Monday, February 8, 2010

बुझता दिया

ढलता जाता जीवन मेरा
जलता जाता तन-मन मेरा
मद्धम-मद्धम साँसे चलती
कंठ अवरूद्ध होता जाता
कुछ चलता कुछ गिरता
इस तरह है आलम मेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
पंखों को आहत कर
तुम तो अपनी राह हुए
अब कैसे मैं उड़ पाऊँगा
दूर बहुत है अभी बसेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
बुझता-बुझता दीपक हूँ मैं
उस पर तुम तूफाँ लाए
अब कैसे मैं जल पाऊँगा
दूर बहुत है अभी सवेरा
ढलता जाता जीवन मेरा

कर्मों से विश्वास उठा जब

भाग्य को मैंने मान लिया

सबकुछ शायद गलती मेरी

दोष नहीं है कुछ भी तेरा

ढल जाऊँगा जल्द सदा को

बस यादें ही रह जाएँगी

यादों को भी बिसरा देना नीरव

बदला पूरा होगा तेरा

ढलता जाता जीवन मेरा

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मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।