Saturday, December 12, 2009

शास्त्रीय




कभी मंद
कभी द्रुत
कभी विलंबित
कभी सतत्


कैसा भी गाए
-समुद्र-
पक्का गाता है
.............................

Friday, December 11, 2009

निशाचर समुद्र




सोया भी जा सकता है
समुद्र किनारे
लहरों की लोरियां
सुनते-सुनते.....

मगर क्या यह
समुद्र का मान-भंग
करना न होगा

कोई कैसे
सो सकता है
जब सागर
जाग-आलाप रहा हो


शायद समुद्र
रात को
ज्यादा जागता है....!

Thursday, December 10, 2009

रात पलोलेम की

एक कौंध-सी
दौड़ती है
एक कोने से
दूसरे कोने तक
सफेद,फेनिल बिजली
रोशन करती है
समुद्र-तट
............
जाने क्या ढ़ूढ़ती
फिरती है लहर

Wednesday, December 9, 2009

रंग गोवा के


हरे-कच्च पहाड़
सफेद-नीला पानी
लाल-हरे-नीले
फिरोज़ी-जामनी-पीले
मकान ढलवां-खपरीले
रंग-बिरंगे कलात्मक परिधान
गोरे-सफेद-सांवले लोगो के
आबी-शिहाबी-धानी
रानी-अंगूरी-आसमानी
समुद्री-सीप और शैवाल

उससे ज़्यादा रंगों की शराब
सफेद-ललछोंहे फूल कनेर के
मिलते-जुलते समुद्री रेत से
इन सब पर भारी, आठों याम
बदलते रंग समुद्र के

......................
और मुझ पर है छाया
धूप-हवा-पानी के रस्ते
चेहरे-हाथों- बालों वाला
गहरा होता रंग तुम्हारा

Tuesday, December 8, 2009

साबुत सीप समुद्र से


पलोलेम बीच पर
आज (तक) की
महत् उपलब्धि
मेरे हाथ लगी
एक समुद्री सीप
चिकनी...साबुत...मुक्ताभ...
जाने उसमें क्या है ?
कैसे बोलूंगा ?
मोती !
घोंघा !!
या सिर्फ कनियाँ रेत की !!!
जो हो मैं उसे
कभी नहीं खोलूंगा !!
राज जो अनायास
दिया है समुद्र ने मुझे
कभी उसे नहीं खोलूंगा.....

Monday, December 7, 2009

{ढ़ाई आखर

यार! तुम बड़े साहसी हो

बड़े बेलौस, बिन्दास
अपनी कविताओं को
प्रेम-कविताएँ कह लेते हो
.........................
मैं तो अपनी लेखनी को
कविताएँ कहने में हिचकता हूँ
कविताओं को प्रेम-कविताएँ
इतनी आसानी से तो नहीं
नहीं ही कह सकता हूँ
सच तो यह है,मैं इस
शब्द को अपनी ज़ुबान पर
लाने में डरता हूँ
(और क्या सारी कविताऐं
प्रेम-कविताऐं नहीं होतीं )
...............
दुनिया सच कहती है
मैं अभी भी प्रेम करता हूँ

Sunday, December 6, 2009

आत्मपीड़क


जाने कितनी बार तुम
 दूर गई हो मुझसे
मगर हर बार
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा
करता हूँ उसी तरह
वैसा ही तनाव
वैसा ही खुमार सा
वैसा ही अधसोया-अधजागापन
वैसी ही बैरागी बेचारगी
वैसी ही रागात्मक आवारगी
वैसे ही बोल हल्के-हल्के
वैसे ही कदम ढलके-ढलके
वैसा ही प्यार नीले रंग से
वैसा ही बैर बदरंग से
वैसा ही लगाव रोशनी से
वैसा ही दुराव अंधियारे से
जाने कितनी बार
तुम दूर गई हो मुझसे

Saturday, December 5, 2009

मडगाँव




शांत,सुखद
मन को अच्छा लगने-सा
गोवा का एक कस्बा-सा
......मडगाँव.......
नारियल,कटहल के पेड़
होटल के दालान में
छाई ,लटकती
किसी बेल-सा
सुरम्य ठाँव
' यहीं रुको एक और दिन '
कहती है एक खूबसूरत गोवन-सी लड़की
...................................कहाँ जाँव ?

Friday, December 4, 2009

कोंकण( मुम्बई से गोवा)




हरियाले ख़ेत पानी भरे
पहाड़ भी हरे-हरे
मख़मली कालीन बिछी मिट्टी
चारों ओर हरियाली,पानी
पहाड़ और पल-पल आती सुरंगें
उतर जाएं यहीं
डेरा डाल लें
मन में बस गया
कोंकण का शवाब
मगर ,-मुम्बई की ग़र्मी से या
रात्रि –जागरन से-
बोले तो हालत है ख़राब.....

Thursday, December 3, 2009

फिर भी मुम्बई




सैंकड़ों चमचमाते ,बजते,
एक सीध में लटके
स्टील के हत्थे
...........
थोड़ी देर में व्यस्तताएँ(लऊकर)
इन पर लटक जाएँगी
लोकल ट्रेन में

Tuesday, December 1, 2009

नई तरह


अब मुझे फिर से
कविता नजर आने लगी है
दौड़ते वाहन, भागते लोग, धूल-गुबार
तेल भरी हवाएँ, पसीना
सबमें एक लय, एक ताल
सुनाई आने लगी है
बेढंगी चाल, बेढब हाल, खोई सी नजर
असमान साँसें, फिर से
एक तरह पाने लगी है
जंगली घास का छोटा फूल
फुदकती गोरैया, रंग-बिरंगी सब्जियाँ,
आसमान में बनता इंद्रधनुष
सब पर नजर जाने लगी है
अब मुझे फिर से
कविता नजर आने लगी है....

Friday, November 20, 2009

रिचार्जिंग




बारिश के पानी को
छत के परनाले में
एक पाइप लगाकर
छोड़ दिया एक टंकी में
धारदार-तुलतुल-बूंदबूंद
जिस तरह से आए
हो जाए इकट्ठा....
काश ! मैं भर सकूं
खुद को भी इस तरह
.............
मगर आसमान से मेरी छत पर
इन दिनों बरसती है
उदासी झमाझम
कर लूँ संचित !
ढेर चाहे कचरे का हो
मूल्यवान हो जाता है एक दिन
देखा-सुना है
मेरी उदासी भी अर्थवान हो उठेगी
इकट्ठी हो कर......!

Thursday, November 19, 2009

इन्दौर




चक्रवात !
जिसमें होती है
एक केन्द्रित शक्ति
जो घूर्नित होती रहती है
निरन्तर ,ले जाती है किनारे से
अंदर क्रमश और अंदर
पत्तों, फूलों और तितलियों को
सान देती हैं उन्हें
धूल के गुबार की एक अवर्नित वेदना से..
.....................
दूर से देखो तो चक्रवात
कितना खूबसूरत दिखाई देता है
किसी गुब्बारे या फूल के गुच्छे-सा
...............................
कभी आओ इन्दौर तो
चक्रवात की अंदरुनी असलियत देखो

Wednesday, November 18, 2009

रंगत सांवली-सी


जिन लोगों से मिलकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही शख़्सियत हमें चाहिए
जिन जगहों पर जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जगह हमें चाहिए
जिन गीतों को गाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही जिंदगी हमें चाहिए
जिन रंगों को देखकर हमें अच्छा लगता है
समझो कि वैसी ही रंगत हमें चाहिए
जिन पर मिट जाना हमें अच्छा लगता है
समझो कि उनका बने रहना ही हमें चाहिए


हिंदी दिवस (!)













विचार

किसी भाषा के
गुलाम नहीं
लेकिन
अपनी भाषा में
सब कुछ
कहना भी आसान नहीं
अपनी भाषा में गाओ, गुनगुनाओ मगर
दूसरी जबान को भी
समझो, सराहो
दिल बड़ा हो तो
तमाम अनुभूतियाँ
दामन थाम लेती है
क्योंकि
सारी नदियाँ
समंदर में विराम लेती है....



Sunday, November 15, 2009

शरद ऋतु






सर्द रात के बाद गुनगुनी सुबह आबाद है
मैं हूँ ,याद है,मौसम औ मन पे शवाब है

आँख है कि खुल के भी मुंदी जाती है
एक हसीन चेहरे का अभी भी ताज़ा ख़्वाब है

वो सामने है पर दिखाई नहीं देता
ज़ुल्फें भी कमबख़्त बन गई हिज़ाब हैं

Saturday, November 14, 2009

पचमढ़ी




लंबे समय के बहाव से
काटे गए गहरे, उथले, ऊँचे-नीचे रास्तों के बीच
रेत, गोल पत्थरों और
हरियाली के छोटे-छोटे टापूओं को चारों ओर से घेरकर
कल-कल बहता रहता है
झरनों से गिरने के बाद
समतल में पानी...
.....


कैसे अपने बहने / होने / बहते रहने को
किसी भव्य चौखट में जड़ी
कलात्मक तस्वीर की तरह
मढ़ देता है हमारे अंदर
मुझे अक्सर होती है हैरानी...।

Friday, November 13, 2009

इन दिनों




सूरज
आग बरसाता है
पारा
चढ़ता जाता है
ऊपर और ऊपर....
लेकिन
मुझे लगता है
दूर कहीं
बारिश हुई है
सौंधी महक आती है
तू
दूर जाती है
और तेरी
ज्यादा याद आती है....

Thursday, November 12, 2009

चलो,बबूल ही सही,मगर....


काँटें,काँटें,काँटें ही नहीं
बारिश के बाद
बबूल पर भी आते हैं फूल पीले
..........
दो थोड़ी-सी नमी तो
पत्थर पर भी
जम जाती है काई हरी
...........
थोड़ा कुरेदो ,भटको तो
रेगिस्तान में भी
खिला मिलता है नखलिस्तान
...............
सहला भर दो
तो दर्द दवा बन जाता है
बदरंग रोंआं रंगीन
बन जाता है
......
मैं भी मुतमइन हूँ
कोई मुझे भी दे
बारिश,नमी,भटकन,सहलन....
इन्सान बना दे

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।