पंख लगाकर उड़ने के दिन आए
सतरंगी लगने लगी दुनिया
आसमाँ आ गया बाँहों में
रंगीन हुए नजारे, फ़िज़ा के
साथ झूमकर गाने के दिन आए
पंख लगाकर...
गुलशन में आ गई बहारें
मौसम खुशनुमा लगता कितना
तितलियों की तरह पंख लगाकर
फूलों पर मँडराने के दिन आए
पंख लगाकर...
एकाध प्याले से अब क्या होगा
प्यासा हूँ मैं जीवन भर का
जब साक़ी बन बैठे खुद तुम
पूरी मधुशाला ही पीने के दिन आए
पंख लगाकर...
जो पल बीते गेसू छाँव तले
जो दिन नीरव साथ गुजारे
उन लम्हों को भर आँखो में
खुशी से मर जाने के दिन आए
पंख लगाकर...
Sunday, March 21, 2010
छोड़ता हूँ साँसें
क्या जीत तुमने यदि जीता
मुझको मेरी दुर्बलता के क्षण में
पहले पहल विश्वास दिलाकर पास बुलाया तुमने मुझको
फिर अपने तीखे नयनों से
घायल कर डाला मन को
यह समर की नहीं रीत प्रिये
जीतना है तो
जीतो मुझे समरांगण में
क्या जीता तुमने..
दूर आसमां में उड़ते पंछी को
प्रीत का चुग्गा दिखाकर
बंद किया लौह पिंजरे में
प्रलोभनों का जाल बिछाकर
यदि सचमुच है मुझसे नेह
तो जाने दो मुझे अपने गगन में
क्या जीता तुमने...
एक प्यासा
देख सुराही पास
देख सुराही पास
आया था तेरी मधुशाला
क्या दोष था उस मतवाले का
जो पिला दिया उसको द्रव काला
भोले को पिला हलाहल कहते हो
है जायज़ सब प्यार और रण में
क्या जीता यदि....
अब तो साँसे उठती गिरती
जुबाँ भी लड़खड़ा रही है
जुबाँ भी लड़खड़ा रही है
तन पर कितने तीर चुभे
मन भी घाँवों से अटा है
अगले युग में तुमको जीतूगाँ नीरव
छोड़ता हूँ साँसें इसी प्रण में
Saturday, March 20, 2010
मेरे गीत पंछी गीत
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
एक पल गूँजे हवा में
दूजे पल हो गए हवा
अनगूँजे से रहे फिज़ा में
मेरे मीत ने क्या इन्हें सुना
किसी ने सुने तो बहका
किसी ने न भी सुने
किसी ने कर दिए
सुनकर भी अनसुने
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
है जब कोई सुनता नहीं
इन दर्द भरे गीतों को
क्यों गाकर मैं दुख अपनाता
प्यास भरी ये दर्दील धुनें
[मेरे गीत पंछी गीत की तरह
अपनी आँखों में भर बेचैनी
नभ में मैं मँडराता हूँ
कह नहीं देता क्यों आँखों से
अब ना कोई ख़्वाब बुनें
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
मेरे स्वर को नेह मिले यदि
गूँज उठे ये अखिल विश्व में
आज तो लेकिन कटू सत्य यह
छंद हैं आधे अधूरे अनमने
एक पल गूँजे हवा में
दूजे पल हो गए हवा
अनगूँजे से रहे फिज़ा में
मेरे मीत ने क्या इन्हें सुना
किसी ने सुने तो बहका
किसी ने न भी सुने
किसी ने कर दिए
सुनकर भी अनसुने
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
है जब कोई सुनता नहीं
इन दर्द भरे गीतों को
क्यों गाकर मैं दुख अपनाता
प्यास भरी ये दर्दील धुनें
[मेरे गीत पंछी गीत की तरह
अपनी आँखों में भर बेचैनी
नभ में मैं मँडराता हूँ
कह नहीं देता क्यों आँखों से
अब ना कोई ख़्वाब बुनें
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
मेरे स्वर को नेह मिले यदि
गूँज उठे ये अखिल विश्व में
आज तो लेकिन कटू सत्य यह
छंद हैं आधे अधूरे अनमने
Friday, March 19, 2010
तन्हाई के साथी
चुकने को है जीवन की मधुता
अब तो हलाहल हैं शेष रहा
कितनी जल्दी पी ली हमने
सुख के लम्हों की मदिरा
जाने को है मधुबाला अब तो
रीता मधुघट ही निःशेष रहा
कितना मधुमय था तब आलम
जब हम मधुशाला में आए
महफिल में जब हम थे साक़ी को
दूजा न कोई विशेष रहा
क्या खबर थी इतनी कम
होती है उम्र मतवालों की
मदहोशी में क्यों डूबे हम
क्यों न वक्त का हमको होश रहा
चुन लूँ खंडित सागर, टूटे प्याले
मधुमय यादें, मधुमय बातें
तन्हाई के यही साथी
मधुमय युग का इतना ही अवशेष रहा
पिएँगे हलाहल भी उतने ही प्यार से
जितने प्यार से पी थी मदिरा
यम पूछेगा अंतिम इच्छा नीरव
कहेंगे रख ले साक़ी का वेश जरा
Wednesday, March 17, 2010
खुद से हूँ अनजान
पहचान मेरी मुझको करा दे कोई
हरपल बदलते हैं आचार
हरपल बदलते हैं विचार
कारण इस परिवर्तन का आकर मुझे बता दे कोई
कभी सोचता हूँ, ये न करूँगा
कभी सोचता हूँ, ये ही करूँगा
परिभाषा मेरे कर्मों की मुझको अब समझा दे कोई
कभी देखा अँखियन में खुद को
कभी देखा दर्पण में खुद को
बदला-बदला सा लगा जब भी मुझको दिखा कोई
आँसुओं से प्यास बुझी कभी
कभी प्यासा लौटा मधुशाला से
हलाहल और मधु में अंतर मुझको बतला दे कोई
कभी भावशून्यता रही मन में
कभी भाव अधिकता से कारण
कह न सका बातें मन की संदेश उन तक पहुँचा दे कोई
भाग्य भरोसे कभी बैठकर
कभी मान कर्म को जीवन
नीरव चाहा पाना न मिला मिला दूजा ही कोई मुझको कोई
यही सीख तेरी
जब भी याद किया किसी को
मुझको तेरी याद ही आई प्रिय
देस में परदेस में
तट में, पनघट में
राह में, भवन में
मझधार में, गगन में
जब भी देखा किसी को
तू ही दी दिखलाई प्रिय
मेले में, अकेले में
बाँसुरी पर, शहनाई पर
भीड़ में, तनहाई में
मृदंग पर, ढपली पर
जब भी कोई गूँज सुनी
तेरी आवाज ही आई प्रिये
मंदिर में, मस्जिद में
गिरजा में, गुरुद्वारे में
शबद में, प्रार्थना में
पूजा में, अजान में
प्यार करो यही सीख तेरी
पड़ी सभी जगह सुनाई प्रिय
Tuesday, March 16, 2010
खोजने स्वयं को.....?
निकला हूँ खोजने स्वयं को
जो कभी बसता था मुझमें
जो कभी रचता था मुझमें
नादानी या भूल में छोड़कर
चला गया है जाने कहाँ मुझको
निकला हूँ खोजने स्वयं को
घोर, वन पथरीली राहों में
खिलते चमन, खिजाँ की हवाओं में
सारी दुनिया में, इन बेचैन निगाहों में
ढूँढ़ा है अपने उस रूठे प्रियतम को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
रे तू छिपा है कहाँ पर
पूछता पाता न उत्तर
क्लांत नीरव ढूँढ आया
धरती, सागर और गगन को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
फिर अचानक वही मधुर स्वर
कान में ये कह रहा है
तू जिसे खोजता वह मिलेगा
भीतर हीदेख जरा अपने मन को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
Saturday, March 13, 2010
चलो चल दें यहाँ से
सड़क के दोनो ओर से पेड़ कट गये
हरे-भरे शहर के जैसे पर कतर गये
वैसे भी मयस्सर नहीं थी ताजादम हवा
उस पर बुज़ुर्गों के भी साये हट गये
रातों को बहुत सब्जोहसीं हो गया मंजर
चौराहों पे नकली दरख्त बिजली से सज गये
कैसे कोई ढ़ूढ़ेगा तेरा पता शहर में
पुराने बरगद मोड़ोगलियों से कट गये
घबरा के अब कहीं जा भी नहीं सकते
गाँव भी सब शहरों से सट गये
Wednesday, March 10, 2010
पूजा से प्यार तक
मंदिर में जाने से अच्छा
किसी बाग में तुझसे मिलने आऊँ
किसी देव की आराधना से अच्छा है
तनहाई में यादों के ख्वाब सजाऊँ मैं
घड़ियाल बजाने से अच्छा
तेरे पायल की झंकार सुनुं
माला जपने से अच्छा है
तुझ तक खत भिजवाऊँ मैं
होम-हवन से अच्छा
प्रियतम, तेरे होंठों का चुंबन
प्रार्थना करने से अच्छा है
गीत प्यार का गाऊँ मैं
आरती उतारने से अच्छा
तेरे रूप का गुणगान करूँ
सिंदूर चढ़ाने से अच्छा है
प्रियतम की माँग सजाऊँ मैं
कदली-फल खाने से अच्छा
तेरे हाथों से अंगूर चखूँ
चरणामृत पीने से अच्छा है
तेरी मधुशाला में आऊँ मैं
भक्त कहाने से अच्छा
मस्ती का मतवाला कहलाऊँ
पुजारी कहलाने से अच्छा है
दुनिया मैं दीवाना कहलाऊँ मैं
नहीं चाहता मैं कोई वर
नास्तिक हूँ, फिर क्यों आस्तिक बन
पत्थर को शीश झुकाऊँ
मेरा पूजन-आराधना, अर्पण-तर्पण, व्रत-विधान तू
तू ही मेरा सब कुछ नीरव, तुझ पर बलिहारी जाऊँ मैं
Tuesday, March 9, 2010
अब भी तू ही
बात है ये तेरे ही होंठो की
सुख के दिन हो, दुख की रातें
खत्म ना होगी, प्यार की बातें
तूफां आएँ चाहे कितने जीवन में
रहेगी नैया एक ही प्रियतम अपनी
बात है ये तेरे ही होंठो की
भूलेंगे नहीं कभी कहा था, तूने
आँखों में भर प्यार जहाँ का
इन आँखों में तो अब भी तू ही,
बदली तेरी परिभाषा ही जीवन की
बात है ये तेरे ही होंठो की
तेरे शब्दों को तो मैंने हरदम
पूजा का-सा मान दिया
गिला है तुझसे बस इतना ही
तूने प्यार को समझा कायरता मेरी
बात है ये तेरे ही होंठो की
जो आज मुझको आज रूलाती है
काश कि पहले जाना होता
तू नहीं वो थी छवि तेरी
बात है ये तेरे ही होंठो की
Saturday, March 6, 2010
जीत ले सारा चमन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
तू जिसको कहता नियति
नहीं है वह स्वीकार मुझे
होगी लड़ाई लड़ना अस्तित्व की
छोड़ करना सबको सादर नमन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
तोड़ना होगा तुझको बहुत कुछ
नज़ाकत अपनी न देख
हाथ जो तुझको लगाए
छेद दे उसका बदन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
किस सोच में है तू डूबा
लग रहा अजीब ये सब तुझे
धर्म के लिए तू लड़ रहा
स्वार्थ है तेरा अति पावन
स्वार्थ है तेरा अति पावन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
Friday, March 5, 2010
फीका है सारा चमन
आज फीका लगता है सारा चमन
पाला था जिसको जतन से
अश्रु-स्वेद-रक्त के हवन से
तोड़ डाला किसने जाने
ये खिलखिलाता सुमन
आज फीका लगता है सारा चमन
तोड़ कर टहनी से उसको
मैं अपना घर सजा लूँ
थी नहीं ये इच्छा, सोचा था
देखता रहे उसे गुलशन
आज फीका लगता है सारा चमन
सारा बाग जब था खिला
वो अकेला मुरझा रहा था
पूछने पे कारण उसने बताया
मुझको न जमीं मिली
न ही मिला गगन
आज फीका लगता है सारा चमन
Tuesday, March 2, 2010
अस्तित्व संकट
तुम्हारी याद
कंकड़ों की तरह
अगर गिरती रही
मेरे मन सरोवर में
इसी तरह
तो मुझे लगता है
यकीनन
लगने लगेगी
एक टापू-सी
................
और तब
मैं अपनी
वजह से नहीं
तुम्हारी यादों के
टापू के कारण
पहचाना जाऊँगा
शायद
यही है
मेरे अस्तित्व की नियति
नई ऊर्जा
मैं
हर बार
कविता लिखकर
यही सोचता हूँ कि
अब
अगली बार
नहीं लिख पाऊँगा
कोई कविता
कहाँ से लाऊँगा
फिर से
इतने भाव
भंगिमाएँ
भावनाएँ
शब्द
औऱ अर्थ औऱ इनका समन्वय...
किंतु
न जाने कब
मन की टीस
लरज उठती है
घाव हो जाते हैं
हरे फिर से
और दर्द की ये कसक
अंदर बैठे भावुक रचनाकार को
दे जाती है
नई ऊर्जा
नई प्रेरणा
नई शक्ति
और तब
आहत मन से
कलम से
उमड़ पड़ती है
नई कोई कविता
हर बार
कविता लिखकर
यही सोचता हूँ कि
अब
अगली बार
नहीं लिख पाऊँगा
कोई कविता
कहाँ से लाऊँगा
फिर से
इतने भाव
भंगिमाएँ
भावनाएँ
शब्द
औऱ अर्थ औऱ इनका समन्वय...
किंतु
न जाने कब
मन की टीस
लरज उठती है
घाव हो जाते हैं
हरे फिर से
और दर्द की ये कसक
अंदर बैठे भावुक रचनाकार को
दे जाती है
नई ऊर्जा
नई प्रेरणा
नई शक्ति
और तब
आहत मन से
कलम से
उमड़ पड़ती है
नई कोई कविता
Monday, March 1, 2010
1 मार्च.......
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
जीवन का सुख पाओ तुम
महके जीवन की बगिया और
नेह सदा बरसाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
तेरे मन की इच्छाएँ
सदा सफलता को चूमे
जो चाहो वो मिले सदा
मनचाहा ही पाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
मौसम तुम्हारे दास बने और
मौसम तुम्हारे दास बने और
ऋतुएँ तुम्हारी हो दासी
जब चाहो बहार ले आओ
चाहो जब सावन बन जाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
तेरे प्यार में शायर बनकर
तेरे रूप पर लिखूँ गज़ल
सदा गुनगुनाता रहूँ तुम्हें
गीत मेरा बन जाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
रहो सलामत ओ मीत मेरे
हो खुशियों से अनुबंध सदा
सौ साल जियो प्यार मेरे
उम्र नीरव की भी पाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
Sunday, February 28, 2010
कई रातों को ऐसा भी होता है
कई रातों को ऐसा भी होता है
कि नींद नहीं आती,
बिल्कुल नहीं
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद।
कई रातों को ऐसा भी होता है
तब बेचैन सा में,
बिस्तर पर बदला करता हूँ
करवटें
और हर करवट़
छोड़ जाती है
छोड़ जाती है
मन की चादर पर
तेरी यादों की
नई सिलवट।
कई रातों को ऐसा भी होता है
कभी तकिए को
लेटा हूँ
बाँहों में,
कभी बाँहों को,
बनाता हूँ तकिया,
कभी चौंक कर
जलाता हूँ बिजली
कभी अँधेरों को
मीत बनाता हूँ
करता हूँ
गुफ्तगू
लेकिन नींद तब भी नहीं आती,
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद
कई रातों को ऐसा भी होता है
और तब तेरी यादों के
ताने-बाने बुनता है
मन
और उधेड़ता फिर से
उनको
इसी उधेड़बुन में
अचानक
ना जाने कब
आँखें बुनने लगती हैं, ख्वाब
तेरे ख्वाब.........
कई रातों को ऐसा भी होता है
Friday, February 26, 2010
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम पूजो यदि पत्थर
वो देवता बन जाए
मैं यदि देव को
तो वो पत्थर हो जाए
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम्हारी कश्ती तो मझधारों
से भी बचकर आ जाए
मेरी कश्ती लेकिन हरदम
किनारों से ही धोखा खाए
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम चलो यदि राह कँटीली
वह राह सरल हो जाए
मैं चलूँ राह कोई भी
वह काँटों से भर जाए
अपने-अपने भाग्य की बात
सूख रहा हो कंठ तुम्हारा
साक़ी तुम तक चल कर आए
यह तृषित नीरव हरदम
हलाहल ही पाए
अपने-अपने भाग्य की बात
Sunday, February 21, 2010
फिर से वही वीराने
फिर से वही तनहाईयाँ
फिर से वही वीराने
तू कल चला जाएगा
हम हो रहेंगे दीवाने
हम हो रहेंगे दीवाने
नजरों पर पहरे होंगे
जुबां पर होंगे ताले
तू तो समझेगा कि
हम हो गए बेगाने
तू कल चाहे हमको भूले
हम न भूल सकेंगे
जिंदगी के साज़ पर छेड़े
तूने जो मस्ती भरे तराने
काश कि तू जान सके
मजबूर हम थे कितने
तेरी याद में काटे हैं
रो-रो कई जमाने
पत्थरदिल
अपने अंतर के खुशी और ग़म
घोल स्मृति प्याले में
मैंने कितने नग़मे गाए
तेरे मुँह से वाह न आई
तेरी खातिर इस दुनिया में
दिल पर कितने ज़ख़्म थे खाए
तुझको सब ये ज़ख़्म दिखाए
तेरे मुँह से आह न आई
तेरे प्यार की खातिर नीरव
जग में हम बदनाम हुए
दास्तां ए बरबादी सुनकर
तुझको मुझ पर चाह न आई
तेरी कोमल राहों पर भी
मैंने सदा बिछाया दिल
मैं चला राह पथरीली
तुझको मेरी परवाह न आई
हम तो फिर भी है दिलवाले
शिकवा करने न आएँगें
तू चल कर आएगी इक दिन
न काटा जाएगा दौर ए तन्हाई
Friday, February 19, 2010
अजीब सी रीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
हैं ना जाने वो कहाँ पर
ना कोई सुराग ना कोई खबर
बैठा हूँ निढ़ाल सा अब तो
अकेला ही सहलाता अपने पाँव विथकित
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
जग में जब भी बेचैनी पाऊँगा
सोचा था – आवाज दे तुझे बुलाऊँगा
किंतु मेरा स्वर ही वादियों में अब तो
गूँजकर आता है मेरी ओर विपरित
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
उन गीतों को कैसे दोहराऊँ
जो सुख के क्षणों में थे गाए
दर्द-ए-दिल ही बढ़ाते अब तो
वापस ले ले खुशी के गीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
चार दिन जो प्रिय संग रहेगा
फिर उम्र भर तनहा फिरेगा
ढूँढता फिर रहा नीरव अब तो
चलाई जिसने ये अजीब सी रीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
Tuesday, February 16, 2010
नियति का क्रूर व्यंग्य...
नियति का ये क्रूर व्यंग्य
तब मन से सहा नहीं जाए
जब कोई प्यासा पनघट आए
रीता कंठ और प्यासी आँखें लिए
पनिहारिन को न पाकर
लड़खड़ाता वापस पथ को जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
उम्र भर जिसने पी हो मधु
साक़ी के हाथों ही मनुहारों से
टूटी-सी प्याली में हलाहल
उसको अंतिम बार पिलाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
मन की शहनाई पर जिसने
हरदम राग खुशी का गाया हो
उसके अरमानों के आगे
मोम़िन मर्सिया गाने आए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
सबकी राहों में बिखरे फूल
इस जतन में जिसने उम्र गवाँई
उस नीरव के सिर पर
ताज काँटों का पहनाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
Monday, February 15, 2010
तनहाई
कितनी जल्दी बीते वे दिन
जबकि हम-तुम साथ रहे
युग बीते यों पल बीते
तनहाई हम काट रहे
पल भर तुमसे नजरें मिलती
लगता बहार आ गई चमन में
अब तो खिज़ां है सब ओर
चार दिन हम बीच बहार रहे
अब तो तेरी आहट सुनने को
हरदम दिल मचलता है
कितने नादाँ थे हम तब
जो तेरी पायल से बेजार रहे
चीख मेरी दबकर के रह गई
शहनाई की गूँज तले
कितनी जल्दी डोली सज गई
कितनी जल्दी कहार गए
Sunday, February 14, 2010
कई रातों को ऐसा भी होता है
कई रातों को ऐसा भी होता है
कि नींद नहीं आती,
बिल्कुल नहीं
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद।
कई रातों को ऐसा भी होता है
तब बेचैन सा में,
बिस्तर पर बदला करता हूँ
करवटें
और हर करवट़
छोड़ जाती है
छोड़ जाती है
मन की चादर पर
तेरी यादों की
नई सिलवट।
कई रातों को ऐसा भी होता है
कभी तकिए को
कभी तकिए को
लेटा हूँ
बाँहों में,
कभी बाँहों को,
बनाता हूँ तकिया,
कभी चौंक कर
जलाता हूँ बिजली
जलाता हूँ बिजली
कभी अँधेरों को
मीत बनाता हूँ
मीत बनाता हूँ
करता हूँ
गुफ्तगू
लेकिन नींद तब भी नहीं आती,
आती है तो बस
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद
कई रातों को ऐसा भी होता है
और तब तेरी यादों के
ताने-बाने बुनता है
मन
और उधेड़ता फिर से
उनको
इसी उधेड़बुन में
अचानक
ना जाने कब
आँखें बुनने लगती हैं, ख्वाब
तेरे ख्वाब
कई रातों को ऐसा भी होता है।
करता रहूँ तुझसे अभिसार
साथी मेरे मन को ले चल से मझधार
तुम थामो पतवार नेह की
मैं गाऊँ झूमकर गीत मल्हार
साथी मेरे मन को...
अपने दिलों की नैया बनाकर
प्रीत के चप्पू चलाकर
चल दे दूर कहीं यहाँ से
हो इस स्वप्निला पर सवार
हो इस स्वप्निला पर सवार
साथी मेरे मन को...
सेज अब इसमे सजेगी
डोली भी यही बनेगी
कितनी सुंदर विदाई होगी
सागर बना हो जिसमें कहार
साथी मेरे मन को...
अब यहीं जीवन कटे
माझी की इच्छा यही
जब तक न साहिल मिले
करता रहूँ तुझसे अभिसार
करता रहूँ तुझसे अभिसार
साथी मेरे मन को...
Friday, February 12, 2010
छोड़ चला मेरा साया
खुलकर जब भी हँसना चाहा
दिल जाने क्यों भर आया
खुशी हरदम बेगानी निकली
खुशी हरदम बेगानी निकली
गम को अपना पाया
मधुशाला में था कोलाहल
मन मेरा भी मतवाला था
मधु को जब भी चखना चाहा
बस हलाहल ही पाया
दिन अकेले ही बिताकर
शाम को तनहा बनाकर
रात को जब साथ चाहा
स्वप्न सजा न पाया
सुबह जब होने को थी
दिल बहकने लगा था
जग को जगाने लेकिन
मन पंछी चहचहा न पाया
रिश्ते नातों को भुलाकर
जब चल पड़ा यायावर
साथ जिसको रहना था हरदम
वो भी छोड़ चला मेरा साया
अर्पित तुमको ही
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
शब्द मेरे खोए रहते
कभी लयबद्ध न हो पाते
तुम ना होते तो प्रिय
मेरे भाव होते विपरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
सब कुछ सूना-सूना रहता
रूखा-रूखा रहता जीवन
तेरी आहट से ही जाना
कैसा होता है संगीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
तुमने मुझको शब्द दिए
अर्थ भी समझाए तुमने
अर्थ भी समझाए तुमने
छंद बने, सुरबद्ध हुए
और बने तब ये गीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
अब भी कुछ बाकी है
अंतर से आती आवाज
किंतु न ये बाहर आएँगें
तुम न करोगे यदि इनको मुखरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
जब भी मैं कुछ नया लिखूँगा
भेंट रहेगा तुमको नीरव
मैं हरदम रहूँगा लिखता
तुम देते रहना मुझको प्रीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
Thursday, February 11, 2010
कब तक धीरज रखूँ
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
युगों-युगों से प्रतीक्षारत था
बैठा मौन अटल किंतु विकल
ना तुम आते हो, ना आता है तुम्हारा कोई संदेश पवन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
घोर वन अँधेरी राहें
मौन हृदय बेचैन निगाहें
ना तुम बतलाते हो
ना कोई बतलाता है राह गगन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
लय मेरी टूटी जाती है
छंद विस्मृत हो रहे
ना तुम गाते हो
ना गाता है कोई गीत मिलन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
बने निर्दयी इतने तुम कैसे
क्या याद तुम्हें ना आई होगी
जो सचमुच तुम भूले नीरव शाप लगेंगे तुम्हें विरहन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
Wednesday, February 10, 2010
ये कैसा बँटवारा
क्यों मेरे घर अँधियारा है
दीप मेरे क्यों जल ना पाते
हर जतन अपनाता हूँ
तुमको उजाला, मुझको अँधियारा हरदम
ये कैसा बँटवारा है
रोशन जब सबका...
मुझको भी तेरी चाह प्रिये
तुझको भी मुझसे प्यार प्रिये
तब मिलन में क्यों ये बाधा
क्या मुझसे बैर तुम्हारा है
रोशन जब सबका...
हर मयकश को मधु पिलाते
मुझको ही बस प्यासा रखते
हम भी मतवाले मधुशाला पर
क्या बनता नहीं हक हमारा है
रोशन जब सबका...
हर कश्ती जब साहिल पाती
मेरी ही क्यों भँवर में जाती
इतना न करो सितम ओ सागर
मुझको भी प्रिय किनारा है
रोशन जब सबका...
गैरों पर यूँ रहमो करम
बस मुझ पर ही जुल्मों सितम
कैसे प्रियतम हो तुम नीरव
ये कैसा प्यार तुम्हारा है
रोशन जब सबका...
Monday, February 8, 2010
बुझता दिया
ढलता जाता जीवन मेरा
जलता जाता तन-मन मेरा
मद्धम-मद्धम साँसे चलती
कंठ अवरूद्ध होता जाता
कुछ चलता कुछ गिरता
इस तरह है आलम मेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
पंखों को आहत कर
तुम तो अपनी राह हुए
अब कैसे मैं उड़ पाऊँगा
दूर बहुत है अभी बसेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
बुझता-बुझता दीपक हूँ मैं
उस पर तुम तूफाँ लाए
अब कैसे मैं जल पाऊँगा
दूर बहुत है अभी सवेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
कर्मों से विश्वास उठा जब
भाग्य को मैंने मान लिया
सबकुछ शायद गलती मेरी
दोष नहीं है कुछ भी तेरा
ढल जाऊँगा जल्द सदा को
बस यादें ही रह जाएँगी
यादों को भी बिसरा देना नीरव
बदला पूरा होगा तेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
आशा की परिभाषा
तब आए तुम जब टूट चुकी थी आशा
सपने बहुत सँजोए हमने
थे अरमान बहुत सारे मन में
देर बहुत की प्रिय तुमने
अब टूट चुकी अभिलाषा
सुख सारे त्याग चुका था
दुख को गले लगाया था
अब पहुँचे तुम जब बदल चुकी
सुख-दुख की प्रत्याशा
मन में भावों का तूफान उठा था
शब्दों में न बाँध सका था
भाव बिसरे, शब्द खोए
अब तो है केवल निराशा
स्मृति की मदिरा मन-प्याले में ढाल
जीवन की मधुशाला में
बैठा रहा निढाल
तब आए जब टूट चुका है प्याला
लेकिन अब भी यदि आए हो तुम
सब कुछ नया जुटाऊँगा
नेह तुम्हें अर्पित कर नीरव
आशा की बदलूँगा परिभाषा
Sunday, February 7, 2010
विध्वंस है सृजन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
मन जब-जब आहत होता है,
कुछ न कुछ निर्मित होता है,
है ये कैसी टूटन, जो हरदम रचती है नवीन रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है हो गया हूँ हल्का
कभी सब कुछ, भारी-सा लगता है
है यह कैसा भार,मायावी हैजिसका वजन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
हल्का होकर उड़ता हूँ गगन में.
कभी रसातल में दब जाता हूँ
है यह कैसा बोझ,मुश्किल है जिसको करना वहन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है तोड़ दूँ सब कुछ
कभी घरोंदे बनाने को जी करता है
है यह कैसा स्वप्न,रेशमी है जिसकी छुअन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
मन जब-जब आहत होता है,
कुछ न कुछ निर्मित होता है,
है ये कैसी टूटन, जो हरदम रचती है नवीन रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है हो गया हूँ हल्का
कभी सब कुछ, भारी-सा लगता है
है यह कैसा भार,मायावी हैजिसका वजन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
हल्का होकर उड़ता हूँ गगन में.
कभी रसातल में दब जाता हूँ
है यह कैसा बोझ,मुश्किल है जिसको करना वहन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है तोड़ दूँ सब कुछ
कभी घरोंदे बनाने को जी करता है
है यह कैसा स्वप्न,रेशमी है जिसकी छुअन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
Friday, February 5, 2010
काव्य-संग्रह विमोचन
मेरी सब कविताएँ छप जाएँ
छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
मैं तो सह लूँगा
तुम गह पाओगी
Wednesday, February 3, 2010
याद है धुआँ-धुआँ
गीत है बुझा-बुझा
नेह की ये रश्मियाँ
हम बरसाए तो कैसे
कभी बाती तो कभी तेल नहीं
दीप है बुझा-बुझा
प्रीत के इस गीत को
हम सुनाए तो कैसे
कभी मीत, कभी प्रीत नहीं
गीत है बुझा-बुझा
रात के इस स्वप्न को
हम सजाए तो कैसे
कभी नींद, कभी कुमकुम नहीं
स्वप्न है लुटा-लुटा
संदेश अपने प्रिय को
हम भिजवाएँ तो कैसे
कभी शब्द कभी मेघ नहीं
याद है धुआँ-धुआँ
दर्द नीरव दिल का
हम मिटाए तो कैसे
कभी वो कभी हम नहीं
तीर है चुभा-चुभा
Tuesday, February 2, 2010
पुराने पापी
कौन कहता है
नहीं पी हमने शराब
आँखों से, साकी से, पैमानों से
हम तो वो है
जो गए निकाले
हमेशा मार कर धक्के मैखानों से
पहले साकी ने
पहले साकी ने
पिलाई हमको
नाज से, अदा से, अंदाजों से
पहचाना जब उसने हमको
दूर किया नजरों से, प्यालों से, मयखानों से
कौन कहता है...
ऐ मेरे दोस्त
बता दे मरे दिल का हाल
मेरे साकी को
अहसान तेरा ताउम्र मानूँगा
कहते फिरे हम ये बात
गली-गली अपनों से बेगानों से
कौन कहता है...
तुम तो खुशकिस्मत हो
जो जल जाते हो
अपनी ही शमा के दामन में
हम तो चाह कर भी जल नहीं पाते
रो-रो के
ये कहते फिरे हम
उन आशिक परवानों से
कौन कहता है..
कौन आया है और कौन है गया
अब तो आहट भी सुनाई नहीं देती
खुद में खोए हैं इतना
पूछते हैं हाल खुद का
आईनों से, अक्स से, दीवारों से
कौन कहता है...
कोई पूछे मेरा हाल
तो इतना ही कहना नीरव
अब तो वो रहते हैं
खुद ही से अनजानों से
कौन कहता है...
Monday, February 1, 2010
दर्द की इंतहा
मस्ती हम मतवालों की
जाने कहाँ खो गई
कभी था हमने पिया था जिसको
आज वो हमको पी गई
खामोश रहना आदत कब थी
वक्त ने किया सितम ऐसा
उनके होंठो की ही कोई बात
हमारे होंठ सी गई
मस्ती हम मतवालों की...
ठोकर खाकर जख्म खाते
तो कोई बात थी
हमारी ही एक आदत
आज हमको जख्म हो गई
मस्ती हम...
छूकर जिसको होंठों को
अपनी प्यास बुझाते थे
उसके होंठों की ही छुअन
आज हमको जहर हो गई
मस्ती हम....
हो जाना है ये मर्ज
लाईलाज अब तो नीरव
दुआ से उनकी हर दवा
आज हमको बेअसर हो गई
मस्ती हम...
कोई भी हुनर हमको
अब हँसा नहीं पाएगा
शरारत उनकी ही एक
आज हमको सजा हो गई
मस्ती हम...
कोई भी दर्द हमको
अब रूला नहीं पाएगा
इतना दिया है तुमने नीरव
दर्द की इंतहा हो गई
मस्ती हम...
Sunday, January 31, 2010
अमीत
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
मन की बात जिसे कह सकूँ
मीत बना सकूँ अपने जैसा
की बहुतों ने दोस्ती मगर
दोस्त न बन सका कोई
प्रीत की डोरी बाँधी बहुतों ने
प्रियतम न बन सका कोई
ढाली प्यालों में साथ बहुतों ने
हमप्याला न बन सका कोई
बाँटे बहुतों ने दर्द मुझे
हमदर्द न बन सका कोई
बाँट लूँ जिसके साथ
खुशी गम के लम्हें अपने
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
मन के प्रवाह दबाने से
सरिता न बन सका
ज्वालामुखी बन रह गया मैं
व्यक्त न कर सका भाव अपने
अव्यक्त-सा रह गया मैं
देकर हृदय के उद् गार जिसे
वेदनामुक्त हो सकूँ
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
निकला जब भी गुलशन से
सोचा तोडूँ कलियाँ दो चार
लगा दूँ तेरे बालों में
सोचा था यही हर बार
दिल की बगिया को सवाँरे
कोई माली न मिल सका ऐसा
महका दे मुझको
मेरे तन-मन को
पा न सका अब तक मैंकोई एक भी साथी ऐसा
कोई एक भी साथी ऐसा
मन की बात जिसे कह सकूँ
मीत बना सकूँ अपने जैसा
की बहुतों ने दोस्ती मगर
दोस्त न बन सका कोई
प्रीत की डोरी बाँधी बहुतों ने
प्रियतम न बन सका कोई
ढाली प्यालों में साथ बहुतों ने
हमप्याला न बन सका कोई
बाँटे बहुतों ने दर्द मुझे
हमदर्द न बन सका कोई
बाँट लूँ जिसके साथ
खुशी गम के लम्हें अपने
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
मन के प्रवाह दबाने से
सरिता न बन सका
ज्वालामुखी बन रह गया मैं
व्यक्त न कर सका भाव अपने
अव्यक्त-सा रह गया मैं
देकर हृदय के उद् गार जिसे
वेदनामुक्त हो सकूँ
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
निकला जब भी गुलशन से
सोचा तोडूँ कलियाँ दो चार
लगा दूँ तेरे बालों में
सोचा था यही हर बार
दिल की बगिया को सवाँरे
कोई माली न मिल सका ऐसा
महका दे मुझको
मेरे तन-मन को
पा न सका अब तक मैंकोई एक भी साथी ऐसा
Friday, January 29, 2010
असमंजस
हार कहूँ इसको अपनी,या कहूँ अपनी जीत इसे .
स्वाद सदा कड़ुवा निकला
जब भी चखा मैंने जय को
मीठी लगी पराजय अपनी
त्रासदी कहूँ या रीत इसे .
शब्द खोए रहे सदा ही
जब भी मैंने छन्द लिखे
भाव सहित लिखा फिर भी
दर्द कहूँ या गीत इसे .
जिसको मैंने दिया सम्बल
जिसको मैंने दिया सम्बल
उसी के हाथों हुआ हूँ निर्बल
तुम तो मेरे दुश्मन निकले
कैसे कहूँ मनमीत इसे .
मीठे बैन सुनने को हरदम
आतुर रहता मन मेरा
कानों को जो कटु लगता
कैसे कहूँ संगीत इसे .
मैंने तो बस पाई टूटन
तुमने जब भी निर्माण किया
यह तो है म्रगत्रश्णा नीरव
कैसे कहूँ प्रीत इसे .
Thursday, January 28, 2010
अर्जुन-दुविधा
अपनी हार भी कर स्वीकार रे मन
महत्वाकांक्षी तू रहा सदा से
जीतता तू रहा निरंतर
अपने कर्मफल से लेकिन
ना कर तू इंकार रे मन
अपनी हार भी...
जितनी चाही थी पी तूने
मधु सदा ही होंठों से
अपने हिस्से की हलाहल को भी
अब कर स्वीकार रे मन
अपनी हार भी...
तेरी नैया को रे माँझी
मिला किनारा ही हरदम
अनुभव इसका भी ले ले अब
जब मिली तुझे मझधार रे मन
अपनी हार भी...
सुख-दुख की चिंता में
व्यर्थ रहा तेरा चिंतन
तेरे कर्मों का ही फल है
तू समझ रहा जिसे दुर्भाग्य रे मन
अपनी हार भी...
कौन है अपना कौन पराया
तू चिंता न कर इसकी
अपनी रौ में ही बहता रह नीरव
अपनी रौ में ही बहता रह नीरव
कर सबसे तू प्यार रे मन
अपनी हार भी...
तेरे संकोचों ने ही देख ले
तुझको आज हराया है
रणभूमि है ये नीरव
कर दुश्मन पर वार रे मन
अपनी हार भी...
Wednesday, January 27, 2010
भूल
समझ नहीं पा रहा हूँ
तुमको न समझ पाना
मेरी हार है या है
मरे अनुभवों का कच्चा निकल जाना
समझ नहीं पा रहा...
अब तक मेरे अनुमानों पर
गर्व मुझे खुद होता था
तुम मेरी अपवाद हो या तो
मैंने तुमको न पहचाना
समझ नहीं पा...
अनजाने सायों पर भी मेरी राय
सही सदा निकलती थी
मेरा सच झूठा निकला उसी पे
जिसको था मैंने जाना
समझ नहीं पा...
चाहे जो भी बात हो लेकिन
नहीं यह स्वीकार मुझे
सब कहते हैं भुला दो नीरव
समझ इसे अफसाना
तुमको न समझ पाना
मेरी हार है या है
मरे अनुभवों का कच्चा निकल जाना
समझ नहीं पा रहा...
अब तक मेरे अनुमानों पर
गर्व मुझे खुद होता था
तुम मेरी अपवाद हो या तो
मैंने तुमको न पहचाना
समझ नहीं पा...
अनजाने सायों पर भी मेरी राय
सही सदा निकलती थी
मेरा सच झूठा निकला उसी पे
जिसको था मैंने जाना
समझ नहीं पा...
चाहे जो भी बात हो लेकिन
नहीं यह स्वीकार मुझे
सब कहते हैं भुला दो नीरव
समझ इसे अफसाना
समझ नहीं पा...
आशंका
टूट न जाऊँ कहीं सदा को डरता है मन
वक्त के नटखट हाथों में
जर्जर तन है आहत मन
कुछ न कुछ है रोज टूटता
चाहे तन हो चाहे मन
टूट न जाऊँ...
तिनके-तिनके जुटा जतन से
अपना नीड़ बनाया था
तेज झोंकों से न बिखेर
पवन इसे दे डरता है मन
टूट न जाऊँ...
अपनी मीत बनाया जिसको
तोड़ा हर दम उसी ने मुझको
किसको आज कहूँ अपना
जब मनमीत हुआ दुश्मन
टूट न जाऊँ...
अपने पंखों के बल पर
कब तक मैं उड़ पाऊँगा
अभी तो है शुरुआत सफर की
फैला है सीमाहीन गगन
टूट न जाऊँ...
बीच भँवर में मेरी नैया
तुम डूबोना जो चाहो
तन मेरा डूबो दो चाहे
नहीं डूबेगा मेरा मन
टूट न जाऊँ...
निराशा की तिमिर निशा में
क्या समझे डर जाऊँगा
अब भी बचा हूँ कुछ तो नीरव
किया भले सब कुछ अर्पण
टूट न जाऊँ
Tuesday, January 26, 2010
आहट
चिर प्रतिक्षित है आहट ये
और चिरपरिचित भी शायद
पायल की कोई मधुर झंकार मन सुनता है
दूर किसी के....
कोमल पाँवों का स्वागत
फूलों बिछाकर राहों में
काँटे राहों के पलकों से मन चुनता है
दूर किसी के...
ये कर लूँगा वो कर लूँगा
ये मैं दूँगा वो मैं दूँगा
उनके आने से पहले ही सपने मन बुनता है
दूर किसी के...
बहुत दूर से आए हैं
बहुत हैं ये थके-थके
'प्यास लगी है पानी ला' मन सुनता है
दूर किसी के...
नेहिल तेरी चुभन है रे मन
स्वप्निल तेरी है छुअन
यहीं ठहरूँगा अब कहेगा नीरव मन बुनता है
दूर किसी की...
Monday, January 25, 2010
पाषाण नहीं हृदय मेरा
पाषाण नहीं हृदय है मेरा
पूजा नहीं इसे प्यार चाहिए
शासन करना नहीं चाहता
थोड़ा-सा अधिकार चाहिए
कब चाहा भर कर दे साक़ी
दुलार सहित पैमानों में
लेकिन जब मधुशाला जाऊँ
थोड़ी-सी मनुहार चाहिए
देना ही सीखा है अब तक
कुछ पाऊँ नहीं रही यह इच्छा
नेह मुझे भी है इच्छित
नहीं मगर व्यापार चाहिए
संघर्षों में बीता जीवन
दर्द की पहचान मुझे है
काँटे सह लूँ सीने पर
मन को कोमल व्यवहार चाहिए
गले में माला हो फूलों की
नहीं कभी यह स्वीकार मुझे
जब कोई सत्कार्य करूँ
तेरी बाँहों का हार चाहिए
कब मैंने चाहा तन तेरा
मन पर लेकिन अधिकार चाहिए
है तैयार मिटने को नीरव
थोड़ा-सा पर प्यार चाहिए
पूजा नहीं इसे प्यार चाहिए
शासन करना नहीं चाहता
थोड़ा-सा अधिकार चाहिए
कब चाहा भर कर दे साक़ी
दुलार सहित पैमानों में
लेकिन जब मधुशाला जाऊँ
थोड़ी-सी मनुहार चाहिए
देना ही सीखा है अब तक
कुछ पाऊँ नहीं रही यह इच्छा
नेह मुझे भी है इच्छित
नहीं मगर व्यापार चाहिए
संघर्षों में बीता जीवन
दर्द की पहचान मुझे है
काँटे सह लूँ सीने पर
मन को कोमल व्यवहार चाहिए
गले में माला हो फूलों की
नहीं कभी यह स्वीकार मुझे
जब कोई सत्कार्य करूँ
तेरी बाँहों का हार चाहिए
कब मैंने चाहा तन तेरा
मन पर लेकिन अधिकार चाहिए
है तैयार मिटने को नीरव
थोड़ा-सा पर प्यार चाहिए
Saturday, January 23, 2010
फिलासफी
मैंने जीवन को अब पहचाना
कोमल राह चलकर भी
जब पाँव में पड़ गए छाले
अब जाना है कितना कठिन पथरीली राहों पर चल पाना
मैंने जीवन को....
मधु जितनी चाही थी पी
फिर भी पाई कटुता ही अधरों ने
अब जाना है कितना कठिन हलाहल पी जाना
मैंने जीवन को...
गुलशन में फूलों की बहार रही
उमंगों की कलियाँ भी बेशुमार रही
फूल लगे चुभने तब जाना कितना कठिन है शर को गले लगाना
मैंने जीवन को...
पूनम थी जब छाई गगन में
मन में फिर भी अँधियारा था
अब जाना है कितना कठिन मावस की रात बिताना
मैंने जीवन को....
मिला न इच्छित बहुत था ढूँढा
चला छोड़ जब पहला आशियाना
नंगे सिर अब है नीरव कितना कठिन फिर से नीड़ बसाना
मैंने जीवन को....
Thursday, January 21, 2010
मतवाले
हम हैं मस्ती के मतवाले
चले थे तेरी राह में हमदम
पाने के लेकर तुझे इरादे
मिली न लेकिन मंजिल अब तक पाँव में पड़ गए छाले
हम हैं मस्ती के....
सूखा जाता कंठ है हरदम
है ऐंठ रही जुबान भी
मिला न कोई साकी अब तक रीते पड़े हैं प्याले
हम हैं मस्ती के....
अब भी बाकी है अधरों पर
पहले जो मधु तूने दी थी
ऐसे कैसे भूले तुझको आखिर हम भी है दिलवाले
हम हैं मस्ती के....
प्यास हमारी बुझ न पाती
चाहे तू है रोज पिलाती
देखे न होंगे साकी तूने हमसे मय के मतवाले
हम हैं मस्ती के...
ओझल क्यों हो जाती हरदम
बस एक झलक दिखलाकर
तूने बहुत दिया है नीरव कुछ हमसे भी तो पा ले
हम हैं मस्ती के....
Wednesday, January 20, 2010
कर्मं कुरु
अभी मूल्यांकन का वक्त नहीं है
बची अभी है रात अँधेरी
शेष अभी बातें बहुतेरी
अंधकार है कितना छाया सुबह अभी अलमस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
बहुत अभी संघर्ष बचा है
शेष समर है अभी सारथी
ना लौटा रथ रणभूमि से अभी हौसला पस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन ...
साथ बैठकर बाँट ले सुख-दुख
कर लें बातें न फेर अभी मुख
अबके बिछुड़े कब मिले ना कह अभी वक्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
जीवन कर्मों का ही फल है
भाग्य भरोसे आशा निष्फल है
कर सकता बहुत कुछ अभी इतना तो तू व्यस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
कर ले जितना तू कर सकता
पा ले जितना तू पा सकता
यह कह ना बैठ ओ नीरव इच्छाओं का अंत नहीं है
अभी मूल्यांकन...
स्वप्नभंगा
तुमने ही तब डाली चितवन
नैनों जब चाहा मिलना
फूलों ने जब चाहा खिलना
नजरें झुका कर बैठ गए बने रहे हम बेमन
तुम ने ही...
अभी तो भी शुरुआत प्रणय की
अभी तो हुआ विश्वास था
तुमने किया आघात हृदय पर कह 'बस हुआ अवसाद'
तुम ने ही...
आशा को विश्वास हुआ था
सबकुछ तो निश्वास हुआ था
मध्य निशा में चीख हुए तुम भंग हुआ मेरा सपन
तुम ने ही...
अब भी वक्त बचा है नीरव
छोड़ दे अपने संकोचों को
बाहुहार पहना दे मुझको तोड़ ले सारी अनबन
तुम ने ही....
Monday, January 18, 2010
राज
बतला दे कोई मुझको जीवन का अब राज
सीधी-सच्ची राह चला जब
ले मंजिल की चाह चला जब
हर संकेतक ने किया गुमराह टूट चला मन का विश्वास
बतला दे कोई मुझको...
मैंने अपनी राह चुनी जब
निज मंजिल की चाह चुनी जब
तब तुमने क्यों रोका मुझको दे नेह से निज आवाज
बतला दे कोई मुझको...
उन्मुक्त पंछी सा मन मेरा
जब जहाँ चाहा किया बसेरा
नोच दिया मेरे पंखों को बंद किया मेरा परवाज
बतला दे कोई मुझको...
मेरा अपना तब चिंतन था
मेरा अपना तब दर्शन था
मेरा सत्य हुआ खंडित नीरव जब जाना तेरे जीवन का राज
बतला दे कोई मुझको....
सीधी-सच्ची राह चला जब
ले मंजिल की चाह चला जब
हर संकेतक ने किया गुमराह टूट चला मन का विश्वास
बतला दे कोई मुझको...
मैंने अपनी राह चुनी जब
निज मंजिल की चाह चुनी जब
तब तुमने क्यों रोका मुझको दे नेह से निज आवाज
बतला दे कोई मुझको...
उन्मुक्त पंछी सा मन मेरा
जब जहाँ चाहा किया बसेरा
नोच दिया मेरे पंखों को बंद किया मेरा परवाज
बतला दे कोई मुझको...
मेरा अपना तब चिंतन था
मेरा अपना तब दर्शन था
मेरा सत्य हुआ खंडित नीरव जब जाना तेरे जीवन का राज
बतला दे कोई मुझको....
Sunday, January 17, 2010
अटूट
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जिसको था अपना जाना
जिसको था अपना माना
मदहोश किया उसी ने पहले
और सभी कुछ लूटा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जिसने था मेरा सच जाना
जिसने था मन को पहचाना
आँखें फेरी उसी ने पहले
और कहा फिर झूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जीने की अपनी शैली थी
मस्ती की अपनी रंगरेली थी
मुझको छीना मुझसे तूने
कैसा ये प्रयोग किया अनूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
हम तो फिर भी जी ही लेंगे
अपने आँसू पी ही लेंगे
पश्चातापों के साए नीरव
पश्चातापों के साए नीरव
ताउम्र करेंगे तेरा ही पीछा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
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about me
- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।



























