Friday, January 1, 2010

मुसीबत तुम्हारी


मेरी सब कविताएँ छप जाएँ...

छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
...............................
मैं तो सह लूँगा
  तुम गह पाओगी

Thursday, December 31, 2009

वियोगी होगा पहला कवि...अन्तिम नहीं !


इस बार तुम्हारी दूरी
   कविता नहीं करवाती है
मुझमें अजब-सा सूनापन
अवसाद, शून्यता और बेचैनी भरती जाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझसे रचना नहीं करवाती है
कर अवश मुझे
दुखी, वियोगी पात्र
जो मैं हूँ' -- बनाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
काव्योचित गरिमा नहीं भर पाती है
प्रेम कहानी के देवदास-नुमा संस्करण को
मेरे बरअक़्स लाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझे कवि नहीं बनाती है
जो दूर है अपनी प्रिया से-छटपटाता, धैर्यहीन
ऐसा ऐतिहासिक पात्र बनाती है


Wednesday, December 30, 2009

प्रेम और रूपांतरण

वो मुझे प्यार कर रही है
मैं बूझ लेता जब वो मुझे बताती
मुझे ठंडी हवाएँ पसंद है
मुझे बारिश बहुत अच्छी लगती है
मुझे रातों को देर तक जागना
और उठना सुबह देर से भी
बहुत पसंद है
मुझे डूबता सूरज और पूरा चाँद
इंतेहाई ढंग से अच्छा लगता है
वो मेरी बाहों में बाँहें डाल
सिर सीने से टिका लेती और मुझे
लगता वो किसी घने छायादार पेड़
के तने को बेहद पसंद करती है
वो मुझे बताती रहती जिसे मैं उसके प्यार की
तरह लेता
मुझे गुलाबी, फिरोज़ी और सफेद रंग पसंद है,
मुझे मछलियाँ, रंग-बिरंगी- पालना पसंद है
मुझे किताबें, क्लासिकल और गज़लें पसंद हैं,
मैं जानता था वो यह कहकर
मुझे प्यार कर रही है
मुझे गुलाब और उससे भी ज्यादा
रजनीगंधा पसंद है-- वो कहती
मुझे कपड़े, खऱीदना, नकली जेवर और
असली मोती पसंद है
मुझे हीरा पसंद है--खरीदना है
मैं जानता था वो मुझे प्यार कर रही है
उसे सेब, संतरे, अमरूद और आम
पसंद है-- मैं जानता हूँ
मैं जानता हूँ, उसे कभी-कभार बाहर जाना
पसंद है--बल्कि इससे भी ज्यादा पसंद है
अपने पसंद की चीजों को इकट्ठा
करने की योजना बनाना
मैं जानता हूँ इस तरह वो मुझे प्यार कर रही है
वो मुझे प्यार करती रही
और मैं समझता रहा कि
वो वह सब कर रही है
जो वह चाहती थी करना
मैं पूरी तरह नहीं तो बहुत हद तक
गलत था--क्योंकि
मैं समझता था, जिस तरह मैं
अपनी पसंद को रूपांतरित कर पाता हूँ
अपने प्रेम में, वो भी कर पाएँगी
करेगी--कर पाती होगी--


Tuesday, December 29, 2009

पंचतत्व




पुराने पत्तों के निशान
पेड़ पर कहाँ रह पाते हैं?
उड़कर वहीं कहीं दफन हो
नए पत्तों के लिए खाद बन जाते हैं...
हम पेड़ नहीं इंसान हैं
गो यादें तो रख पाते हैं
यादों के दर्द तो फिर भी
नए रिश्तों ही के काम आते हैं
इधर से देखो या उधर से
हम सब धीरे-धीरे पेड़ बनते जाते हैं
जितना लेते हैं जमीन से,
हवाओं को उतना अधिक लुटाते हैं...
बीज, जड़ें, अंकुर, पौधा, झाड़ी, पेड़, घना वृक्ष
सीढ़ियाँ हैं चढ़ जाते हैं
जिन पुरखों ने लगाया है, उनकी पीढ़ियों के
कभी दरवाजे, कभी खिड़कियाँ,
कभी कुर्सी मेज, अलमारी बन जाते हैं....
अंत कहाँ है कौन जानता
पेड़ हो या इंसा हो
हवा, मिट्टी, पानी
भूमि, आकाश
जहाँ से आए वहीं चले जाते हैं
(फिर-फिर वापस आते हैं)

Sunday, December 27, 2009

गोवा आकर


न मछली पकड़ूँ
न फैनी, ताड़ी बनाऊँ
लिखूँ कविताएँ, कहानियाँ (शायद)
उपन्यास (निश्चित ही)
और महाकाव्य समुद्र पर
सीख लूँ बजाना
गिटार, मेंडोलिन,
तबला या ड्रम
जब भी मिले तनहाई
मन उदास (गर) हो
उसे बजाऊँ..
मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ
वहाँ मरना नहीं चाहता...

गोवा में जी करता है


मैं यहीं बस जाऊँ

रात को जाल फैलाऊँ
सुबह समेटने जाऊँ
चढूँ नारियल पर
ताड़ी निकाल कर लाऊँ
काजू फल तोड़ू
सड़ाऊँ, भट्टी पर चढ़ाऊँ
फैनी बनाऊँ
मगर, क्या करूँ उन सबका
पिऊँ, न खाऊँ !!

Saturday, December 26, 2009

उलटबाँसी


छोटी-छोटी लहरें

मिलकर बनाती है
एक बड़ी लहर...
.......................

छोटी-छोटी यादें
मगर बनने से रोकती है
एक बड़ी याद....


Friday, December 25, 2009

गोवाः विश्व-गीत




समुद्र भी है
पहाड़ भी
टीला भी है
कछार भी
जंगल भी है
रेत का विस्तार भी
कोई कश्मीर से
कोई लद्दाख से
कोई गुजरात से
कोई महाराष्ट्र से
कोई केरल से
कोई हरिद्वार से
कोई नैनीताल से
कोई राजस्थान से
कोई रूमानिया
कोई फ्रांस से
कोई जर्मनी
कोई जापान से
कोई इटली
कोई इजराइल से
कोई अमेरिका
कोई ब्रिटेन से
कोई क्यूबा
कोई थाईलैंड से
गोवा में आकर
लगता है ऐसे
ग्लोबल बस्ती में
आ गए हों जैसे
गोवा दुनिया का
विश्व गीत हो जैसे

Thursday, December 24, 2009

इन्टेन्स


क्षण नहीं,
उस क्षण को
पकड़ने
हर कोई
बेताब दिखता है
अपना कैमरा, कैनवास,
गिटार और कागज लिए
जो गहनता में बसा है
सबके अंदर

Wednesday, December 23, 2009

सजग मछेरा


हर पल जैसे ,
आकर्षित करता है
समुद्र...
चौबीसों घंटे
कोई-न-कोई
तट पर बैठा,
दौड़ता, टहलता
ध्यानस्थ, योगस्थ
दिख ही जाता है

Tuesday, December 22, 2009

कॉटेज में


-1

सिर से पैर तक
कपड़ों से सामान तक
एक ही चीज
होती है आयात
कॉटेज के अंदर
-कनियाँ रेत की-
सबसे बहुमूल्य सौगात
समुद्र की
बिल्कुल मुफ्त
-2
एक और चीज
साथ आती है
मेरे
नमकीन पसीना
जो कहता है
समुद्र और धूप-स्नान के बाद भी
एक और बार
जरूरी है नहाना

Monday, December 21, 2009

रात भर




समंदर की आवाज आती रही
रात भर
समंदर की हवाएँ इठलाती रहीं
रात भर
लहर पर लहर पर लहर आती रही
रात भर
नींद आती रही, नींद जाती रही
रात भर
मुझको भी खुद -सा बावरा बनाती रही
रात भर
डूबते- उतराते किनारों पे लाती रही
रात भर

Sunday, December 20, 2009

वर्किंग गर्ल




एक लड़की
निकलती है अपने ऑफिस से
प्रत्यंचा से छूटे तीर की तरह
(रास्ते में खरीदते हुए फल जो उसे बेहद पसंद है)
सोचती है
कहीं देर न हो जाए
और
सुननी न पड़े
शिकायत
देखती है न इधर, न उधर
रूकती नहीं चौराहों पर
लाल सिग्नल के
हरे होने से पहले ही
पीली रोशनी में
पड़ती है निकल
डाँटती, झुँझलाती
राह काटते
राहगीरों, वाहन चालकों पर
तेज फर्राटे से चलाती
हुई गाड़ी
दू....र
से नजर आता है,
राह में
उसे लेने
पैदल निकला कोई
भर जाती है
खुशनुमा अहसास से
आ जाती है पास
ताकि दूसरे दिन
फिर
बूमरेंग-सी
निकल सके
घर से....

Saturday, December 19, 2009

इतना असली है चेहरा तेरा


मुझे बताने की ज़हमत भी नहीं उठाई जाती
दूर रहा जाता है, कैफ़ियत भी नहीं बताई जाती

तुम डूबे हो खुद में, सीप में कनी की तरह
मैं समंदर में हूँ, इस नमक की कीमत नहीं लगाई जाती

कायनात थी पहले-पहल, दस आयामों में बँटी
जरूर होगी, वरना क्यूँ तेरी तासीर समझ में आई नहीं जाती

हवाओं में खुशबू, फ़िजाओं में मस्ती, हर पेड़ पे फूल खिले हैं
कुदरत जो खेलती होली, हमसे मनाई नहीं जाती

चंद फूल टेसू के इकट्ठा कर, रंग बनाऊँ तुझे लगाऊँ
इतना असली है चेहरा तेरा, नकली गुलाल लगाई नहीं जाती

मेरी गज़ल पूरी होने को आई मगर तुम न आए
जाने क्या रोकता है, आखिरी लाइन लिखी ही नहीं जाती

Friday, December 18, 2009

तुम्हारी याद की कनी



ख़ामोश रहता हूँ कुछ नहीं कहता हूँ
तुम्हारी बदगुमानियाँ चुपचाप सहता हूँ।


तुम्हारा इतराना, इठलाना, बलखाना
पत्थर नहीं हूँ, गोया पत्थर बन रहता हूँ।


गली के मोड़ से आती हो तुम
तुम्हारी पायल की आवाज बूझ जाता हूँ।


मसूड़े दिख रहे होंगे हँसते हुए तुम्हारे
तुम हँसती हो तो दूर से समझ जाता हूँ।


अब बन जाएगा सीप में मोती कोई
तुम्हारी याद की कनी दिल में गहता हूँ।

यकायक अपने ज़द में ले लेता है कोई
बेसाख़्ता उठाता हूँ कलम, गज़ल कहता हूँ।

Thursday, December 17, 2009

इस दुनिया के लोग




प्रेम करो तो चौंकते हैं इस दुनिया के लोग
कतरा के निकलो तो रोकते हैं इस दुनिया के लोग


मैं कितनी उम्मीद से आया था इस शहर में
हर कदम पे नाउम्मीद करते जाते हैं, इस दुनिया के लोग

मेरी पेशानी पे हैं अब भी चिंता की लकीरें
गले में फूलों को हार पहनाते हैं, इस दुनिया के लोग

मैं अपनी ही दुनिया में गुम रहना चाहता हूँ
मुझे खींच के इस दुनिया में ले आते हैं, इस दुनिया के लोग


हँस लो मेरे हालात-ए-जुनूँ पे तुम भले आज
कल मेरी बहकी बातों को फ़लसफ़ा बताएँगे इस दुनिया के लोग

मैं अपनी धुन का पक्का हूँ जिस तरह
मेरी कब्र भी वैसी पक्की बनवाएँगें, इस दुनिया के लोग

Wednesday, December 16, 2009

समंदर




सुबह सहलाता है
दोपहर नहलाता है
रुमानी हो जाता है शाम को
रात को दहलाता है
है तो एक ही,
मगर आठ पहर में
सोलहों श्रंगार दिखलाता है

Tuesday, December 15, 2009

गोवा




उन्मुक्त,आधे चाँद की रात है
सुरीला सागर तट है
नारियल-वन की सौगात है
सागर सुनती तुम हो
हाथ में कापी-कलम
लहरों की दवात है
मैं नशे में हूँ यूँ ही
काजू-फेनी की क्या औकात है

Monday, December 14, 2009

' म '




देश को
पुर्तगाल-संस्कृति की
देन-विरासत(म)

पंजिम
वास्को-डि-गाम
लुटालिम
पलेम
कानकोनम
पलोलेम
और
.................

हम.......

Sunday, December 13, 2009

नफ़ासतपसंद




कभी झींगा
कभी स्टारफिश
कभी केंकड़ा
कभी शंख-सीपी
कभी संरचना अनाम
फेंक-फेंक-सा देता है
समुद्र
कूड़े-सा किनारे पर
.......................
कचरा कभी अपने साथ
नहीं ले जाता
समुद्र

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।