Wednesday, January 13, 2010

जिंदादिल मैं रहा सदा


जिंदादिल मैं रहा सदा

दुख था मुझ पर भी छाया
ग़म था मैंने भी पाया
लेकिन अपने मुख पर
रहा खुशी का नूर सदा
यश का गायन भी गाया
ग़ुमनामी को भी पाया
हालातों से किया मुकाबला
तनिक पीछे मैं न हटा
बनाया था जिसको हमराज
उसने ही खोला था राज
बिरले थे हम, हमको भी
भायी उसकी यही अदा
तुम गिला क्यों करते हो
क्यों करते हो शिकवा
अपने जीने का तो नीरव
है अंदाज शुरू से अलहदा
जिंदादिल मैं रहा सदा

Tuesday, January 12, 2010

भावुक....!


अगर भावना में मैं न बहता..

छोड़ सारे स्वजनों को
तोड़ सारे बंधनों को
हो स्वच्छंद जग से
कभी का मैं चल देता
तूफानों के आने से पहले ही
भँवर में जाने से पहले ही
थाम कर पतवार कश्ती को
किनारे पर मैं कर लेता
साकी के आने से पहले ही
प्यालों में जाने से पहले ही
तोड़ कर रस्मों रिवाज,
मधुपातत्रहोंठों पर मैं धर लेता
हमसफर के आने से पहले ही
राह बतलाने से पहले ही
मंजिलों की राह चुनकर
अकेला ही मैं चल देता
घास-फूस तिनका जुटाकर
यत्न से उसको सजाकर
किसी वीरान कोने में
आशियाना मैं बुन लेता
अगर भावना में मैं न बहता

Monday, January 11, 2010

बहुत हुआ.....


साथ नहीं अब दे पाऊँगा
कितनों का है साथ निभाया
कितनों को है राह दिखाई
किंतु मैंने न मंजिल पाई
अब नहीं मैं चल पाऊँगा
कब तक पपीहे-सा मैं गाता
कब तक सूने वन में मंडराता
अब ऋतुराज है बतलाता
शायद ही मैं आऊँगा
हिम्मत तब भी ना हारी थी
चलने की तब भी तैयारी थी
तब तुमने ही बात सुनाई
अब नहीं तुमको पाऊँगा
कर्म में विश्वास बहुत था
आशाओं का साथ बहुत था
उसने ही तब बतलाया
साथ नहीं मैं आऊँगा

शिकवा


वक्त की अगर बेवफाई ना होती

तो तुम आज हरजाई ना होते

कर लेते हम अरमानों को पूरा
स्वप्न जिंदगी का न रहता अधूरा

साथ होता सदा के लिए, और
फिर कभी ऐसी जुदाई न होती

जिंदगी में बाकी रहे ग़म और ग़म
वक्त ने हमें इतना सताया
वक्त ने जो दिया होता साथ अपना
तो दो दिलों की जुदाई न होती

Sunday, January 10, 2010

दो आषाढ़


तड़पने को
क्या कम थी
पहले ही रात
जो उस पे
आ गई
बरसात

Friday, January 8, 2010

कहाँ है युवा शक्ति



खाली क्लासें
खाली कैंटीन
खाली लायब्रेरी
खाली मैदान
खाली कॉलेज
खाली स्टेज
कहाँ हो
मेरे देश के भविष्य
.....................!
या कि हम ही वहाँ नहीं है
जहाँ तुम हो।

शरद-बसंत को दोपहर में

खिड़की से आती धूप/ चमक/ रोशनी
एक माइक्रोस्कोप/
रडार/
लाइट-बीम
बन जाती है,
जिसमें चमकता है
हर जर्रा/
महीन कण/
बारीक रेशे,
जो हल्की-सी आहट/
करवट/
हथेली की जुम्बिश से
उड़ते हैं/
तैरते हैं/
गति करते हैं।
उन्हें देखती है
आँखें/
मन/
आत्मा/
तृप्त होती/
संतुष्ट होती/
भरती है।
सोचता/ महसूसता/
अनुभव करता हूँ—यही कविता है।


Wednesday, January 6, 2010

एक शाम बारिश और आहटों की....




छत पर जमा पानी
की परनाले से आती
जमीन से टकराती ततततड़ततत...
बादलों की
घघघघुघुघुघुघरघघ...
बिजली चमकने के बाद की
धड़धड़धधधधड़....
बादलों की तहें एक-दूसरे को
पार करती हुई
हहहहहड़धहह....।
लोहे के हथोड़े से बनते मकान को-
लकड़ी के पीटे जाने की
ठठठठकठठठ....।
फाटक के खुलने की
तितितितितितिड़तितिति...।
दूर किसी के बोलने की
से....जै....की.....ऐ.....।
कुत्तों के भोंकने की

होंहोंहोंहोंहोंभौंहोंहोंहों.....।
हवा के पेड़ों से टकराने की
ससससरससस....।
और उस पर बारिश की
टपटपटपटपटप...।
और पानी भरे बादलों पर से
हवाओं के गुजरने की
ढढढढढकढढढ.....।
और मेरी........
...........
लिखे जाने की
रररररररसरर.....।

Tuesday, January 5, 2010

क्यों ना जोरी जुड़े....


तुम कहती हो कुछ

जब (एक लंबी कशमकश के पश्चात)
तो लगता है जैसे
काट रही हो
खड़ी पकी फसल (अनिच्छा से)
जैसे चाहती हो कि
सूखी फलियाँ कुछ
और दिन रहें
सूखी शाखों पर
और फिर किसी दिन
हवा के तेज-हल्के
झोंकों से बिखर जाएँ
जिन्हें भुरभुरी जमीन
कर ले आत्मसात
.....
और मैं कहता हूँ जब तब
कुछ
तो लगता है (जानता हूँ मैं तो)
जैसे बो रहा हूँ बीज

Monday, January 4, 2010

इस युगांतर के बाद




फिर करेंगे नई शुरुआत
बसाएँगे फिर नई दुनिया
फिर अँगड़ाई लेगा मन्वंतर
ज्यादा गहराई
सामीप्य और परिष्कार के साथ
लेकिन ज्यादा सहज
और ज्यादा प्राकृत

Sunday, January 3, 2010

6 महीने बाद




इस बार तुम जब लौटोगी
मेरी बाँहों में
तो ये लौटना
चिर-प्रतिक्षित होगा
कितनी आकुलता
बेबसी
शून्यता और तड़फ भरे
काटे ये महीने
दिन, पहर, घंटे और पल।
इतने दिनों में
मैं हुआ हूँ ज्यादा आश्रित
और सहाराप्रिय
और शायद तुम भी
लेकिन लौटी हो नई ऊँचाइयों
और गहरी सोच
और गहरी संवेदना लेकर
ज्यादा समर्थ, ज्यादा समझ
ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा अनुभव लेकर
मैं तट पर बैठा
लहरें गिनता
बाट ही जोहता रहा
और तुम लौट रही हो
गहरे पानी से मोती लेकर

Saturday, January 2, 2010

पिछले सिंहस्थ में




एक लड़की
लंबी दुबली-पतली साँवली-सी
पहना था जिसने
जींस और हाफ शर्ट
पहली-पहली बार
और कमर तक लटकी थी
जिसकी सुगुंफित मोटी चोटी
मेरे साथ थी
पिछले सिंहस्थ में
आज मेरे पास है
थी और भी कई लड़कियाँ
जिनके रंग-रूप पहनावे
लगते थे अच्छे( आज तो कुछ ठीक-ठीक याद भी नहीं)
या याद करना चाहता नहीं
पिछले सिंहस्थ में
जो मेरे आसपास थी
आज न जाने कहाँ हैं
गुम हो गईं है दुनिया के मेले में
क्या इस बार दीख पड़ेंगी औचक

कुंभ के मेले में

Friday, January 1, 2010

मुसीबत तुम्हारी


मेरी सब कविताएँ छप जाएँ...

छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
...............................
मैं तो सह लूँगा
  तुम गह पाओगी

Thursday, December 31, 2009

वियोगी होगा पहला कवि...अन्तिम नहीं !


इस बार तुम्हारी दूरी
   कविता नहीं करवाती है
मुझमें अजब-सा सूनापन
अवसाद, शून्यता और बेचैनी भरती जाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझसे रचना नहीं करवाती है
कर अवश मुझे
दुखी, वियोगी पात्र
जो मैं हूँ' -- बनाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
काव्योचित गरिमा नहीं भर पाती है
प्रेम कहानी के देवदास-नुमा संस्करण को
मेरे बरअक़्स लाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझे कवि नहीं बनाती है
जो दूर है अपनी प्रिया से-छटपटाता, धैर्यहीन
ऐसा ऐतिहासिक पात्र बनाती है


Wednesday, December 30, 2009

प्रेम और रूपांतरण

वो मुझे प्यार कर रही है
मैं बूझ लेता जब वो मुझे बताती
मुझे ठंडी हवाएँ पसंद है
मुझे बारिश बहुत अच्छी लगती है
मुझे रातों को देर तक जागना
और उठना सुबह देर से भी
बहुत पसंद है
मुझे डूबता सूरज और पूरा चाँद
इंतेहाई ढंग से अच्छा लगता है
वो मेरी बाहों में बाँहें डाल
सिर सीने से टिका लेती और मुझे
लगता वो किसी घने छायादार पेड़
के तने को बेहद पसंद करती है
वो मुझे बताती रहती जिसे मैं उसके प्यार की
तरह लेता
मुझे गुलाबी, फिरोज़ी और सफेद रंग पसंद है,
मुझे मछलियाँ, रंग-बिरंगी- पालना पसंद है
मुझे किताबें, क्लासिकल और गज़लें पसंद हैं,
मैं जानता था वो यह कहकर
मुझे प्यार कर रही है
मुझे गुलाब और उससे भी ज्यादा
रजनीगंधा पसंद है-- वो कहती
मुझे कपड़े, खऱीदना, नकली जेवर और
असली मोती पसंद है
मुझे हीरा पसंद है--खरीदना है
मैं जानता था वो मुझे प्यार कर रही है
उसे सेब, संतरे, अमरूद और आम
पसंद है-- मैं जानता हूँ
मैं जानता हूँ, उसे कभी-कभार बाहर जाना
पसंद है--बल्कि इससे भी ज्यादा पसंद है
अपने पसंद की चीजों को इकट्ठा
करने की योजना बनाना
मैं जानता हूँ इस तरह वो मुझे प्यार कर रही है
वो मुझे प्यार करती रही
और मैं समझता रहा कि
वो वह सब कर रही है
जो वह चाहती थी करना
मैं पूरी तरह नहीं तो बहुत हद तक
गलत था--क्योंकि
मैं समझता था, जिस तरह मैं
अपनी पसंद को रूपांतरित कर पाता हूँ
अपने प्रेम में, वो भी कर पाएँगी
करेगी--कर पाती होगी--


Tuesday, December 29, 2009

पंचतत्व




पुराने पत्तों के निशान
पेड़ पर कहाँ रह पाते हैं?
उड़कर वहीं कहीं दफन हो
नए पत्तों के लिए खाद बन जाते हैं...
हम पेड़ नहीं इंसान हैं
गो यादें तो रख पाते हैं
यादों के दर्द तो फिर भी
नए रिश्तों ही के काम आते हैं
इधर से देखो या उधर से
हम सब धीरे-धीरे पेड़ बनते जाते हैं
जितना लेते हैं जमीन से,
हवाओं को उतना अधिक लुटाते हैं...
बीज, जड़ें, अंकुर, पौधा, झाड़ी, पेड़, घना वृक्ष
सीढ़ियाँ हैं चढ़ जाते हैं
जिन पुरखों ने लगाया है, उनकी पीढ़ियों के
कभी दरवाजे, कभी खिड़कियाँ,
कभी कुर्सी मेज, अलमारी बन जाते हैं....
अंत कहाँ है कौन जानता
पेड़ हो या इंसा हो
हवा, मिट्टी, पानी
भूमि, आकाश
जहाँ से आए वहीं चले जाते हैं
(फिर-फिर वापस आते हैं)

Sunday, December 27, 2009

गोवा आकर


न मछली पकड़ूँ
न फैनी, ताड़ी बनाऊँ
लिखूँ कविताएँ, कहानियाँ (शायद)
उपन्यास (निश्चित ही)
और महाकाव्य समुद्र पर
सीख लूँ बजाना
गिटार, मेंडोलिन,
तबला या ड्रम
जब भी मिले तनहाई
मन उदास (गर) हो
उसे बजाऊँ..
मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ
वहाँ मरना नहीं चाहता...

गोवा में जी करता है


मैं यहीं बस जाऊँ

रात को जाल फैलाऊँ
सुबह समेटने जाऊँ
चढूँ नारियल पर
ताड़ी निकाल कर लाऊँ
काजू फल तोड़ू
सड़ाऊँ, भट्टी पर चढ़ाऊँ
फैनी बनाऊँ
मगर, क्या करूँ उन सबका
पिऊँ, न खाऊँ !!

Saturday, December 26, 2009

उलटबाँसी


छोटी-छोटी लहरें

मिलकर बनाती है
एक बड़ी लहर...
.......................

छोटी-छोटी यादें
मगर बनने से रोकती है
एक बड़ी याद....


Friday, December 25, 2009

गोवाः विश्व-गीत




समुद्र भी है
पहाड़ भी
टीला भी है
कछार भी
जंगल भी है
रेत का विस्तार भी
कोई कश्मीर से
कोई लद्दाख से
कोई गुजरात से
कोई महाराष्ट्र से
कोई केरल से
कोई हरिद्वार से
कोई नैनीताल से
कोई राजस्थान से
कोई रूमानिया
कोई फ्रांस से
कोई जर्मनी
कोई जापान से
कोई इटली
कोई इजराइल से
कोई अमेरिका
कोई ब्रिटेन से
कोई क्यूबा
कोई थाईलैंड से
गोवा में आकर
लगता है ऐसे
ग्लोबल बस्ती में
आ गए हों जैसे
गोवा दुनिया का
विश्व गीत हो जैसे

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।