Sunday, March 21, 2010

खुशी से मर जाने के दिन

पंख लगाकर उड़ने के दिन आए

सतरंगी लगने लगी दुनिया
आसमाँ आ गया बाँहों में
रंगीन हुए नजारे, फ़िज़ा के
साथ झूमकर गाने के दिन आए
पंख लगाकर...

गुलशन में आ गई बहारें
मौसम खुशनुमा लगता कितना
तितलियों की तरह पंख लगाकर
फूलों पर मँडराने के दिन आए
पंख लगाकर...

एकाध प्याले से अब क्या होगा
प्यासा हूँ मैं जीवन भर का
जब साक़ी बन बैठे खुद तुम
पूरी मधुशाला ही पीने के दिन आए
पंख लगाकर...

जो पल बीते गेसू छाँव तले
जो दिन नीरव साथ गुजारे
उन लम्हों को भर आँखो में
खुशी से मर जाने के दिन आए
पंख लगाकर...

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।