा
मचा रहता है
हम चाहें तो भी नहीं बच पाते शोर से
नीरव शांति अब एक दुर्लभ सपना है,
मैंने खोज लिया है
तरीका एक नायाब
भीड़ में शांति तो नहीं
ध्यान लग जाता है,
चिड़चिड़ाहट नहीं होती
जब भी फँसता हूँ ऐसे शोर-ओ-गुल में
बस एक- किसी एक- आवाज़ पर
लगा देता हूँ ध्यान
गौर से सुनता हूँ, सुनने की कोशिश करता हूँ
वही एक आवाज़...
और अचानक
सब आवाज़ें जैसे दब जाती है
सुनाई पड़ती है वही एक आवाज़
और अंतत संगीत में बदल जाती है
कर्कशता से संगीत का यह
कमाल
भरी-भीड़ में, ट्रेफिक जाम में
रैलियों, शादियों, पार्टियों
हर कहीं अपना जज़्बा दिखाता है
और मैं भीड़ में मुस्कुराता नहीं, शांत दीखता हूँ

Monday, August 19, 2013

जीवनी-शक्ति



फूल-फल-टहनियाँ
कोंपल और तना
काटने से भी मरता नहीं
पेड़
जीवन
जड़ों में,
गहराई में होता है
तने और ऊँचाई
में नहीं

Sunday, August 18, 2013

रचना प्रक्रिया



मेरे मन की
चंचल नदी
के किनारे
-आँख मूँदे-
बैठा है एक
बगुला(भगत)
देखते ही मनमाफिक मछली
 मारता है झपट्टा
लेता है चोंच में उसे
और नया प्राण देता है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।