Friday, February 12, 2010

छोड़ चला मेरा साया


खुलकर जब भी हँसना चाहा
दिल जाने क्यों भर आया
खुशी हरदम बेगानी निकली
गम को अपना पाया
मधुशाला में था कोलाहल
मन मेरा भी मतवाला था
मधु को जब भी चखना चाहा
बस हलाहल ही पाया
दिन अकेले ही बिताकर
शाम को तनहा बनाकर
रात को जब साथ चाहा
स्वप्न सजा न पाया
सुबह जब होने को थी
दिल बहकने लगा था
जग को जगाने लेकिन
मन पंछी चहचहा न पाया
रिश्ते नातों को भुलाकर
जब चल पड़ा यायावर
साथ जिसको रहना था हरदम
वो भी छोड़ चला मेरा साया

अर्पित तुमको ही


अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
शब्द मेरे खोए रहते
कभी लयबद्ध न हो पाते
तुम ना होते तो प्रिय
मेरे भाव होते विपरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
सब कुछ सूना-सूना रहता
रूखा-रूखा रहता जीवन
तेरी आहट से ही जाना
कैसा होता है संगीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
तुमने मुझको शब्द दिए
अर्थ भी समझाए तुमने
छंद बने, सुरबद्ध हुए
और बने तब ये गीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
अब भी कुछ बाकी है
अंतर से आती आवाज
किंतु न ये बाहर आएँगें
तुम न करोगे यदि इनको मुखरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
जब भी मैं कुछ नया लिखूँगा
भेंट रहेगा तुमको नीरव
मैं हरदम रहूँगा लिखता
तुम देते रहना मुझको प्रीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत

Thursday, February 11, 2010

कब तक धीरज रखूँ

कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
युगों-युगों से प्रतीक्षारत था
बैठा मौन अटल किंतु विकल
ना तुम आते हो, ना आता है तुम्हारा कोई संदेश पवन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
घोर वन अँधेरी राहें
मौन हृदय बेचैन निगाहें
ना तुम बतलाते हो
ना कोई बतलाता है राह गगन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
लय मेरी टूटी जाती है
छंद विस्मृत हो रहे
ना तुम गाते हो
ना गाता है कोई गीत मिलन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
बने निर्दयी इतने तुम कैसे
क्या याद तुम्हें ना आई होगी
जो सचमुच तुम भूले नीरव शाप लगेंगे तुम्हें विरहन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से

Wednesday, February 10, 2010

ये कैसा बँटवारा

रोशन जब सबका घर है
क्यों मेरे घर अँधियारा है
दीप मेरे क्यों जल ना पाते
हर जतन अपनाता हूँ
तुमको उजाला, मुझको अँधियारा हरदम
ये कैसा बँटवारा है
रोशन जब सबका...
मुझको भी तेरी चाह प्रिये
तुझको भी मुझसे प्यार प्रिये
तब मिलन में क्यों ये बाधा
क्या मुझसे बैर तुम्हारा है
रोशन जब सबका...
हर मयकश को मधु पिलाते
मुझको ही बस प्यासा रखते
हम भी मतवाले मधुशाला पर
क्या बनता नहीं हक हमारा है
रोशन जब सबका...
हर कश्ती जब साहिल पाती
मेरी ही क्यों भँवर में जाती
इतना न करो सितम ओ सागर
मुझको भी प्रिय किनारा है
रोशन जब सबका...
गैरों पर यूँ रहमो करम
बस मुझ पर ही जुल्मों सितम
कैसे प्रियतम हो तुम नीरव
ये कैसा प्यार तुम्हारा है
रोशन जब सबका...

Monday, February 8, 2010

बुझता दिया

ढलता जाता जीवन मेरा
जलता जाता तन-मन मेरा
मद्धम-मद्धम साँसे चलती
कंठ अवरूद्ध होता जाता
कुछ चलता कुछ गिरता
इस तरह है आलम मेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
पंखों को आहत कर
तुम तो अपनी राह हुए
अब कैसे मैं उड़ पाऊँगा
दूर बहुत है अभी बसेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
बुझता-बुझता दीपक हूँ मैं
उस पर तुम तूफाँ लाए
अब कैसे मैं जल पाऊँगा
दूर बहुत है अभी सवेरा
ढलता जाता जीवन मेरा

कर्मों से विश्वास उठा जब

भाग्य को मैंने मान लिया

सबकुछ शायद गलती मेरी

दोष नहीं है कुछ भी तेरा

ढल जाऊँगा जल्द सदा को

बस यादें ही रह जाएँगी

यादों को भी बिसरा देना नीरव

बदला पूरा होगा तेरा

ढलता जाता जीवन मेरा

आशा की परिभाषा

तब आए तुम जब टूट चुकी थी आशा
सपने बहुत सँजोए हमने
थे अरमान बहुत सारे मन में
देर बहुत की प्रिय तुमने
अब टूट चुकी अभिलाषा
सुख सारे त्याग चुका था
दुख को गले लगाया था
अब पहुँचे तुम जब बदल चुकी
सुख-दुख की प्रत्याशा
मन में भावों का तूफान उठा था
शब्दों में न बाँध सका था
भाव बिसरे, शब्द खोए
अब तो है केवल निराशा
स्मृति की मदिरा मन-प्याले में ढाल
जीवन की मधुशाला में
बैठा रहा निढाल
तब आए जब टूट चुका है प्याला
लेकिन अब भी यदि आए हो तुम
सब कुछ नया जुटाऊँगा
नेह तुम्हें अर्पित कर नीरव
आशा की बदलूँगा परिभाषा

Sunday, February 7, 2010

विध्वंस है सृजन

यह विध्वंस है या सृजन रे मन!

मन जब-जब आहत होता है,
कुछ न कुछ निर्मित होता है,
है ये कैसी टूटन, जो हरदम रचती है नवीन रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है हो गया हूँ हल्का
कभी सब कुछ, भारी-सा लगता है
है यह कैसा भार,मायावी हैजिसका वजन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
हल्का होकर उड़ता हूँ गगन में.
कभी रसातल में दब जाता हूँ
है यह कैसा बोझ,मुश्किल है जिसको करना वहन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है तोड़ दूँ सब कुछ
कभी घरोंदे बनाने को जी करता है
है यह कैसा स्वप्न,रेशमी है जिसकी छुअन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!

Friday, February 5, 2010

काव्य-संग्रह विमोचन

मेरी सब कविताएँ छप जाएँ
छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
मैं तो सह लूँगा
तुम गह पाओगी

Wednesday, February 3, 2010

याद है धुआँ-धुआँ


गीत है बुझा-बुझा
नेह की ये रश्मियाँ
हम बरसाए तो कैसे
कभी बाती तो कभी तेल नहीं
दीप है बुझा-बुझा
प्रीत के इस गीत को
हम सुनाए तो कैसे
कभी मीत, कभी प्रीत नहीं
गीत है बुझा-बुझा
रात के इस स्वप्न को
हम सजाए तो कैसे
कभी नींद, कभी कुमकुम नहीं
स्वप्न है लुटा-लुटा
संदेश अपने प्रिय को
हम भिजवाएँ तो कैसे
कभी शब्द कभी मेघ नहीं
याद है धुआँ-धुआँ
दर्द नीरव दिल का
हम मिटाए तो कैसे
कभी वो कभी हम नहीं
तीर है चुभा-चुभा

Tuesday, February 2, 2010

पुराने पापी


कौन कहता है
नहीं पी हमने शराब
आँखों से, साकी से, पैमानों से
हम तो वो है
जो गए निकाले
हमेशा मार कर धक्के मैखानों से
पहले साकी ने
पिलाई हमको
नाज से, अदा से, अंदाजों से
पहचाना जब उसने हमको
दूर किया नजरों से, प्यालों से, मयखानों से
कौन कहता है...
ऐ मेरे दोस्त
बता दे मरे दिल का हाल
मेरे साकी को
अहसान तेरा ताउम्र मानूँगा
कहते फिरे हम ये बात
गली-गली अपनों से बेगानों से
कौन कहता है...
तुम तो खुशकिस्मत हो
जो जल जाते हो
अपनी ही शमा के दामन में
हम तो चाह कर भी जल नहीं पाते
रो-रो के
ये कहते फिरे हम
उन आशिक परवानों से
कौन कहता है..
कौन आया है और कौन है गया
अब तो आहट भी सुनाई नहीं देती
खुद में खोए हैं इतना
पूछते हैं हाल खुद का
आईनों से, अक्स से, दीवारों से
कौन कहता है...

कोई पूछे मेरा हाल

तो इतना ही कहना नीरव

अब तो वो रहते हैं

खुद ही से अनजानों से

कौन कहता है...

Monday, February 1, 2010

दर्द की इंतहा


मस्ती हम मतवालों की
जाने कहाँ खो गई
कभी था हमने पिया था जिसको
आज वो हमको पी गई
खामोश रहना आदत कब थी
वक्त ने किया सितम ऐसा
उनके होंठो की ही कोई बात
हमारे होंठ सी गई
मस्ती हम मतवालों की...
ठोकर खाकर जख्म खाते
तो कोई बात थी
हमारी ही एक आदत
आज हमको जख्म हो गई
मस्ती हम...
छूकर जिसको होंठों को
अपनी प्यास बुझाते थे
उसके होंठों की ही छुअन
आज हमको जहर हो गई
मस्ती हम....
हो जाना है ये मर्ज
लाईलाज अब तो नीरव
दुआ से उनकी हर दवा
आज हमको बेअसर हो गई
मस्ती हम...
कोई भी हुनर हमको
अब हँसा नहीं पाएगा
शरारत उनकी ही एक
आज हमको सजा हो गई
मस्ती हम...
कोई भी दर्द हमको
अब रूला नहीं पाएगा
इतना दिया है तुमने नीरव
दर्द की इंतहा हो गई
मस्ती हम...

Sunday, January 31, 2010

अमीत

पा न सका अब तक मैं

कोई एक भी साथी ऐसा
मन की बात जिसे कह सकूँ
मीत बना सकूँ अपने जैसा
की बहुतों ने दोस्ती मगर
दोस्त न बन सका कोई
प्रीत की डोरी बाँधी बहुतों ने
प्रियतम न बन सका कोई
ढाली प्यालों में साथ बहुतों ने
हमप्याला न बन सका कोई
बाँटे बहुतों ने दर्द मुझे
हमदर्द न बन सका कोई
बाँट लूँ जिसके साथ
खुशी गम के लम्हें अपने
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
मन के प्रवाह दबाने से
सरिता न बन सका
ज्वालामुखी बन रह गया मैं
व्यक्त न कर सका भाव अपने
अव्यक्त-सा रह गया मैं
देकर हृदय के उद् गार जिसे
वेदनामुक्त हो सकूँ
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
निकला जब भी गुलशन से
सोचा तोडूँ कलियाँ दो चार
लगा दूँ तेरे बालों में
सोचा था यही हर बार
दिल की बगिया को सवाँरे
कोई माली न मिल सका ऐसा
महका दे मुझको
मेरे तन-मन को
पा न सका अब तक मैंकोई एक भी साथी ऐसा

Friday, January 29, 2010

असमंजस

हार कहूँ इसको अपनी,या कहूँ अपनी जीत इसे .
स्वाद सदा कड़ुवा निकला
जब भी चखा मैंने जय को
मीठी लगी पराजय अपनी
त्रासदी कहूँ या रीत इसे .
शब्द खोए रहे सदा ही
जब भी मैंने छन्द लिखे
भाव सहित लिखा फिर भी
दर्द कहूँ या गीत इसे .
जिसको मैंने दिया सम्बल
उसी के हाथों हुआ हूँ निर्बल
तुम तो मेरे दुश्मन निकले
कैसे कहूँ मनमीत इसे .
मीठे बैन सुनने को हरदम
आतुर रहता मन मेरा
कानों को जो कटु लगता
कैसे कहूँ संगीत इसे .
मैंने तो बस पाई टूटन
तुमने जब भी निर्माण किया
यह तो है म्रगत्रश्णा नीरव
कैसे कहूँ प्रीत इसे .

Thursday, January 28, 2010

अर्जुन-दुविधा


अपनी हार भी कर स्वीकार रे मन
महत्वाकांक्षी तू रहा सदा से
जीतता तू रहा निरंतर
अपने कर्मफल से लेकिन
ना कर तू इंकार रे मन
अपनी हार भी...
जितनी चाही थी पी तूने
मधु सदा ही होंठों से
अपने हिस्से की हलाहल को भी
अब कर स्वीकार रे मन
अपनी हार भी...
तेरी नैया को रे माँझी
मिला किनारा ही हरदम
अनुभव इसका भी ले ले अब
जब मिली तुझे मझधार रे मन
अपनी हार भी...
सुख-दुख की चिंता में
व्यर्थ रहा तेरा चिंतन
तेरे कर्मों का ही फल है
तू समझ रहा जिसे दुर्भाग्य रे मन
अपनी हार भी...
कौन है अपना कौन पराया
तू चिंता न कर इसकी
अपनी रौ में ही बहता रह नीरव
कर सबसे तू प्यार रे मन
अपनी हार भी...
तेरे संकोचों ने ही देख ले
तुझको आज हराया है
रणभूमि है ये नीरव
कर दुश्मन पर वार रे मन
अपनी हार भी...

Wednesday, January 27, 2010

भूल

समझ नहीं पा रहा हूँ

तुमको न समझ पाना
मेरी हार है या है
मरे अनुभवों का कच्चा निकल जाना
समझ नहीं पा रहा...
अब तक मेरे अनुमानों पर
गर्व मुझे खुद होता था
तुम मेरी अपवाद हो या तो
मैंने तुमको न पहचाना
समझ नहीं पा...
अनजाने सायों पर भी मेरी राय
सही सदा निकलती थी
मेरा सच झूठा निकला उसी पे
जिसको था मैंने जाना
समझ नहीं पा...
चाहे जो भी बात हो लेकिन
नहीं यह स्वीकार मुझे
सब कहते हैं भुला दो नीरव
समझ इसे अफसाना

समझ नहीं पा...

आशंका



टूट न जाऊँ कहीं सदा को डरता है मन

वक्त के नटखट हाथों में
जर्जर तन है आहत मन
कुछ न कुछ है रोज टूटता
चाहे तन हो चाहे मन
टूट न जाऊँ...
तिनके-तिनके जुटा जतन से
अपना नीड़ बनाया था
तेज झोंकों से न बिखेर
पवन इसे दे डरता है मन
टूट न जाऊँ...
अपनी मीत बनाया जिसको
तोड़ा हर दम उसी ने मुझको
किसको आज कहूँ अपना
जब मनमीत हुआ दुश्मन
टूट न जाऊँ...
अपने पंखों के बल पर
कब तक मैं उड़ पाऊँगा
अभी तो है शुरुआत सफर की
फैला है सीमाहीन गगन
टूट न जाऊँ...
बीच भँवर में मेरी नैया
तुम डूबोना जो चाहो
तन मेरा डूबो दो चाहे
नहीं डूबेगा मेरा मन
टूट न जाऊँ...
निराशा की तिमिर निशा में
क्या समझे डर जाऊँगा
अब भी बचा हूँ कुछ तो नीरव
किया भले सब कुछ अर्पण
टूट न जाऊँ

Tuesday, January 26, 2010

आहट



दूर किसी के आने की आहट मन सुनता है

चिर प्रतिक्षित है आहट ये
और चिरपरिचित भी शायद
पायल की कोई मधुर झंकार मन सुनता है
दूर किसी के....
कोमल पाँवों का स्वागत
फूलों बिछाकर राहों में
काँटे राहों के पलकों से मन चुनता है
दूर किसी के...
ये कर लूँगा वो कर लूँगा
ये मैं दूँगा वो मैं दूँगा
उनके आने से पहले ही सपने मन बुनता है
दूर किसी के...
बहुत दूर से आए हैं
बहुत हैं ये थके-थके
'प्यास लगी है पानी ला' मन सुनता है
दूर किसी के...
नेहिल तेरी चुभन है रे मन
स्वप्निल तेरी है छुअन
यहीं ठहरूँगा अब कहेगा नीरव मन बुनता है
दूर किसी की...

Monday, January 25, 2010

पाषाण नहीं हृदय मेरा

पाषाण नहीं हृदय है मेरा

पूजा नहीं इसे प्यार चाहिए
शासन करना नहीं चाहता
थोड़ा-सा अधिकार चाहिए
कब चाहा भर कर दे साक़ी
दुलार सहित पैमानों में
लेकिन जब मधुशाला जाऊँ
थोड़ी-सी मनुहार चाहिए
देना ही सीखा है अब तक
कुछ पाऊँ नहीं रही यह इच्छा
नेह मुझे भी है इच्छित
नहीं मगर व्यापार चाहिए
संघर्षों में बीता जीवन
दर्द की पहचान मुझे है
काँटे सह लूँ सीने पर
मन को कोमल व्यवहार चाहिए
गले में माला हो फूलों की
नहीं कभी यह स्वीकार मुझे
जब कोई सत्कार्य करूँ
तेरी बाँहों का हार चाहिए
कब मैंने चाहा तन तेरा
मन पर लेकिन अधिकार चाहिए
है तैयार मिटने को नीरव
थोड़ा-सा पर प्यार चाहिए


Saturday, January 23, 2010

फिलासफी



मैंने जीवन को अब पहचाना

कोमल राह चलकर भी
जब पाँव में पड़ गए छाले
अब जाना है कितना कठिन पथरीली राहों पर चल पाना
मैंने जीवन को....
मधु जितनी चाही थी पी
फिर भी पाई कटुता ही अधरों ने
अब जाना है कितना कठिन हलाहल पी जाना
मैंने जीवन को...
गुलशन में फूलों की बहार रही
उमंगों की कलियाँ भी बेशुमार रही
फूल लगे चुभने तब जाना कितना कठिन है शर को गले लगाना
मैंने जीवन को...
पूनम थी जब छाई गगन में
मन में फिर भी अँधियारा था
अब जाना है कितना कठिन मावस की रात बिताना
मैंने जीवन को....
मिला न इच्छित बहुत था ढूँढा
चला छोड़ जब पहला आशियाना
नंगे सिर अब है नीरव कितना कठिन फिर से नीड़ बसाना
मैंने जीवन को....

Thursday, January 21, 2010

मतवाले

हम हैं मस्ती के मतवाले

चले थे तेरी राह में हमदम
पाने के लेकर तुझे इरादे
मिली न लेकिन मंजिल अब तक पाँव में पड़ गए छाले
हम हैं मस्ती के....
सूखा जाता कंठ है हरदम
है ऐंठ रही जुबान भी
मिला न कोई साकी अब तक रीते पड़े हैं प्याले
हम हैं मस्ती के....
अब भी बाकी है अधरों पर
पहले जो मधु तूने दी थी
ऐसे कैसे भूले तुझको आखिर हम भी है दिलवाले

हम हैं मस्ती के....
प्यास हमारी बुझ न पाती
चाहे तू है रोज पिलाती
देखे न होंगे साकी तूने हमसे मय के मतवाले
हम हैं मस्ती के...
ओझल क्यों हो जाती हरदम
बस एक झलक दिखलाकर
तूने बहुत दिया है नीरव कुछ हमसे भी तो पा ले
हम हैं मस्ती के....

Wednesday, January 20, 2010

कर्मं कुरु

अभी मूल्यांकन का वक्त नहीं है

बची अभी है रात अँधेरी
शेष अभी बातें बहुतेरी
अंधकार है कितना छाया सुबह अभी अलमस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
बहुत अभी संघर्ष बचा है
शेष समर है अभी सारथी
ना लौटा रथ रणभूमि से अभी हौसला पस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन ...
साथ बैठकर बाँट ले सुख-दुख
कर लें बातें न फेर अभी मुख
अबके बिछुड़े कब मिले ना कह अभी वक्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
जीवन कर्मों का ही फल है
भाग्य भरोसे आशा निष्फल है
कर सकता बहुत कुछ अभी इतना तो तू व्यस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
कर ले जितना तू कर सकता
पा ले जितना तू पा सकता
यह कह ना बैठ ओ नीरव इच्छाओं का अंत नहीं है
अभी मूल्यांकन...



स्वप्नभंगा


तुमने ही तब डाली चितवन

नैनों जब चाहा मिलना
फूलों ने जब चाहा खिलना
नजरें झुका कर बैठ गए बने रहे हम बेमन
तुम ने ही...
अभी तो भी शुरुआत प्रणय की
अभी तो हुआ विश्वास था
तुमने किया आघात हृदय पर कह 'बस हुआ अवसाद'
तुम ने ही...
आशा को विश्वास हुआ था
सबकुछ तो निश्वास हुआ था
मध्य निशा में चीख हुए तुम भंग हुआ मेरा सपन
तुम ने ही...
अब भी वक्त बचा है नीरव
छोड़ दे अपने संकोचों को
बाहुहार पहना दे मुझको तोड़ ले सारी अनबन
तुम ने ही....

Monday, January 18, 2010

राज

बतला दे कोई मुझको जीवन का अब राज

सीधी-सच्ची राह चला जब
ले मंजिल की चाह चला जब
हर संकेतक ने किया गुमराह टूट चला मन का विश्वास
बतला दे कोई मुझको...
मैंने अपनी राह चुनी जब
निज मंजिल की चाह चुनी जब
तब तुमने क्यों रोका मुझको दे नेह से निज आवाज
बतला दे कोई मुझको...
उन्मुक्त पंछी सा मन मेरा
जब जहाँ चाहा किया बसेरा
नोच दिया मेरे पंखों को बंद किया मेरा परवाज
बतला दे कोई मुझको...
मेरा अपना तब चिंतन था
मेरा अपना तब दर्शन था
मेरा सत्य हुआ खंडित नीरव जब जाना तेरे जीवन का राज
बतला दे कोई मुझको....



Sunday, January 17, 2010

अटूट


विश्वास नहीं फिर भी छूटा

जिसको था अपना जाना
जिसको था अपना माना
मदहोश किया उसी ने पहले
और सभी कुछ लूटा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जिसने था मेरा सच जाना
जिसने था मन को पहचाना
आँखें फेरी उसी ने पहले
और कहा फिर झूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जीने की अपनी शैली थी
मस्ती की अपनी रंगरेली थी
मुझको छीना मुझसे तूने
कैसा ये प्रयोग किया अनूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
हम तो फिर भी जी ही लेंगे
अपने आँसू पी ही लेंगे
पश्चातापों के साए नीरव

ताउम्र करेंगे तेरा ही पीछा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा

Wednesday, January 13, 2010

जिंदादिल मैं रहा सदा


जिंदादिल मैं रहा सदा

दुख था मुझ पर भी छाया
ग़म था मैंने भी पाया
लेकिन अपने मुख पर
रहा खुशी का नूर सदा
यश का गायन भी गाया
ग़ुमनामी को भी पाया
हालातों से किया मुकाबला
तनिक पीछे मैं न हटा
बनाया था जिसको हमराज
उसने ही खोला था राज
बिरले थे हम, हमको भी
भायी उसकी यही अदा
तुम गिला क्यों करते हो
क्यों करते हो शिकवा
अपने जीने का तो नीरव
है अंदाज शुरू से अलहदा
जिंदादिल मैं रहा सदा

Tuesday, January 12, 2010

भावुक....!


अगर भावना में मैं न बहता..

छोड़ सारे स्वजनों को
तोड़ सारे बंधनों को
हो स्वच्छंद जग से
कभी का मैं चल देता
तूफानों के आने से पहले ही
भँवर में जाने से पहले ही
थाम कर पतवार कश्ती को
किनारे पर मैं कर लेता
साकी के आने से पहले ही
प्यालों में जाने से पहले ही
तोड़ कर रस्मों रिवाज,
मधुपातत्रहोंठों पर मैं धर लेता
हमसफर के आने से पहले ही
राह बतलाने से पहले ही
मंजिलों की राह चुनकर
अकेला ही मैं चल देता
घास-फूस तिनका जुटाकर
यत्न से उसको सजाकर
किसी वीरान कोने में
आशियाना मैं बुन लेता
अगर भावना में मैं न बहता

Monday, January 11, 2010

बहुत हुआ.....


साथ नहीं अब दे पाऊँगा
कितनों का है साथ निभाया
कितनों को है राह दिखाई
किंतु मैंने न मंजिल पाई
अब नहीं मैं चल पाऊँगा
कब तक पपीहे-सा मैं गाता
कब तक सूने वन में मंडराता
अब ऋतुराज है बतलाता
शायद ही मैं आऊँगा
हिम्मत तब भी ना हारी थी
चलने की तब भी तैयारी थी
तब तुमने ही बात सुनाई
अब नहीं तुमको पाऊँगा
कर्म में विश्वास बहुत था
आशाओं का साथ बहुत था
उसने ही तब बतलाया
साथ नहीं मैं आऊँगा

शिकवा


वक्त की अगर बेवफाई ना होती

तो तुम आज हरजाई ना होते

कर लेते हम अरमानों को पूरा
स्वप्न जिंदगी का न रहता अधूरा

साथ होता सदा के लिए, और
फिर कभी ऐसी जुदाई न होती

जिंदगी में बाकी रहे ग़म और ग़म
वक्त ने हमें इतना सताया
वक्त ने जो दिया होता साथ अपना
तो दो दिलों की जुदाई न होती

Sunday, January 10, 2010

दो आषाढ़


तड़पने को
क्या कम थी
पहले ही रात
जो उस पे
आ गई
बरसात

Friday, January 8, 2010

कहाँ है युवा शक्ति



खाली क्लासें
खाली कैंटीन
खाली लायब्रेरी
खाली मैदान
खाली कॉलेज
खाली स्टेज
कहाँ हो
मेरे देश के भविष्य
.....................!
या कि हम ही वहाँ नहीं है
जहाँ तुम हो।

शरद-बसंत को दोपहर में

खिड़की से आती धूप/ चमक/ रोशनी
एक माइक्रोस्कोप/
रडार/
लाइट-बीम
बन जाती है,
जिसमें चमकता है
हर जर्रा/
महीन कण/
बारीक रेशे,
जो हल्की-सी आहट/
करवट/
हथेली की जुम्बिश से
उड़ते हैं/
तैरते हैं/
गति करते हैं।
उन्हें देखती है
आँखें/
मन/
आत्मा/
तृप्त होती/
संतुष्ट होती/
भरती है।
सोचता/ महसूसता/
अनुभव करता हूँ—यही कविता है।


Wednesday, January 6, 2010

एक शाम बारिश और आहटों की....




छत पर जमा पानी
की परनाले से आती
जमीन से टकराती ततततड़ततत...
बादलों की
घघघघुघुघुघुघरघघ...
बिजली चमकने के बाद की
धड़धड़धधधधड़....
बादलों की तहें एक-दूसरे को
पार करती हुई
हहहहहड़धहह....।
लोहे के हथोड़े से बनते मकान को-
लकड़ी के पीटे जाने की
ठठठठकठठठ....।
फाटक के खुलने की
तितितितितितिड़तितिति...।
दूर किसी के बोलने की
से....जै....की.....ऐ.....।
कुत्तों के भोंकने की

होंहोंहोंहोंहोंभौंहोंहोंहों.....।
हवा के पेड़ों से टकराने की
ससससरससस....।
और उस पर बारिश की
टपटपटपटपटप...।
और पानी भरे बादलों पर से
हवाओं के गुजरने की
ढढढढढकढढढ.....।
और मेरी........
...........
लिखे जाने की
रररररररसरर.....।

Tuesday, January 5, 2010

क्यों ना जोरी जुड़े....


तुम कहती हो कुछ

जब (एक लंबी कशमकश के पश्चात)
तो लगता है जैसे
काट रही हो
खड़ी पकी फसल (अनिच्छा से)
जैसे चाहती हो कि
सूखी फलियाँ कुछ
और दिन रहें
सूखी शाखों पर
और फिर किसी दिन
हवा के तेज-हल्के
झोंकों से बिखर जाएँ
जिन्हें भुरभुरी जमीन
कर ले आत्मसात
.....
और मैं कहता हूँ जब तब
कुछ
तो लगता है (जानता हूँ मैं तो)
जैसे बो रहा हूँ बीज

Monday, January 4, 2010

इस युगांतर के बाद




फिर करेंगे नई शुरुआत
बसाएँगे फिर नई दुनिया
फिर अँगड़ाई लेगा मन्वंतर
ज्यादा गहराई
सामीप्य और परिष्कार के साथ
लेकिन ज्यादा सहज
और ज्यादा प्राकृत

Sunday, January 3, 2010

6 महीने बाद




इस बार तुम जब लौटोगी
मेरी बाँहों में
तो ये लौटना
चिर-प्रतिक्षित होगा
कितनी आकुलता
बेबसी
शून्यता और तड़फ भरे
काटे ये महीने
दिन, पहर, घंटे और पल।
इतने दिनों में
मैं हुआ हूँ ज्यादा आश्रित
और सहाराप्रिय
और शायद तुम भी
लेकिन लौटी हो नई ऊँचाइयों
और गहरी सोच
और गहरी संवेदना लेकर
ज्यादा समर्थ, ज्यादा समझ
ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा अनुभव लेकर
मैं तट पर बैठा
लहरें गिनता
बाट ही जोहता रहा
और तुम लौट रही हो
गहरे पानी से मोती लेकर

Saturday, January 2, 2010

पिछले सिंहस्थ में




एक लड़की
लंबी दुबली-पतली साँवली-सी
पहना था जिसने
जींस और हाफ शर्ट
पहली-पहली बार
और कमर तक लटकी थी
जिसकी सुगुंफित मोटी चोटी
मेरे साथ थी
पिछले सिंहस्थ में
आज मेरे पास है
थी और भी कई लड़कियाँ
जिनके रंग-रूप पहनावे
लगते थे अच्छे( आज तो कुछ ठीक-ठीक याद भी नहीं)
या याद करना चाहता नहीं
पिछले सिंहस्थ में
जो मेरे आसपास थी
आज न जाने कहाँ हैं
गुम हो गईं है दुनिया के मेले में
क्या इस बार दीख पड़ेंगी औचक

कुंभ के मेले में

Friday, January 1, 2010

मुसीबत तुम्हारी


मेरी सब कविताएँ छप जाएँ...

छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
...............................
मैं तो सह लूँगा
  तुम गह पाओगी

Thursday, December 31, 2009

वियोगी होगा पहला कवि...अन्तिम नहीं !


इस बार तुम्हारी दूरी
   कविता नहीं करवाती है
मुझमें अजब-सा सूनापन
अवसाद, शून्यता और बेचैनी भरती जाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझसे रचना नहीं करवाती है
कर अवश मुझे
दुखी, वियोगी पात्र
जो मैं हूँ' -- बनाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
काव्योचित गरिमा नहीं भर पाती है
प्रेम कहानी के देवदास-नुमा संस्करण को
मेरे बरअक़्स लाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझे कवि नहीं बनाती है
जो दूर है अपनी प्रिया से-छटपटाता, धैर्यहीन
ऐसा ऐतिहासिक पात्र बनाती है


Wednesday, December 30, 2009

प्रेम और रूपांतरण

वो मुझे प्यार कर रही है
मैं बूझ लेता जब वो मुझे बताती
मुझे ठंडी हवाएँ पसंद है
मुझे बारिश बहुत अच्छी लगती है
मुझे रातों को देर तक जागना
और उठना सुबह देर से भी
बहुत पसंद है
मुझे डूबता सूरज और पूरा चाँद
इंतेहाई ढंग से अच्छा लगता है
वो मेरी बाहों में बाँहें डाल
सिर सीने से टिका लेती और मुझे
लगता वो किसी घने छायादार पेड़
के तने को बेहद पसंद करती है
वो मुझे बताती रहती जिसे मैं उसके प्यार की
तरह लेता
मुझे गुलाबी, फिरोज़ी और सफेद रंग पसंद है,
मुझे मछलियाँ, रंग-बिरंगी- पालना पसंद है
मुझे किताबें, क्लासिकल और गज़लें पसंद हैं,
मैं जानता था वो यह कहकर
मुझे प्यार कर रही है
मुझे गुलाब और उससे भी ज्यादा
रजनीगंधा पसंद है-- वो कहती
मुझे कपड़े, खऱीदना, नकली जेवर और
असली मोती पसंद है
मुझे हीरा पसंद है--खरीदना है
मैं जानता था वो मुझे प्यार कर रही है
उसे सेब, संतरे, अमरूद और आम
पसंद है-- मैं जानता हूँ
मैं जानता हूँ, उसे कभी-कभार बाहर जाना
पसंद है--बल्कि इससे भी ज्यादा पसंद है
अपने पसंद की चीजों को इकट्ठा
करने की योजना बनाना
मैं जानता हूँ इस तरह वो मुझे प्यार कर रही है
वो मुझे प्यार करती रही
और मैं समझता रहा कि
वो वह सब कर रही है
जो वह चाहती थी करना
मैं पूरी तरह नहीं तो बहुत हद तक
गलत था--क्योंकि
मैं समझता था, जिस तरह मैं
अपनी पसंद को रूपांतरित कर पाता हूँ
अपने प्रेम में, वो भी कर पाएँगी
करेगी--कर पाती होगी--


Tuesday, December 29, 2009

पंचतत्व




पुराने पत्तों के निशान
पेड़ पर कहाँ रह पाते हैं?
उड़कर वहीं कहीं दफन हो
नए पत्तों के लिए खाद बन जाते हैं...
हम पेड़ नहीं इंसान हैं
गो यादें तो रख पाते हैं
यादों के दर्द तो फिर भी
नए रिश्तों ही के काम आते हैं
इधर से देखो या उधर से
हम सब धीरे-धीरे पेड़ बनते जाते हैं
जितना लेते हैं जमीन से,
हवाओं को उतना अधिक लुटाते हैं...
बीज, जड़ें, अंकुर, पौधा, झाड़ी, पेड़, घना वृक्ष
सीढ़ियाँ हैं चढ़ जाते हैं
जिन पुरखों ने लगाया है, उनकी पीढ़ियों के
कभी दरवाजे, कभी खिड़कियाँ,
कभी कुर्सी मेज, अलमारी बन जाते हैं....
अंत कहाँ है कौन जानता
पेड़ हो या इंसा हो
हवा, मिट्टी, पानी
भूमि, आकाश
जहाँ से आए वहीं चले जाते हैं
(फिर-फिर वापस आते हैं)

Sunday, December 27, 2009

गोवा आकर


न मछली पकड़ूँ
न फैनी, ताड़ी बनाऊँ
लिखूँ कविताएँ, कहानियाँ (शायद)
उपन्यास (निश्चित ही)
और महाकाव्य समुद्र पर
सीख लूँ बजाना
गिटार, मेंडोलिन,
तबला या ड्रम
जब भी मिले तनहाई
मन उदास (गर) हो
उसे बजाऊँ..
मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ
वहाँ मरना नहीं चाहता...

गोवा में जी करता है


मैं यहीं बस जाऊँ

रात को जाल फैलाऊँ
सुबह समेटने जाऊँ
चढूँ नारियल पर
ताड़ी निकाल कर लाऊँ
काजू फल तोड़ू
सड़ाऊँ, भट्टी पर चढ़ाऊँ
फैनी बनाऊँ
मगर, क्या करूँ उन सबका
पिऊँ, न खाऊँ !!

Saturday, December 26, 2009

उलटबाँसी


छोटी-छोटी लहरें

मिलकर बनाती है
एक बड़ी लहर...
.......................

छोटी-छोटी यादें
मगर बनने से रोकती है
एक बड़ी याद....


Friday, December 25, 2009

गोवाः विश्व-गीत




समुद्र भी है
पहाड़ भी
टीला भी है
कछार भी
जंगल भी है
रेत का विस्तार भी
कोई कश्मीर से
कोई लद्दाख से
कोई गुजरात से
कोई महाराष्ट्र से
कोई केरल से
कोई हरिद्वार से
कोई नैनीताल से
कोई राजस्थान से
कोई रूमानिया
कोई फ्रांस से
कोई जर्मनी
कोई जापान से
कोई इटली
कोई इजराइल से
कोई अमेरिका
कोई ब्रिटेन से
कोई क्यूबा
कोई थाईलैंड से
गोवा में आकर
लगता है ऐसे
ग्लोबल बस्ती में
आ गए हों जैसे
गोवा दुनिया का
विश्व गीत हो जैसे

Thursday, December 24, 2009

इन्टेन्स


क्षण नहीं,
उस क्षण को
पकड़ने
हर कोई
बेताब दिखता है
अपना कैमरा, कैनवास,
गिटार और कागज लिए
जो गहनता में बसा है
सबके अंदर

Wednesday, December 23, 2009

सजग मछेरा


हर पल जैसे ,
आकर्षित करता है
समुद्र...
चौबीसों घंटे
कोई-न-कोई
तट पर बैठा,
दौड़ता, टहलता
ध्यानस्थ, योगस्थ
दिख ही जाता है

Tuesday, December 22, 2009

कॉटेज में


-1

सिर से पैर तक
कपड़ों से सामान तक
एक ही चीज
होती है आयात
कॉटेज के अंदर
-कनियाँ रेत की-
सबसे बहुमूल्य सौगात
समुद्र की
बिल्कुल मुफ्त
-2
एक और चीज
साथ आती है
मेरे
नमकीन पसीना
जो कहता है
समुद्र और धूप-स्नान के बाद भी
एक और बार
जरूरी है नहाना

Monday, December 21, 2009

रात भर




समंदर की आवाज आती रही
रात भर
समंदर की हवाएँ इठलाती रहीं
रात भर
लहर पर लहर पर लहर आती रही
रात भर
नींद आती रही, नींद जाती रही
रात भर
मुझको भी खुद -सा बावरा बनाती रही
रात भर
डूबते- उतराते किनारों पे लाती रही
रात भर

Sunday, December 20, 2009

वर्किंग गर्ल




एक लड़की
निकलती है अपने ऑफिस से
प्रत्यंचा से छूटे तीर की तरह
(रास्ते में खरीदते हुए फल जो उसे बेहद पसंद है)
सोचती है
कहीं देर न हो जाए
और
सुननी न पड़े
शिकायत
देखती है न इधर, न उधर
रूकती नहीं चौराहों पर
लाल सिग्नल के
हरे होने से पहले ही
पीली रोशनी में
पड़ती है निकल
डाँटती, झुँझलाती
राह काटते
राहगीरों, वाहन चालकों पर
तेज फर्राटे से चलाती
हुई गाड़ी
दू....र
से नजर आता है,
राह में
उसे लेने
पैदल निकला कोई
भर जाती है
खुशनुमा अहसास से
आ जाती है पास
ताकि दूसरे दिन
फिर
बूमरेंग-सी
निकल सके
घर से....

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