Monday, July 5, 2010

आज शहर बंद है

दूर तक बादलों के निशां नहीं, आसमान नफ़ासतपसंद है
मौसम भी है पहचानता, आज देशो-शहर बंद है

चलो भगाएँ बोरियत मिलकर, ऐसा कुछ नया करें
खोद दें कुछ नालियाँ, बहा दें पानी जो पोखरों में बंद हैं

तुम अपने में डूबे थे, मैं खुद में गिरफ्त
खोल दो खिड़कियाँ, गुम हो सीलन जो सीखचों में बंद है

खिलखिलकर हँस दो, बदल जाए मौसम का नज़ारा
यह चेहरा रेशमी, उदासी टाट का पैबंद है

रोज-रोज भीड़ में इतना रहना भी अच्छा नहीं
भूल गए तुम्हीं कहते थे, मुझे तनहाई बेहद पसंद है

रेंग-रेंग कर चल रही हैं, रफ्तारों की ख्वाहिशें
मुझे देर हो जाएगी आने में, आज शहर बंद हैं

2 comments:

  1. बहुत खूबसूरती से लिखा है इस बंद को भी....

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  2. बहुत सही अभिव्‍यक्ति !!

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।