Sunday, February 21, 2010

पत्थरदिल

अपने अंतर के खुशी और ग़म
घोल स्मृति प्याले में
मैंने कितने नग़मे गाए
तेरे मुँह से वाह न आई

तेरी खातिर इस दुनिया में
दिल पर कितने ज़ख़्म थे खाए
तुझको सब ये ज़ख़्म दिखाए
तेरे मुँह से आह न आई

तेरे प्यार की खातिर नीरव
जग में हम बदनाम हुए
दास्तां ए बरबादी सुनकर
तुझको मुझ पर चाह न आई

तेरी कोमल राहों पर भी
मैंने सदा बिछाया दिल
मैं चला राह पथरीली
तुझको मेरी परवाह न आई

हम तो फिर भी है दिलवाले
शिकवा करने न आएँगें
तू चल कर आएगी इक दिन
न काटा जाएगा दौर ए तन्हाई

1 comment:

  1. बहुत बढ़िया रचना, राजेश भाई.

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।