Tuesday, February 16, 2010

नियति का क्रूर व्यंग्य...


नियति का ये क्रूर व्यंग्य
तब मन से सहा नहीं जाए

जब कोई प्यासा पनघट आए
रीता कंठ और प्यासी आँखें लिए
पनिहारिन को न पाकर
लड़खड़ाता वापस पथ को जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...

उम्र भर जिसने पी हो मधु
साक़ी के हाथों ही मनुहारों से
टूटी-सी प्याली में हलाहल
उसको अंतिम बार पिलाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...

मन की शहनाई पर जिसने
हरदम राग खुशी का गाया हो
उसके अरमानों के आगे
मोम़िन मर्सिया गाने आए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...

सबकी राहों में बिखरे फूल
इस जतन में जिसने उम्र गवाँई
उस नीरव के सिर पर
ताज काँटों का पहनाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।