Tuesday, July 8, 2014

परिपक्वता




डूबती है-उतराती है-थाह पाती है
हर क्रिया का
करती है विश्लेषण
प्रतिक्रिया पे
ध्यान लगाती है
प्रत्येक विचार, भावना, कर्म, विश्वास, चिंतन
श्वास-प्रश्वास से
ऊर्जा, प्रकाश, चेतना और
विकास पाती है
उठती है उर्ध्वाधर
गहराई में विराम पाती है
.........................
तुम्हारे प्यार में
वैज्ञानिक-ऋषि-योगी बनकर
इस तरह मेरी दृष्टि
उत्तरोत्तर विस्तार पाती है.

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।