Saturday, January 23, 2010

फिलासफी



मैंने जीवन को अब पहचाना

कोमल राह चलकर भी
जब पाँव में पड़ गए छाले
अब जाना है कितना कठिन पथरीली राहों पर चल पाना
मैंने जीवन को....
मधु जितनी चाही थी पी
फिर भी पाई कटुता ही अधरों ने
अब जाना है कितना कठिन हलाहल पी जाना
मैंने जीवन को...
गुलशन में फूलों की बहार रही
उमंगों की कलियाँ भी बेशुमार रही
फूल लगे चुभने तब जाना कितना कठिन है शर को गले लगाना
मैंने जीवन को...
पूनम थी जब छाई गगन में
मन में फिर भी अँधियारा था
अब जाना है कितना कठिन मावस की रात बिताना
मैंने जीवन को....
मिला न इच्छित बहुत था ढूँढा
चला छोड़ जब पहला आशियाना
नंगे सिर अब है नीरव कितना कठिन फिर से नीड़ बसाना
मैंने जीवन को....

Thursday, January 21, 2010

मतवाले

हम हैं मस्ती के मतवाले

चले थे तेरी राह में हमदम
पाने के लेकर तुझे इरादे
मिली न लेकिन मंजिल अब तक पाँव में पड़ गए छाले
हम हैं मस्ती के....
सूखा जाता कंठ है हरदम
है ऐंठ रही जुबान भी
मिला न कोई साकी अब तक रीते पड़े हैं प्याले
हम हैं मस्ती के....
अब भी बाकी है अधरों पर
पहले जो मधु तूने दी थी
ऐसे कैसे भूले तुझको आखिर हम भी है दिलवाले

हम हैं मस्ती के....
प्यास हमारी बुझ न पाती
चाहे तू है रोज पिलाती
देखे न होंगे साकी तूने हमसे मय के मतवाले
हम हैं मस्ती के...
ओझल क्यों हो जाती हरदम
बस एक झलक दिखलाकर
तूने बहुत दिया है नीरव कुछ हमसे भी तो पा ले
हम हैं मस्ती के....

Wednesday, January 20, 2010

कर्मं कुरु

अभी मूल्यांकन का वक्त नहीं है

बची अभी है रात अँधेरी
शेष अभी बातें बहुतेरी
अंधकार है कितना छाया सुबह अभी अलमस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
बहुत अभी संघर्ष बचा है
शेष समर है अभी सारथी
ना लौटा रथ रणभूमि से अभी हौसला पस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन ...
साथ बैठकर बाँट ले सुख-दुख
कर लें बातें न फेर अभी मुख
अबके बिछुड़े कब मिले ना कह अभी वक्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
जीवन कर्मों का ही फल है
भाग्य भरोसे आशा निष्फल है
कर सकता बहुत कुछ अभी इतना तो तू व्यस्त नहीं है
अभी मूल्यांकन...
कर ले जितना तू कर सकता
पा ले जितना तू पा सकता
यह कह ना बैठ ओ नीरव इच्छाओं का अंत नहीं है
अभी मूल्यांकन...



स्वप्नभंगा


तुमने ही तब डाली चितवन

नैनों जब चाहा मिलना
फूलों ने जब चाहा खिलना
नजरें झुका कर बैठ गए बने रहे हम बेमन
तुम ने ही...
अभी तो भी शुरुआत प्रणय की
अभी तो हुआ विश्वास था
तुमने किया आघात हृदय पर कह 'बस हुआ अवसाद'
तुम ने ही...
आशा को विश्वास हुआ था
सबकुछ तो निश्वास हुआ था
मध्य निशा में चीख हुए तुम भंग हुआ मेरा सपन
तुम ने ही...
अब भी वक्त बचा है नीरव
छोड़ दे अपने संकोचों को
बाहुहार पहना दे मुझको तोड़ ले सारी अनबन
तुम ने ही....

Monday, January 18, 2010

राज

बतला दे कोई मुझको जीवन का अब राज

सीधी-सच्ची राह चला जब
ले मंजिल की चाह चला जब
हर संकेतक ने किया गुमराह टूट चला मन का विश्वास
बतला दे कोई मुझको...
मैंने अपनी राह चुनी जब
निज मंजिल की चाह चुनी जब
तब तुमने क्यों रोका मुझको दे नेह से निज आवाज
बतला दे कोई मुझको...
उन्मुक्त पंछी सा मन मेरा
जब जहाँ चाहा किया बसेरा
नोच दिया मेरे पंखों को बंद किया मेरा परवाज
बतला दे कोई मुझको...
मेरा अपना तब चिंतन था
मेरा अपना तब दर्शन था
मेरा सत्य हुआ खंडित नीरव जब जाना तेरे जीवन का राज
बतला दे कोई मुझको....



Sunday, January 17, 2010

अटूट


विश्वास नहीं फिर भी छूटा

जिसको था अपना जाना
जिसको था अपना माना
मदहोश किया उसी ने पहले
और सभी कुछ लूटा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जिसने था मेरा सच जाना
जिसने था मन को पहचाना
आँखें फेरी उसी ने पहले
और कहा फिर झूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
जीने की अपनी शैली थी
मस्ती की अपनी रंगरेली थी
मुझको छीना मुझसे तूने
कैसा ये प्रयोग किया अनूठा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा
हम तो फिर भी जी ही लेंगे
अपने आँसू पी ही लेंगे
पश्चातापों के साए नीरव

ताउम्र करेंगे तेरा ही पीछा
विश्वास नहीं फिर भी छूटा

Wednesday, January 13, 2010

जिंदादिल मैं रहा सदा


जिंदादिल मैं रहा सदा

दुख था मुझ पर भी छाया
ग़म था मैंने भी पाया
लेकिन अपने मुख पर
रहा खुशी का नूर सदा
यश का गायन भी गाया
ग़ुमनामी को भी पाया
हालातों से किया मुकाबला
तनिक पीछे मैं न हटा
बनाया था जिसको हमराज
उसने ही खोला था राज
बिरले थे हम, हमको भी
भायी उसकी यही अदा
तुम गिला क्यों करते हो
क्यों करते हो शिकवा
अपने जीने का तो नीरव
है अंदाज शुरू से अलहदा
जिंदादिल मैं रहा सदा

Tuesday, January 12, 2010

भावुक....!


अगर भावना में मैं न बहता..

छोड़ सारे स्वजनों को
तोड़ सारे बंधनों को
हो स्वच्छंद जग से
कभी का मैं चल देता
तूफानों के आने से पहले ही
भँवर में जाने से पहले ही
थाम कर पतवार कश्ती को
किनारे पर मैं कर लेता
साकी के आने से पहले ही
प्यालों में जाने से पहले ही
तोड़ कर रस्मों रिवाज,
मधुपातत्रहोंठों पर मैं धर लेता
हमसफर के आने से पहले ही
राह बतलाने से पहले ही
मंजिलों की राह चुनकर
अकेला ही मैं चल देता
घास-फूस तिनका जुटाकर
यत्न से उसको सजाकर
किसी वीरान कोने में
आशियाना मैं बुन लेता
अगर भावना में मैं न बहता

Monday, January 11, 2010

बहुत हुआ.....


साथ नहीं अब दे पाऊँगा
कितनों का है साथ निभाया
कितनों को है राह दिखाई
किंतु मैंने न मंजिल पाई
अब नहीं मैं चल पाऊँगा
कब तक पपीहे-सा मैं गाता
कब तक सूने वन में मंडराता
अब ऋतुराज है बतलाता
शायद ही मैं आऊँगा
हिम्मत तब भी ना हारी थी
चलने की तब भी तैयारी थी
तब तुमने ही बात सुनाई
अब नहीं तुमको पाऊँगा
कर्म में विश्वास बहुत था
आशाओं का साथ बहुत था
उसने ही तब बतलाया
साथ नहीं मैं आऊँगा

शिकवा


वक्त की अगर बेवफाई ना होती

तो तुम आज हरजाई ना होते

कर लेते हम अरमानों को पूरा
स्वप्न जिंदगी का न रहता अधूरा

साथ होता सदा के लिए, और
फिर कभी ऐसी जुदाई न होती

जिंदगी में बाकी रहे ग़म और ग़म
वक्त ने हमें इतना सताया
वक्त ने जो दिया होता साथ अपना
तो दो दिलों की जुदाई न होती

Sunday, January 10, 2010

दो आषाढ़


तड़पने को
क्या कम थी
पहले ही रात
जो उस पे
आ गई
बरसात

Friday, January 8, 2010

कहाँ है युवा शक्ति



खाली क्लासें
खाली कैंटीन
खाली लायब्रेरी
खाली मैदान
खाली कॉलेज
खाली स्टेज
कहाँ हो
मेरे देश के भविष्य
.....................!
या कि हम ही वहाँ नहीं है
जहाँ तुम हो।

शरद-बसंत को दोपहर में

खिड़की से आती धूप/ चमक/ रोशनी
एक माइक्रोस्कोप/
रडार/
लाइट-बीम
बन जाती है,
जिसमें चमकता है
हर जर्रा/
महीन कण/
बारीक रेशे,
जो हल्की-सी आहट/
करवट/
हथेली की जुम्बिश से
उड़ते हैं/
तैरते हैं/
गति करते हैं।
उन्हें देखती है
आँखें/
मन/
आत्मा/
तृप्त होती/
संतुष्ट होती/
भरती है।
सोचता/ महसूसता/
अनुभव करता हूँ—यही कविता है।


Wednesday, January 6, 2010

एक शाम बारिश और आहटों की....




छत पर जमा पानी
की परनाले से आती
जमीन से टकराती ततततड़ततत...
बादलों की
घघघघुघुघुघुघरघघ...
बिजली चमकने के बाद की
धड़धड़धधधधड़....
बादलों की तहें एक-दूसरे को
पार करती हुई
हहहहहड़धहह....।
लोहे के हथोड़े से बनते मकान को-
लकड़ी के पीटे जाने की
ठठठठकठठठ....।
फाटक के खुलने की
तितितितितितिड़तितिति...।
दूर किसी के बोलने की
से....जै....की.....ऐ.....।
कुत्तों के भोंकने की

होंहोंहोंहोंहोंभौंहोंहोंहों.....।
हवा के पेड़ों से टकराने की
ससससरससस....।
और उस पर बारिश की
टपटपटपटपटप...।
और पानी भरे बादलों पर से
हवाओं के गुजरने की
ढढढढढकढढढ.....।
और मेरी........
...........
लिखे जाने की
रररररररसरर.....।

Tuesday, January 5, 2010

क्यों ना जोरी जुड़े....


तुम कहती हो कुछ

जब (एक लंबी कशमकश के पश्चात)
तो लगता है जैसे
काट रही हो
खड़ी पकी फसल (अनिच्छा से)
जैसे चाहती हो कि
सूखी फलियाँ कुछ
और दिन रहें
सूखी शाखों पर
और फिर किसी दिन
हवा के तेज-हल्के
झोंकों से बिखर जाएँ
जिन्हें भुरभुरी जमीन
कर ले आत्मसात
.....
और मैं कहता हूँ जब तब
कुछ
तो लगता है (जानता हूँ मैं तो)
जैसे बो रहा हूँ बीज

Monday, January 4, 2010

इस युगांतर के बाद




फिर करेंगे नई शुरुआत
बसाएँगे फिर नई दुनिया
फिर अँगड़ाई लेगा मन्वंतर
ज्यादा गहराई
सामीप्य और परिष्कार के साथ
लेकिन ज्यादा सहज
और ज्यादा प्राकृत

Sunday, January 3, 2010

6 महीने बाद




इस बार तुम जब लौटोगी
मेरी बाँहों में
तो ये लौटना
चिर-प्रतिक्षित होगा
कितनी आकुलता
बेबसी
शून्यता और तड़फ भरे
काटे ये महीने
दिन, पहर, घंटे और पल।
इतने दिनों में
मैं हुआ हूँ ज्यादा आश्रित
और सहाराप्रिय
और शायद तुम भी
लेकिन लौटी हो नई ऊँचाइयों
और गहरी सोच
और गहरी संवेदना लेकर
ज्यादा समर्थ, ज्यादा समझ
ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा अनुभव लेकर
मैं तट पर बैठा
लहरें गिनता
बाट ही जोहता रहा
और तुम लौट रही हो
गहरे पानी से मोती लेकर

Saturday, January 2, 2010

पिछले सिंहस्थ में




एक लड़की
लंबी दुबली-पतली साँवली-सी
पहना था जिसने
जींस और हाफ शर्ट
पहली-पहली बार
और कमर तक लटकी थी
जिसकी सुगुंफित मोटी चोटी
मेरे साथ थी
पिछले सिंहस्थ में
आज मेरे पास है
थी और भी कई लड़कियाँ
जिनके रंग-रूप पहनावे
लगते थे अच्छे( आज तो कुछ ठीक-ठीक याद भी नहीं)
या याद करना चाहता नहीं
पिछले सिंहस्थ में
जो मेरे आसपास थी
आज न जाने कहाँ हैं
गुम हो गईं है दुनिया के मेले में
क्या इस बार दीख पड़ेंगी औचक

कुंभ के मेले में

Friday, January 1, 2010

मुसीबत तुम्हारी


मेरी सब कविताएँ छप जाएँ...

छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
...............................
मैं तो सह लूँगा
  तुम गह पाओगी

Thursday, December 31, 2009

वियोगी होगा पहला कवि...अन्तिम नहीं !


इस बार तुम्हारी दूरी
   कविता नहीं करवाती है
मुझमें अजब-सा सूनापन
अवसाद, शून्यता और बेचैनी भरती जाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझसे रचना नहीं करवाती है
कर अवश मुझे
दुखी, वियोगी पात्र
जो मैं हूँ' -- बनाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
काव्योचित गरिमा नहीं भर पाती है
प्रेम कहानी के देवदास-नुमा संस्करण को
मेरे बरअक़्स लाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझे कवि नहीं बनाती है
जो दूर है अपनी प्रिया से-छटपटाता, धैर्यहीन
ऐसा ऐतिहासिक पात्र बनाती है


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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।