Thursday, May 13, 2010
तब तलक गम को सहेजूँ
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
जार-जार रोता है दिल
रक्तिम है हर कोना
कोई मरहम, मैं पाऊँगा
मुश्किल लगता ऐसा होना
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
तज इसे सकता नहीं मैं
साथ निभ सकता नहीं
मजबूर है हालात इतने
खुल कर रो भी सकता नहीं
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
काश ऐसा हो सके कि
फैल जाए दामन मेरा
फिर जी भर समेटू
बचा जो दर्दों गम तेरा
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
चल रहा हूँ यह सोचकर
वह मुकद्दस वक्त आए
दूर कहीं किसी क्षितिज पर
मिलन तुझसे हो ही जाए
दर्द को समेटू वहाँ तक
तब तलक गम को सहेजूँ
Monday, May 10, 2010
मधु ऋतु
दूर कहीं कोयल बोली
वीरान पड़ा था कब से गुलशन
तितली, भँवरे, माली थे चुप
तनहा-तनहा लगता मौसम
ऐसे में यह मधुबोली
दूर कहीं कोयल बोली
कलियाँ मुस्काएँगी अब
बहारें आएँगी गुलशन में
भँवरे फूलों पर मँडराएँगें
होगी फूलों संग आँख-मिचौली
दूर कहीं कोयल बोली
खुशनुमा होगा हर लम्हा
मधु ऋतु होगी बगियन में
खुशबू से सराबोर होंगी साँसें
रंगों की सजेगी रंगोली
दूर कहीं कोयल बोली
फूलों के संग होगी बातें
कलियों संग कटेगी रातें
स्मित होगी हर अधर पर
नयनों में होगी नीरव बोली
दूर कहीं कोयल बोली
मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मादकता भूला साकी नयनों की
मधु की मदहोशी भूला
प्यालों की खनक पायल झंकार
मधुबाला की डपट-दुलार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
कंचन देह की द्य़ुति भूला
साँसों में महकता कचनार भूला
चपलता भूला मृग नयनों की
ओंठो से हुआ अभिसार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
याद उसे कब कर पाऊँगा
याद उसे कब आऊँगा
दूर बैठा कहीं, मीत मन का
मैं उसे, शायद वह भी है मुझको भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मादकता भूला साकी नयनों की
मधु की मदहोशी भूला
प्यालों की खनक पायल झंकार
मधुबाला की डपट-दुलार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
कंचन देह की द्य़ुति भूला
साँसों में महकता कचनार भूला
चपलता भूला मृग नयनों की
ओंठो से हुआ अभिसार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
याद उसे कब कर पाऊँगा
याद उसे कब आऊँगा
दूर बैठा कहीं, मीत मन का
मैं उसे, शायद वह भी है मुझको भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
Friday, April 30, 2010
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कब तक रचूँ शब्द देह
कब तक कल्पित अभिसार करूँ
कब तक रचूँ मूर्ति कल्पना की
कब तक रचूँ कंचन कामिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी सुहानी रात है यह
कैसी धवल है चाँदनी
मन वीणा के तार कह रहे
छेड़े कोई आकर रति रागिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
प्रीत का कोई गीत गाए
संग प्रिया के मन भी गाए
खोजती है जिनको निगाहें
आ जाओ मधुबन की मालिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी मिलन की यामिनी
कब तक रचूँ शब्द देह
कब तक कल्पित अभिसार करूँ
कब तक रचूँ मूर्ति कल्पना की
कब तक रचूँ कंचन कामिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी सुहानी रात है यह
कैसी धवल है चाँदनी
मन वीणा के तार कह रहे
छेड़े कोई आकर रति रागिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
प्रीत का कोई गीत गाए
संग प्रिया के मन भी गाए
खोजती है जिनको निगाहें
आ जाओ मधुबन की मालिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
Wednesday, April 28, 2010
कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई
कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई
मन उपवन था उजड़ा-सा
पतझड़ था युगों से आँगन में
आई बसंत बहार
लाया उसे बुला कोई
कूक कोयल की, भँवरे का गुँजन
तड़प रहा था, कबसे सुनने को मन
मन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोई
गुलाब खिला, मोगरा महका
संदल चहका, मन खुश्बू से बहका
मन जैसे सोना हुआ
उस पर सुहागा लाया कोई
मन को जैसे पंख लगे
उड़कर आया पास तेरे
पीकर जिसको बहका नीरव
ऐसी मधु लाया कोई
कली चटकी कहीं फूल खिला कोई
मन उपवन था उजड़ा-सा
पतझड़ था युगों से आँगन में
आई बसंत बहार
लाया उसे बुला कोई
कूक कोयल की, भँवरे का गुँजन
तड़प रहा था, कबसे सुनने को मन
मन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोई
गुलाब खिला, मोगरा महका
संदल चहका, मन खुश्बू से बहका
मन जैसे सोना हुआ
उस पर सुहागा लाया कोई
मन को जैसे पंख लगे
उड़कर आया पास तेरे
पीकर जिसको बहका नीरव
ऐसी मधु लाया कोई
कली चटकी कहीं फूल खिला कोई
Saturday, April 24, 2010
पशु का तन जीता
असमंजस में ही वक्त गँवाया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
मन की कल्पना शक्ति ने
जब भी कोई ख्बाव बुना
उलझनों से टकरा कर हरदम
उसने अपना सिर धुना
कवि के भावुक मन से हाय
पशु का तन जीता
भावों के इस तट पर रहा
मेरा गागर रीता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
कई बार दिल ने चाहा
गेसू तले रात बिताना
श्यामल तन से लिपट कर
मधुर-सा एक गीत गाना
मन की इच्छा से हाय
नियति का दानव जीता
गीतों-गज़ल दूर छंदों
से भी रहा अछूता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
दोस्तों ने बहुत उकसाया
स्नेही जनों ने ढाँढस बँधाया
मेरे अंतर्मन ने ही
लेकिन मेरा न कुछ साथ निभाया
अपनों के अपनेपन से
गैरों का बेगानापन जीता
भाग्य को समझा, कर्म को जाना
बिना पढ़े मैंने गीता
असमंजस में ही वक्त गवाँया
युग बीते कुछ ना लिख पाया
Friday, April 23, 2010
तृष्णा बनकर आए कोई
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
जर्जर तन था पहले ही
उस पर ये असीम प्रहार
बना निर्दयी जब जग सारा
लगता कोई नहीं हमारा
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
युग बीते कुछ न लिख पाया
खालीपन जीवन में छाया
प्रेरणा बनकर आए कोई
भर जाए जो रिक्त भावों को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
कुछ भी अच्छा लगता नहीं
कोई आस, कोई अरमां, उमंग नहीं
तृष्णा बनकर आए कोई
जागृत कर दे मेरी इच्छाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
खुद पर ही प्रतिबंध लगाकर
बैठा हूँ निषेध द्वार पर
निर्भय बनकर आए कोई
तोड़े जो सब वर्जनाओं को
कोई आए-सहलाए मेरे घावों को
Thursday, April 22, 2010
दो बूँद हमें भी दो साकी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
माना उजियारा है तेरे आँगन
तेरे आँगन है दीपों की बारात
कवि के मन अंबर में
लेकिन तिमिर निशा है बाकी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
है याद तुझे तेरे आँगन
उजियारे की खातिर
मन को जलाकर अपने
राह तुझे दिखलाई थी
इस भटके राही को मंजिल तक
पहुँचाने की अब तेरी बारी साथी
रोशनी की मधुशाला से
दो बूँद हमें भी दो साकी
मैं यदि उजियारा पाऊँ
तो तुमको उजियारा दूँ
नवगीत लिखूँ, लयबद्ध करूँ
नेह-रश्मियाँ तुम पर बरसाऊँ
मुझको मेरे हिस्से की दो मधु
नीरव मतवाला हो ताकि
Wednesday, April 21, 2010
प्रीत की प्रत्याशा
रे कवि अब बदल ले
अपनी कविता की भाषा
जिसके लिए तू जनम भर
दर्द को पीता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
अश्क बन जीता रहा
देख वो मनमीत तेरे
देख वो हमप्रीत तेरे
तेरे घावों पर नमक छिड़क
मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की अभिलाषा
जिनके लिए तू जनम भर
कोयल बन गाता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
मधुगीत बनाता रहा
देख वो ही तेरे साथी
देख वो ही तेरे प्रीतम
तेरी डोली के आगे
मर्सिया गा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे मधुगीत सुन पाने की आशा
जिनके कदमों के निशां से
तू कदम अपने मिलाता रहा
जिनकी राहों में हरदम तू
दिल अपना बिछाता रहा
देख वो हमराह तेरे
देख वो हमराज तेरे
चौराहे पर तुझे खड़ा कर
अपनी मंजिलों को जा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की प्रत्याशा
अपनी कविता की भाषा
जिसके लिए तू जनम भर
दर्द को पीता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
अश्क बन जीता रहा
देख वो मनमीत तेरे
देख वो हमप्रीत तेरे
तेरे घावों पर नमक छिड़क
मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की अभिलाषा
जिनके लिए तू जनम भर
कोयल बन गाता रहा
जिनके लिए तू जनम भर
मधुगीत बनाता रहा
देख वो ही तेरे साथी
देख वो ही तेरे प्रीतम
तेरी डोली के आगे
मर्सिया गा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे मधुगीत सुन पाने की आशा
जिनके कदमों के निशां से
तू कदम अपने मिलाता रहा
जिनकी राहों में हरदम तू
दिल अपना बिछाता रहा
देख वो हमराह तेरे
देख वो हमराज तेरे
चौराहे पर तुझे खड़ा कर
अपनी मंजिलों को जा रहे हैं
क्या अब भी रखता है तू
इनसे प्रीत की प्रत्याशा
Tuesday, April 20, 2010
रंग अपना बदलना छोड़ दो
मुझको भाता बहुत है साथ तनहाइयों का
हो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
था नाजुक मगर मुझसे टूटा नहीं
काँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दो
तुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ा
इस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दो
कोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगा
मगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दो
जुर्म तुमने किए हमने उफ न किया
नहीं प्यार का यह तरीका इसे छोड़ दो
दिन बदलते है नीरव सबके एक दिन
हर घड़ी रंग अपना बदलना छोड़ दो
हो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
था नाजुक मगर मुझसे टूटा नहीं
काँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दो
तुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ा
इस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दो
कोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगा
मगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दो
जुर्म तुमने किए हमने उफ न किया
नहीं प्यार का यह तरीका इसे छोड़ दो
दिन बदलते है नीरव सबके एक दिन
हर घड़ी रंग अपना बदलना छोड़ दो
Sunday, April 18, 2010
किसके लिए, किसके लिए
लिखूँ किसके लिए, किसके लिए
जिसे लुभाने की खातिर साक़ी बन
मधुमय मधु गीतों को गाता रहा
उसने मुझे विषघट समझ कर
दूर नीरव अधरों से किया
रोऊँ किसके लिए, किसके लिए
जग जो मुझे संताप दे
दर्द दे हृदय पर आघात दे
उनको समझता रहूँ अपना
क्यों अश्रु हँसी में ढाल लूँ
करूँ, किसके लिए, किसके लिए
जिसको समझकर धर्म अपना
मैंने अनवरत पालन किया
जग ने अपनी परिभाषा से
उस कर्म को अधर्म कहा
डरूँ किसके लिए, किसके लिए
अंत के जिस फासले को
बनाए रखा था निरंतर
वो प्रारंभ से साथ मेरे
मुझपर दया से मुस्कुराता रहा
मरूँ किसके लिए, किसके लिए
अपनी छाती को बना ढ़ाल
जिसके हेतु अग्निशर खाता रहा
वो मीत मेरा पीछे खड़ा
कुटिलता से मुस्कुराता रहा
लिखूँ किसके लिए, किसके लिए
मन से दूर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
उन बिन जीवन ऐसे लगता
मानों शरीर बिन प्राण
उन बिन जीवन ऐसे लगता
मानों नौका बिन सागर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
कल जहाँ था कोलाहल
आज वहाँ नीरवता छाई
पायल की झंकार हुई गुम
बजता नहीं कोई नूपुर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
प्यासे को न दो हलाहल
मयकश को न रखो दूर मधु से
जीवन जिसका हो मदहोशी
उसे रहने दो नशे में मग़रूर
खोज कर ला दे कोई उन्हें
जो चले गए हैं मन से दूर
Friday, April 16, 2010
मनमीत नहीं हो पास
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
मन उखड़ा-उखड़ा रहता है
आँखें रहती है खोई सी
जब अश्रु भरे हो नैन
कैसे खुलकर हँस पाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
कंठ अवरूद्ध सा रहता है
स्वर में है नीरवता छाई
जब हृदय में हो तीर चुभे
कैसे मधुगीत गाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जग में है कोलाहल छाया
मन मेरा है निःशब्द सा
ले गया है साज़ कोई
अब कैसे राग बजाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
हर साया लगता है हो मीत
हर आहट लगता हो प्रियतम
खोज में हूँ विरही नीरव की
जिसको पीड़ा अपनी बतलाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
मन उखड़ा-उखड़ा रहता है
आँखें रहती है खोई सी
जब अश्रु भरे हो नैन
कैसे खुलकर हँस पाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
कंठ अवरूद्ध सा रहता है
स्वर में है नीरवता छाई
जब हृदय में हो तीर चुभे
कैसे मधुगीत गाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
जग में है कोलाहल छाया
मन मेरा है निःशब्द सा
ले गया है साज़ कोई
अब कैसे राग बजाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
हर साया लगता है हो मीत
हर आहट लगता हो प्रियतम
खोज में हूँ विरही नीरव की
जिसको पीड़ा अपनी बतलाऊँ रे
कैसे खुल कर हँस पाऊँ रे
जब मनमीत नहीं हो पास मेरे
Thursday, April 15, 2010
एक बात कहूँ
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे मुझ बिन दिन काटे तनहा
कैसे बीती मुझ बिन शामें
देर सुबह तक सोई अधजागी-सी
कैसे जाग कर तुमने काटी अपनी रातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे कलियों के संग मुस्काईं
कैसे फ़ूलों संग मुरझाईं
कभी उजालों से संग सोई
कभी अँधेरों के संग की बातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
कैसे जाड़ों में आ गया पसीना
जब याद किया मेरा चुंबन
घनी छाँव सी शीतलता पाईं
कैसे मेरी याद तले आके
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
सावन कैसे बरसा रिमझिम
कैसे नयनों से आँसू बरसे
कैसे घनघोर घटा छाई
कैसे आईं मुझ बिन बरसातें
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
हम भी एक बात कहें
यदि कह डाली हो तुमने अपनी बातें
काटा है दौरे जुदाई रो-रोकर
नहीं रहे हम भी हँसते-मुस्कुराते
एक बात कहूँ कह-कह कर
कह डाली तुमने सारी बातें
स्वप्निल-सा एक साल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
दुख की चिंता क्यों करूँ
सुख ही सुख है पाया
सब इच्छाएँ पूरी हुईं
मन में रहा न कोई मलाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
प्रतिबंध लगे हो नज़रों पर
दिल पर लगाए पहरे कौन
खुद प्रश्न ही उत्तर हुए
अब पूछे कौन सवाली
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
पूनम का उजियारा भी पाया
मावस का तम भी छाया
झूठा तेरा गुस्सा देखा
देखा शर्म से होना तेरा लाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
देस रहे या रहे विदेस
दिल रहा सदा तुम्हारे पास
चार पहर बारह मास
रहा यही बस एक हाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
बाँके नैन शोख अदा
मीठे बैन चंचल मन
मधुर अधर कोमल तन
मदमाती अँगड़ाई देखी
देखी इठलाई सी चाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
तेरे होंठों पर थी स्मित
मेरी खुशी का ये राज़
नशीली आँखों से न देख नीरव
दिल में उठता है भू-चाल
प्रीत-पंख लगाकर उड़ गया
स्वप्निल-सा एक साल
Monday, April 12, 2010
उड़ जाएगा ये विहग भी
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
एक दिन इसने बड़े जतन से
अपना नीड़ बनाया था
अपने ख़्वाबों सा ही उसको
हर यतन सजाया था
ये मंजिल नहीं रे इसकी
कल ये अपने पथ पर जाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
आया था जब यह मतवाला
हर साक़ी दीवानी थी
अपने हाथों से भर प्याला
करती थी सब मनमानी थी
जिसको सुखकर हो हलाहल
मधुशाला में कब तक रूक पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
गुलशन में जब ये खिला
मौसम का बदला था नज़ारा
इस फूल को पाने हेतु
हर मधुकर ललचाया था
खिलकर मुरझाना नियति सबकी
यह कैसे बच पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
हर खुशी चंद दिन की
बाद अँधेरी रात है
उम्र प्यार की कम होती है
जग देखी ये बात है
आज ही कह ले, कर ले नीरव
यह वक्त न फिर पाएगा
उड़ जाएगा ये विहग भी
पीछे सूना नी़ड़ रह जाएगा
Sunday, April 11, 2010
ख़त
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
दर्द भरे अफ़सानों को,
घोल अश्कों की स्याही में
जज़्बातों को कलम बनाकर
दिल पर उकेरे जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
संबोधन क्या दें? बस
इसी विवशता के कारण
लिफ़ाफ़े में भरकर
कोरे ही भिजवाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
कभी बाद संबोधन के
लरज़ती काँपती ऊँगलियों से
मुश्किल से वही तीन अल्फ़ाज
बार-बार बनाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
ढेर सारा लिखकर भी
और लिखने की ख़्वाहिश से
हाशियों पर तारीफ में
चंद शेर लिख दिए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
लिखने वाला लिखता ही नहीं
पाने वाला पाता ही नहीं
आँखों से आँखों तक लेकिन
रोज़ाना पहुँचाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
कभी हवाओं के दामन पर
कभी बादलों के सीने पर
लिखकर फूलों की खुश्बू से
नीरव तक पहुँचाए जाते हैं
कुछ ख़त यूँ भी लिखे जाते हैं
मधुमौसम में जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
फूल रहे टेसू यहाँ
अमराई बौरा रही
चटख रहा कचनार भी
दहक रहा पलाश
ऐसे मधुमौसम में जाने वाले
विदा प्रिय! हो शुभ चिरप्रवास
स्वर गुंजित रहेगा तेरा
गूँजेगी तेरे पंखों की परवाज
अपने ध्येय को जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
तेरी आहट, तेरी साँसे
और मधु-स्वर तेरा
साथ गुजारे लम्हों की
छोड़े जाना याद
ओ यादों को छोड़े जाने वाले
विदा प्रिय ! हो शुभ चिरप्रवास
Friday, April 9, 2010
कोई नया गीत
मन करता है गीत लिखूँ कोई
शब्द जिसके लड़खड़ा कर
सुरूर में कुछ गा रहे हो
छंद जिसके प्रीत पाकर
मस्ती के लहरा रहे हों
हो मदमस्त जो भी सुने
ऐसा मधुगीत लिखूँ कोई
मन करता है गीत लिखूँ कोई
हीर-राझाँ के तराने
बन जाए जिससे अफसाने
शीरीं-फरहाद के फसाने
हो जाए जिससे पुराने
तेरी आँखों की स्याही से
अधरों पर ऐसी प्रीत लिखूँ कोई
मन करता है गीत लिखूँ कोई
गीत जिसे सुनकर दिलवाले
झूम-झूमकर गाएँ
प्रीत जिसे सुनकर दिलरूबा
मुस्काए आँखों से, होंठों से शरमाए
प्यार करने की निराली
नीरव ऐसी रीत लिखूँ कोई
मन करता है गीत लिखूँ कोई
Sunday, March 28, 2010
शेक्सपियर साहब ! देयर इज़ समथिंग इन नेम ....
जैते नाम तैतै गुन
प्यारु
न्यारु
प्यारी
साली
मोटू
नौटंकी
दुबल्ली
बल्लेबाज
खूबसूरत
सांवली
बिल्लो
बिलाड़ी
बेटू
बिट्टो
रानी
महारानी
धोबन
चुहिया
उईया
शेक्सपियर साहब ! देयर इज़ समथिंग इन नेम ....
Sunday, March 21, 2010
खुशी से मर जाने के दिन
पंख लगाकर उड़ने के दिन आए
सतरंगी लगने लगी दुनिया
आसमाँ आ गया बाँहों में
रंगीन हुए नजारे, फ़िज़ा के
साथ झूमकर गाने के दिन आए
पंख लगाकर...
गुलशन में आ गई बहारें
मौसम खुशनुमा लगता कितना
तितलियों की तरह पंख लगाकर
फूलों पर मँडराने के दिन आए
पंख लगाकर...
एकाध प्याले से अब क्या होगा
प्यासा हूँ मैं जीवन भर का
जब साक़ी बन बैठे खुद तुम
पूरी मधुशाला ही पीने के दिन आए
पंख लगाकर...
जो पल बीते गेसू छाँव तले
जो दिन नीरव साथ गुजारे
उन लम्हों को भर आँखो में
खुशी से मर जाने के दिन आए
पंख लगाकर...
सतरंगी लगने लगी दुनिया
आसमाँ आ गया बाँहों में
रंगीन हुए नजारे, फ़िज़ा के
साथ झूमकर गाने के दिन आए
पंख लगाकर...
गुलशन में आ गई बहारें
मौसम खुशनुमा लगता कितना
तितलियों की तरह पंख लगाकर
फूलों पर मँडराने के दिन आए
पंख लगाकर...
एकाध प्याले से अब क्या होगा
प्यासा हूँ मैं जीवन भर का
जब साक़ी बन बैठे खुद तुम
पूरी मधुशाला ही पीने के दिन आए
पंख लगाकर...
जो पल बीते गेसू छाँव तले
जो दिन नीरव साथ गुजारे
उन लम्हों को भर आँखो में
खुशी से मर जाने के दिन आए
पंख लगाकर...
छोड़ता हूँ साँसें
क्या जीत तुमने यदि जीता
मुझको मेरी दुर्बलता के क्षण में
पहले पहल विश्वास दिलाकर पास बुलाया तुमने मुझको
फिर अपने तीखे नयनों से
घायल कर डाला मन को
यह समर की नहीं रीत प्रिये
जीतना है तो
जीतो मुझे समरांगण में
क्या जीता तुमने..
दूर आसमां में उड़ते पंछी को
प्रीत का चुग्गा दिखाकर
बंद किया लौह पिंजरे में
प्रलोभनों का जाल बिछाकर
यदि सचमुच है मुझसे नेह
तो जाने दो मुझे अपने गगन में
क्या जीता तुमने...
एक प्यासा
देख सुराही पास
देख सुराही पास
आया था तेरी मधुशाला
क्या दोष था उस मतवाले का
जो पिला दिया उसको द्रव काला
भोले को पिला हलाहल कहते हो
है जायज़ सब प्यार और रण में
क्या जीता यदि....
अब तो साँसे उठती गिरती
जुबाँ भी लड़खड़ा रही है
जुबाँ भी लड़खड़ा रही है
तन पर कितने तीर चुभे
मन भी घाँवों से अटा है
अगले युग में तुमको जीतूगाँ नीरव
छोड़ता हूँ साँसें इसी प्रण में
Saturday, March 20, 2010
मेरे गीत पंछी गीत
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
एक पल गूँजे हवा में
दूजे पल हो गए हवा
अनगूँजे से रहे फिज़ा में
मेरे मीत ने क्या इन्हें सुना
किसी ने सुने तो बहका
किसी ने न भी सुने
किसी ने कर दिए
सुनकर भी अनसुने
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
है जब कोई सुनता नहीं
इन दर्द भरे गीतों को
क्यों गाकर मैं दुख अपनाता
प्यास भरी ये दर्दील धुनें
[मेरे गीत पंछी गीत की तरह
अपनी आँखों में भर बेचैनी
नभ में मैं मँडराता हूँ
कह नहीं देता क्यों आँखों से
अब ना कोई ख़्वाब बुनें
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
मेरे स्वर को नेह मिले यदि
गूँज उठे ये अखिल विश्व में
आज तो लेकिन कटू सत्य यह
छंद हैं आधे अधूरे अनमने
एक पल गूँजे हवा में
दूजे पल हो गए हवा
अनगूँजे से रहे फिज़ा में
मेरे मीत ने क्या इन्हें सुना
किसी ने सुने तो बहका
किसी ने न भी सुने
किसी ने कर दिए
सुनकर भी अनसुने
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
है जब कोई सुनता नहीं
इन दर्द भरे गीतों को
क्यों गाकर मैं दुख अपनाता
प्यास भरी ये दर्दील धुनें
[मेरे गीत पंछी गीत की तरह
अपनी आँखों में भर बेचैनी
नभ में मैं मँडराता हूँ
कह नहीं देता क्यों आँखों से
अब ना कोई ख़्वाब बुनें
मेरे गीत पंछी गीत की तरह
मेरे स्वर को नेह मिले यदि
गूँज उठे ये अखिल विश्व में
आज तो लेकिन कटू सत्य यह
छंद हैं आधे अधूरे अनमने
Friday, March 19, 2010
तन्हाई के साथी
चुकने को है जीवन की मधुता
अब तो हलाहल हैं शेष रहा
कितनी जल्दी पी ली हमने
सुख के लम्हों की मदिरा
जाने को है मधुबाला अब तो
रीता मधुघट ही निःशेष रहा
कितना मधुमय था तब आलम
जब हम मधुशाला में आए
महफिल में जब हम थे साक़ी को
दूजा न कोई विशेष रहा
क्या खबर थी इतनी कम
होती है उम्र मतवालों की
मदहोशी में क्यों डूबे हम
क्यों न वक्त का हमको होश रहा
चुन लूँ खंडित सागर, टूटे प्याले
मधुमय यादें, मधुमय बातें
तन्हाई के यही साथी
मधुमय युग का इतना ही अवशेष रहा
पिएँगे हलाहल भी उतने ही प्यार से
जितने प्यार से पी थी मदिरा
यम पूछेगा अंतिम इच्छा नीरव
कहेंगे रख ले साक़ी का वेश जरा
Wednesday, March 17, 2010
खुद से हूँ अनजान
पहचान मेरी मुझको करा दे कोई
हरपल बदलते हैं आचार
हरपल बदलते हैं विचार
कारण इस परिवर्तन का आकर मुझे बता दे कोई
कभी सोचता हूँ, ये न करूँगा
कभी सोचता हूँ, ये ही करूँगा
परिभाषा मेरे कर्मों की मुझको अब समझा दे कोई
कभी देखा अँखियन में खुद को
कभी देखा दर्पण में खुद को
बदला-बदला सा लगा जब भी मुझको दिखा कोई
आँसुओं से प्यास बुझी कभी
कभी प्यासा लौटा मधुशाला से
हलाहल और मधु में अंतर मुझको बतला दे कोई
कभी भावशून्यता रही मन में
कभी भाव अधिकता से कारण
कह न सका बातें मन की संदेश उन तक पहुँचा दे कोई
भाग्य भरोसे कभी बैठकर
कभी मान कर्म को जीवन
नीरव चाहा पाना न मिला मिला दूजा ही कोई मुझको कोई
यही सीख तेरी
जब भी याद किया किसी को
मुझको तेरी याद ही आई प्रिय
देस में परदेस में
तट में, पनघट में
राह में, भवन में
मझधार में, गगन में
जब भी देखा किसी को
तू ही दी दिखलाई प्रिय
मेले में, अकेले में
बाँसुरी पर, शहनाई पर
भीड़ में, तनहाई में
मृदंग पर, ढपली पर
जब भी कोई गूँज सुनी
तेरी आवाज ही आई प्रिये
मंदिर में, मस्जिद में
गिरजा में, गुरुद्वारे में
शबद में, प्रार्थना में
पूजा में, अजान में
प्यार करो यही सीख तेरी
पड़ी सभी जगह सुनाई प्रिय
Tuesday, March 16, 2010
खोजने स्वयं को.....?
निकला हूँ खोजने स्वयं को
जो कभी बसता था मुझमें
जो कभी रचता था मुझमें
नादानी या भूल में छोड़कर
चला गया है जाने कहाँ मुझको
निकला हूँ खोजने स्वयं को
घोर, वन पथरीली राहों में
खिलते चमन, खिजाँ की हवाओं में
सारी दुनिया में, इन बेचैन निगाहों में
ढूँढ़ा है अपने उस रूठे प्रियतम को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
रे तू छिपा है कहाँ पर
पूछता पाता न उत्तर
क्लांत नीरव ढूँढ आया
धरती, सागर और गगन को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
फिर अचानक वही मधुर स्वर
कान में ये कह रहा है
तू जिसे खोजता वह मिलेगा
भीतर हीदेख जरा अपने मन को
निकला हूँ खोजने स्वयं को
Saturday, March 13, 2010
चलो चल दें यहाँ से
सड़क के दोनो ओर से पेड़ कट गये
हरे-भरे शहर के जैसे पर कतर गये
वैसे भी मयस्सर नहीं थी ताजादम हवा
उस पर बुज़ुर्गों के भी साये हट गये
रातों को बहुत सब्जोहसीं हो गया मंजर
चौराहों पे नकली दरख्त बिजली से सज गये
कैसे कोई ढ़ूढ़ेगा तेरा पता शहर में
पुराने बरगद मोड़ोगलियों से कट गये
घबरा के अब कहीं जा भी नहीं सकते
गाँव भी सब शहरों से सट गये
Wednesday, March 10, 2010
पूजा से प्यार तक
मंदिर में जाने से अच्छा
किसी बाग में तुझसे मिलने आऊँ
किसी देव की आराधना से अच्छा है
तनहाई में यादों के ख्वाब सजाऊँ मैं
घड़ियाल बजाने से अच्छा
तेरे पायल की झंकार सुनुं
माला जपने से अच्छा है
तुझ तक खत भिजवाऊँ मैं
होम-हवन से अच्छा
प्रियतम, तेरे होंठों का चुंबन
प्रार्थना करने से अच्छा है
गीत प्यार का गाऊँ मैं
आरती उतारने से अच्छा
तेरे रूप का गुणगान करूँ
सिंदूर चढ़ाने से अच्छा है
प्रियतम की माँग सजाऊँ मैं
कदली-फल खाने से अच्छा
तेरे हाथों से अंगूर चखूँ
चरणामृत पीने से अच्छा है
तेरी मधुशाला में आऊँ मैं
भक्त कहाने से अच्छा
मस्ती का मतवाला कहलाऊँ
पुजारी कहलाने से अच्छा है
दुनिया मैं दीवाना कहलाऊँ मैं
नहीं चाहता मैं कोई वर
नास्तिक हूँ, फिर क्यों आस्तिक बन
पत्थर को शीश झुकाऊँ
मेरा पूजन-आराधना, अर्पण-तर्पण, व्रत-विधान तू
तू ही मेरा सब कुछ नीरव, तुझ पर बलिहारी जाऊँ मैं
Tuesday, March 9, 2010
अब भी तू ही
बात है ये तेरे ही होंठो की
सुख के दिन हो, दुख की रातें
खत्म ना होगी, प्यार की बातें
तूफां आएँ चाहे कितने जीवन में
रहेगी नैया एक ही प्रियतम अपनी
बात है ये तेरे ही होंठो की
भूलेंगे नहीं कभी कहा था, तूने
आँखों में भर प्यार जहाँ का
इन आँखों में तो अब भी तू ही,
बदली तेरी परिभाषा ही जीवन की
बात है ये तेरे ही होंठो की
तेरे शब्दों को तो मैंने हरदम
पूजा का-सा मान दिया
गिला है तुझसे बस इतना ही
तूने प्यार को समझा कायरता मेरी
बात है ये तेरे ही होंठो की
जो आज मुझको आज रूलाती है
काश कि पहले जाना होता
तू नहीं वो थी छवि तेरी
बात है ये तेरे ही होंठो की
Saturday, March 6, 2010
जीत ले सारा चमन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
तू जिसको कहता नियति
नहीं है वह स्वीकार मुझे
होगी लड़ाई लड़ना अस्तित्व की
छोड़ करना सबको सादर नमन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
तोड़ना होगा तुझको बहुत कुछ
नज़ाकत अपनी न देख
हाथ जो तुझको लगाए
छेद दे उसका बदन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
किस सोच में है तू डूबा
लग रहा अजीब ये सब तुझे
धर्म के लिए तू लड़ रहा
स्वार्थ है तेरा अति पावन
स्वार्थ है तेरा अति पावन
बना पहचान अपनी जीत ले सारा चमन
रोना-धोना छोड़ रे आज तेरा है गुलशन
Friday, March 5, 2010
फीका है सारा चमन
आज फीका लगता है सारा चमन
पाला था जिसको जतन से
अश्रु-स्वेद-रक्त के हवन से
तोड़ डाला किसने जाने
ये खिलखिलाता सुमन
आज फीका लगता है सारा चमन
तोड़ कर टहनी से उसको
मैं अपना घर सजा लूँ
थी नहीं ये इच्छा, सोचा था
देखता रहे उसे गुलशन
आज फीका लगता है सारा चमन
सारा बाग जब था खिला
वो अकेला मुरझा रहा था
पूछने पे कारण उसने बताया
मुझको न जमीं मिली
न ही मिला गगन
आज फीका लगता है सारा चमन
Tuesday, March 2, 2010
अस्तित्व संकट
तुम्हारी याद
कंकड़ों की तरह
अगर गिरती रही
मेरे मन सरोवर में
इसी तरह
तो मुझे लगता है
यकीनन
लगने लगेगी
एक टापू-सी
................
और तब
मैं अपनी
वजह से नहीं
तुम्हारी यादों के
टापू के कारण
पहचाना जाऊँगा
शायद
यही है
मेरे अस्तित्व की नियति
नई ऊर्जा
मैं
हर बार
कविता लिखकर
यही सोचता हूँ कि
अब
अगली बार
नहीं लिख पाऊँगा
कोई कविता
कहाँ से लाऊँगा
फिर से
इतने भाव
भंगिमाएँ
भावनाएँ
शब्द
औऱ अर्थ औऱ इनका समन्वय...
किंतु
न जाने कब
मन की टीस
लरज उठती है
घाव हो जाते हैं
हरे फिर से
और दर्द की ये कसक
अंदर बैठे भावुक रचनाकार को
दे जाती है
नई ऊर्जा
नई प्रेरणा
नई शक्ति
और तब
आहत मन से
कलम से
उमड़ पड़ती है
नई कोई कविता
हर बार
कविता लिखकर
यही सोचता हूँ कि
अब
अगली बार
नहीं लिख पाऊँगा
कोई कविता
कहाँ से लाऊँगा
फिर से
इतने भाव
भंगिमाएँ
भावनाएँ
शब्द
औऱ अर्थ औऱ इनका समन्वय...
किंतु
न जाने कब
मन की टीस
लरज उठती है
घाव हो जाते हैं
हरे फिर से
और दर्द की ये कसक
अंदर बैठे भावुक रचनाकार को
दे जाती है
नई ऊर्जा
नई प्रेरणा
नई शक्ति
और तब
आहत मन से
कलम से
उमड़ पड़ती है
नई कोई कविता
Monday, March 1, 2010
1 मार्च.......
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
जीवन का सुख पाओ तुम
महके जीवन की बगिया और
नेह सदा बरसाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
तेरे मन की इच्छाएँ
सदा सफलता को चूमे
जो चाहो वो मिले सदा
मनचाहा ही पाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
मौसम तुम्हारे दास बने और
मौसम तुम्हारे दास बने और
ऋतुएँ तुम्हारी हो दासी
जब चाहो बहार ले आओ
चाहो जब सावन बन जाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
तेरे प्यार में शायर बनकर
तेरे रूप पर लिखूँ गज़ल
सदा गुनगुनाता रहूँ तुम्हें
गीत मेरा बन जाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
रहो सलामत ओ मीत मेरे
हो खुशियों से अनुबंध सदा
सौ साल जियो प्यार मेरे
उम्र नीरव की भी पाओ तुम
जन्मदिन तुम्हें मुबारक साथी
Sunday, February 28, 2010
कई रातों को ऐसा भी होता है
कई रातों को ऐसा भी होता है
कि नींद नहीं आती,
बिल्कुल नहीं
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद।
कई रातों को ऐसा भी होता है
तब बेचैन सा में,
बिस्तर पर बदला करता हूँ
करवटें
और हर करवट़
छोड़ जाती है
छोड़ जाती है
मन की चादर पर
तेरी यादों की
नई सिलवट।
कई रातों को ऐसा भी होता है
कभी तकिए को
लेटा हूँ
बाँहों में,
कभी बाँहों को,
बनाता हूँ तकिया,
कभी चौंक कर
जलाता हूँ बिजली
कभी अँधेरों को
मीत बनाता हूँ
करता हूँ
गुफ्तगू
लेकिन नींद तब भी नहीं आती,
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद
कई रातों को ऐसा भी होता है
और तब तेरी यादों के
ताने-बाने बुनता है
मन
और उधेड़ता फिर से
उनको
इसी उधेड़बुन में
अचानक
ना जाने कब
आँखें बुनने लगती हैं, ख्वाब
तेरे ख्वाब.........
कई रातों को ऐसा भी होता है
Friday, February 26, 2010
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम पूजो यदि पत्थर
वो देवता बन जाए
मैं यदि देव को
तो वो पत्थर हो जाए
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम्हारी कश्ती तो मझधारों
से भी बचकर आ जाए
मेरी कश्ती लेकिन हरदम
किनारों से ही धोखा खाए
अपने-अपने भाग्य की बात
तुम चलो यदि राह कँटीली
वह राह सरल हो जाए
मैं चलूँ राह कोई भी
वह काँटों से भर जाए
अपने-अपने भाग्य की बात
सूख रहा हो कंठ तुम्हारा
साक़ी तुम तक चल कर आए
यह तृषित नीरव हरदम
हलाहल ही पाए
अपने-अपने भाग्य की बात
Sunday, February 21, 2010
फिर से वही वीराने
फिर से वही तनहाईयाँ
फिर से वही वीराने
तू कल चला जाएगा
हम हो रहेंगे दीवाने
हम हो रहेंगे दीवाने
नजरों पर पहरे होंगे
जुबां पर होंगे ताले
तू तो समझेगा कि
हम हो गए बेगाने
तू कल चाहे हमको भूले
हम न भूल सकेंगे
जिंदगी के साज़ पर छेड़े
तूने जो मस्ती भरे तराने
काश कि तू जान सके
मजबूर हम थे कितने
तेरी याद में काटे हैं
रो-रो कई जमाने
पत्थरदिल
अपने अंतर के खुशी और ग़म
घोल स्मृति प्याले में
मैंने कितने नग़मे गाए
तेरे मुँह से वाह न आई
तेरी खातिर इस दुनिया में
दिल पर कितने ज़ख़्म थे खाए
तुझको सब ये ज़ख़्म दिखाए
तेरे मुँह से आह न आई
तेरे प्यार की खातिर नीरव
जग में हम बदनाम हुए
दास्तां ए बरबादी सुनकर
तुझको मुझ पर चाह न आई
तेरी कोमल राहों पर भी
मैंने सदा बिछाया दिल
मैं चला राह पथरीली
तुझको मेरी परवाह न आई
हम तो फिर भी है दिलवाले
शिकवा करने न आएँगें
तू चल कर आएगी इक दिन
न काटा जाएगा दौर ए तन्हाई
Friday, February 19, 2010
अजीब सी रीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
हैं ना जाने वो कहाँ पर
ना कोई सुराग ना कोई खबर
बैठा हूँ निढ़ाल सा अब तो
अकेला ही सहलाता अपने पाँव विथकित
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
जग में जब भी बेचैनी पाऊँगा
सोचा था – आवाज दे तुझे बुलाऊँगा
किंतु मेरा स्वर ही वादियों में अब तो
गूँजकर आता है मेरी ओर विपरित
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
उन गीतों को कैसे दोहराऊँ
जो सुख के क्षणों में थे गाए
दर्द-ए-दिल ही बढ़ाते अब तो
वापस ले ले खुशी के गीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
चार दिन जो प्रिय संग रहेगा
फिर उम्र भर तनहा फिरेगा
ढूँढता फिर रहा नीरव अब तो
चलाई जिसने ये अजीब सी रीत
उनके स्वप्न ही साथी अब तो
जो थे कभी मन के मीत।।
Tuesday, February 16, 2010
नियति का क्रूर व्यंग्य...
नियति का ये क्रूर व्यंग्य
तब मन से सहा नहीं जाए
जब कोई प्यासा पनघट आए
रीता कंठ और प्यासी आँखें लिए
पनिहारिन को न पाकर
लड़खड़ाता वापस पथ को जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
उम्र भर जिसने पी हो मधु
साक़ी के हाथों ही मनुहारों से
टूटी-सी प्याली में हलाहल
उसको अंतिम बार पिलाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
मन की शहनाई पर जिसने
हरदम राग खुशी का गाया हो
उसके अरमानों के आगे
मोम़िन मर्सिया गाने आए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
सबकी राहों में बिखरे फूल
इस जतन में जिसने उम्र गवाँई
उस नीरव के सिर पर
ताज काँटों का पहनाया जाए
नियति का ये क्रूर व्यंग्य...
Monday, February 15, 2010
तनहाई
कितनी जल्दी बीते वे दिन
जबकि हम-तुम साथ रहे
युग बीते यों पल बीते
तनहाई हम काट रहे
पल भर तुमसे नजरें मिलती
लगता बहार आ गई चमन में
अब तो खिज़ां है सब ओर
चार दिन हम बीच बहार रहे
अब तो तेरी आहट सुनने को
हरदम दिल मचलता है
कितने नादाँ थे हम तब
जो तेरी पायल से बेजार रहे
चीख मेरी दबकर के रह गई
शहनाई की गूँज तले
कितनी जल्दी डोली सज गई
कितनी जल्दी कहार गए
Sunday, February 14, 2010
कई रातों को ऐसा भी होता है
कई रातों को ऐसा भी होता है
कि नींद नहीं आती,
बिल्कुल नहीं
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद।
कई रातों को ऐसा भी होता है
तब बेचैन सा में,
बिस्तर पर बदला करता हूँ
करवटें
और हर करवट़
छोड़ जाती है
छोड़ जाती है
मन की चादर पर
तेरी यादों की
नई सिलवट।
कई रातों को ऐसा भी होता है
कभी तकिए को
कभी तकिए को
लेटा हूँ
बाँहों में,
कभी बाँहों को,
बनाता हूँ तकिया,
कभी चौंक कर
जलाता हूँ बिजली
जलाता हूँ बिजली
कभी अँधेरों को
मीत बनाता हूँ
मीत बनाता हूँ
करता हूँ
गुफ्तगू
लेकिन नींद तब भी नहीं आती,
आती है तो बस
आती है तो बस
याद आती है
तेरी याद
कई रातों को ऐसा भी होता है
और तब तेरी यादों के
ताने-बाने बुनता है
मन
और उधेड़ता फिर से
उनको
इसी उधेड़बुन में
अचानक
ना जाने कब
आँखें बुनने लगती हैं, ख्वाब
तेरे ख्वाब
कई रातों को ऐसा भी होता है।
करता रहूँ तुझसे अभिसार
साथी मेरे मन को ले चल से मझधार
तुम थामो पतवार नेह की
मैं गाऊँ झूमकर गीत मल्हार
साथी मेरे मन को...
अपने दिलों की नैया बनाकर
प्रीत के चप्पू चलाकर
चल दे दूर कहीं यहाँ से
हो इस स्वप्निला पर सवार
हो इस स्वप्निला पर सवार
साथी मेरे मन को...
सेज अब इसमे सजेगी
डोली भी यही बनेगी
कितनी सुंदर विदाई होगी
सागर बना हो जिसमें कहार
साथी मेरे मन को...
अब यहीं जीवन कटे
माझी की इच्छा यही
जब तक न साहिल मिले
करता रहूँ तुझसे अभिसार
करता रहूँ तुझसे अभिसार
साथी मेरे मन को...
Friday, February 12, 2010
छोड़ चला मेरा साया
खुलकर जब भी हँसना चाहा
दिल जाने क्यों भर आया
खुशी हरदम बेगानी निकली
खुशी हरदम बेगानी निकली
गम को अपना पाया
मधुशाला में था कोलाहल
मन मेरा भी मतवाला था
मधु को जब भी चखना चाहा
बस हलाहल ही पाया
दिन अकेले ही बिताकर
शाम को तनहा बनाकर
रात को जब साथ चाहा
स्वप्न सजा न पाया
सुबह जब होने को थी
दिल बहकने लगा था
जग को जगाने लेकिन
मन पंछी चहचहा न पाया
रिश्ते नातों को भुलाकर
जब चल पड़ा यायावर
साथ जिसको रहना था हरदम
वो भी छोड़ चला मेरा साया
अर्पित तुमको ही
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
शब्द मेरे खोए रहते
कभी लयबद्ध न हो पाते
तुम ना होते तो प्रिय
मेरे भाव होते विपरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
सब कुछ सूना-सूना रहता
रूखा-रूखा रहता जीवन
तेरी आहट से ही जाना
कैसा होता है संगीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
तुमने मुझको शब्द दिए
अर्थ भी समझाए तुमने
अर्थ भी समझाए तुमने
छंद बने, सुरबद्ध हुए
और बने तब ये गीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
अब भी कुछ बाकी है
अंतर से आती आवाज
किंतु न ये बाहर आएँगें
तुम न करोगे यदि इनको मुखरित
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
जब भी मैं कुछ नया लिखूँगा
भेंट रहेगा तुमको नीरव
मैं हरदम रहूँगा लिखता
तुम देते रहना मुझको प्रीत
अर्पित तुमको ही प्रिय मेरे
लिखित-अलिखित सब गीत
Thursday, February 11, 2010
कब तक धीरज रखूँ
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
युगों-युगों से प्रतीक्षारत था
बैठा मौन अटल किंतु विकल
ना तुम आते हो, ना आता है तुम्हारा कोई संदेश पवन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
घोर वन अँधेरी राहें
मौन हृदय बेचैन निगाहें
ना तुम बतलाते हो
ना कोई बतलाता है राह गगन से
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
लय मेरी टूटी जाती है
छंद विस्मृत हो रहे
ना तुम गाते हो
ना गाता है कोई गीत मिलन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
बने निर्दयी इतने तुम कैसे
क्या याद तुम्हें ना आई होगी
जो सचमुच तुम भूले नीरव शाप लगेंगे तुम्हें विरहन के
कब तक धीरज रखूँ कब तक आस बँधाऊ मन को मन से
Wednesday, February 10, 2010
ये कैसा बँटवारा
क्यों मेरे घर अँधियारा है
दीप मेरे क्यों जल ना पाते
हर जतन अपनाता हूँ
तुमको उजाला, मुझको अँधियारा हरदम
ये कैसा बँटवारा है
रोशन जब सबका...
मुझको भी तेरी चाह प्रिये
तुझको भी मुझसे प्यार प्रिये
तब मिलन में क्यों ये बाधा
क्या मुझसे बैर तुम्हारा है
रोशन जब सबका...
हर मयकश को मधु पिलाते
मुझको ही बस प्यासा रखते
हम भी मतवाले मधुशाला पर
क्या बनता नहीं हक हमारा है
रोशन जब सबका...
हर कश्ती जब साहिल पाती
मेरी ही क्यों भँवर में जाती
इतना न करो सितम ओ सागर
मुझको भी प्रिय किनारा है
रोशन जब सबका...
गैरों पर यूँ रहमो करम
बस मुझ पर ही जुल्मों सितम
कैसे प्रियतम हो तुम नीरव
ये कैसा प्यार तुम्हारा है
रोशन जब सबका...
Monday, February 8, 2010
बुझता दिया
ढलता जाता जीवन मेरा
जलता जाता तन-मन मेरा
मद्धम-मद्धम साँसे चलती
कंठ अवरूद्ध होता जाता
कुछ चलता कुछ गिरता
इस तरह है आलम मेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
पंखों को आहत कर
तुम तो अपनी राह हुए
अब कैसे मैं उड़ पाऊँगा
दूर बहुत है अभी बसेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
बुझता-बुझता दीपक हूँ मैं
उस पर तुम तूफाँ लाए
अब कैसे मैं जल पाऊँगा
दूर बहुत है अभी सवेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
कर्मों से विश्वास उठा जब
भाग्य को मैंने मान लिया
सबकुछ शायद गलती मेरी
दोष नहीं है कुछ भी तेरा
ढल जाऊँगा जल्द सदा को
बस यादें ही रह जाएँगी
यादों को भी बिसरा देना नीरव
बदला पूरा होगा तेरा
ढलता जाता जीवन मेरा
आशा की परिभाषा
तब आए तुम जब टूट चुकी थी आशा
सपने बहुत सँजोए हमने
थे अरमान बहुत सारे मन में
देर बहुत की प्रिय तुमने
अब टूट चुकी अभिलाषा
सुख सारे त्याग चुका था
दुख को गले लगाया था
अब पहुँचे तुम जब बदल चुकी
सुख-दुख की प्रत्याशा
मन में भावों का तूफान उठा था
शब्दों में न बाँध सका था
भाव बिसरे, शब्द खोए
अब तो है केवल निराशा
स्मृति की मदिरा मन-प्याले में ढाल
जीवन की मधुशाला में
बैठा रहा निढाल
तब आए जब टूट चुका है प्याला
लेकिन अब भी यदि आए हो तुम
सब कुछ नया जुटाऊँगा
नेह तुम्हें अर्पित कर नीरव
आशा की बदलूँगा परिभाषा
Sunday, February 7, 2010
विध्वंस है सृजन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
मन जब-जब आहत होता है,
कुछ न कुछ निर्मित होता है,
है ये कैसी टूटन, जो हरदम रचती है नवीन रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है हो गया हूँ हल्का
कभी सब कुछ, भारी-सा लगता है
है यह कैसा भार,मायावी हैजिसका वजन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
हल्का होकर उड़ता हूँ गगन में.
कभी रसातल में दब जाता हूँ
है यह कैसा बोझ,मुश्किल है जिसको करना वहन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है तोड़ दूँ सब कुछ
कभी घरोंदे बनाने को जी करता है
है यह कैसा स्वप्न,रेशमी है जिसकी छुअन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
मन जब-जब आहत होता है,
कुछ न कुछ निर्मित होता है,
है ये कैसी टूटन, जो हरदम रचती है नवीन रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है हो गया हूँ हल्का
कभी सब कुछ, भारी-सा लगता है
है यह कैसा भार,मायावी हैजिसका वजन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
हल्का होकर उड़ता हूँ गगन में.
कभी रसातल में दब जाता हूँ
है यह कैसा बोझ,मुश्किल है जिसको करना वहन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
कभी लगता है तोड़ दूँ सब कुछ
कभी घरोंदे बनाने को जी करता है
है यह कैसा स्वप्न,रेशमी है जिसकी छुअन,रे मन
यह विध्वंस है या सृजन रे मन!
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- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।






























