Saturday, March 15, 2014

मखमली दलदल



जितने हो, उससे भी उथला कर जाएगा
ये भरा हुआ बाज़ार, कुछ नहीं दे पाएगा

एक दिन अचानक इस चमक-दमक से ऊब उठोगे
क्या सोचते हो, उसके बाद बुद्धत्व मिल जाएगा

वो दरिया और है, जिसे डूबकर करते है पार
ये मखमली दलदल तुम्हें पूरा लील जाएगा

दौड़ तो एक जगह से शुरू हो, दूसरी पर होती है खत्म
यह तिलस्मी सफर तुम्हें केवल कोल्हू का बैल बनाएगा

ये कौन कहता है शरीक-ए-हयात न हो
बाँधो न पट्टियाँ, नज़रों में अँधेरा बस जाएगा

Wednesday, February 26, 2014

न कृष्ण, न बुद्ध


कुछ
सौंदर्य से
दूर रहे
बेचैन रहे
कुछ
पास रहकर भी
बेज़ार रहे
कुछ को
व्यापा ही नहीं यह
पास रहे, दूर रहे
निर्विकार रहे
..................
ऐसे दुनियादार
लोगों से ही
दुनिया
गुलज़ार रहे

दिन बासंती कम हो गये

ऋतु-मौसम आगे खिसक गये
दिन बासंती कम हो गये
सर्दियाँ मार्च तक गर्मियाँ अप्रैल से
दिन बहारों के कम हो गये
शादी शाही होने लगीं ज्यादा
दिन साथ रहने के कम हो गये
लोगों से मिलने-जुलने में
दिन तन्हाई के कम हो गय
शामो-सहर एक बैचेनी सी
दिन फुर्सत के कम हो गये

Tuesday, February 18, 2014

नई-नई स्कूल टीचरृ -सा सूरज




किसी
स्कूली शिक्षिका की तरह
सूरज
आने से पहले
मुर्गे से बांग लगवाता है
पक्षियों को चौंकाता-जगाता है
भेजता है हरकारा
ब्लैक बोर्ड साफ करवाता है
फिर धीर-गंभीर चेहरा बनाकर
अपने सौंदर्य को दबा-छिपाकर
करता है प्रवेश
(मंत्रमुग्ध करने से रोक नहीं पाता, नटखट स्टूडेंट्स को)
छा जाती है
गरिमामय शांति
(अंदर से गुदगुदाती)
आसमान के धुले-पुछें
श्यामपट्ट पर
भरता है
ढेर सारे रंग
श्यामल नीला
धूसर सफेद
हल्का सिंदूरी
नारंगी
और चटख सुनहरा
लिखता
लिखता चला जाता है
कुछ उतारते हैं रंग
अपनी कॉपी में
(या कि जिंदगी में)
कुछ बस देखते रहते हैं
(जो पढ़ते हैं ट्यूशन बाद में)
कभी-कभी
सूरज का सिर चढ़ जाता है
लाल होकर अंगारा हो जाता है
भुला देता है हेकड़ी सबकी
मगर अंततः
बच्चों से प्यार करने वाली
टीचर की तरह
शांत होता है
दुलारता है
शाम लाता है
जल्दी-जल्दी समेटता है
सामान
संक्षेप में फिर
पूरा पाठ दोहराता है
सुनहरे चटख से
लोहित-श्यामल-पीले तक
कुछ पुछां, कुछ लिखा छोड़कर
क्लास से बाहर निकल जाता है
(सृजनशील छात्रों में प्रेरणा भर जाता है)
आखिर लेनी होती है
उसे दूसरी कोई क्लास
कल फिर आने के लिए
आश्वस्ति दे जाता है
नई-नई स्कूल टीचर-सा सूरज
रोज नई ड्रेस पहनकर आता है
(और सबका पहला प्यार बन जाता है)

Sunday, February 16, 2014

गहरा गोता लगाने से पहले



मन
जब प्रदर्शन-प्रिय हो जाता है
सघन विचार
आते-आते खो जाता है
गहराई में
जाने से पहले
छोड़ना ही पड़ता है
ऊँचाई की हर राह का खयाल
वरना
मन
उस नौसिखिए तैराक-सा हो जाता है
जो गहरे गोते की चाह में
ऊँचाई से कूद लगाता है
और
तमाम कोशिश के बावजूद
पानी द्वारा
तीन बार उछाला जाता है
................................
नाक-मुँह-कान में
पानी भरे
जैसे-तैसे
किनारे आता है
.............................
गहराई का गोता
ऊँचाई से नहीं
सतह के पास से
निःशब्द लगाया जाता है

Saturday, February 8, 2014

खैर हो....

जो वक्त है कुछ रचने -रचाने का,अफ़सोस
वही वक्त है दुनिया में ख़ाने-कमाने का

मेरे घर आओ तो हँसो-मुस्कराओ,याद रखो
रिवाज़ नहीं है हमारे यहाँ,रोने-रुलाने का

मेरी छत पर फूल ही फूल खिले हैं,गोया
कलियों को मौका चाहिये सूरज से आँखें लड़ाने का

कोई बात है जिससे उदास है वो,वरना
बसंत का मौसम तो है उसके खिलखिलाने का

कोई दिल की सुने या दिमाग की,खैर हो
जो मैकदे का वक्त है वही है रोज़ा निभाने का

Friday, January 17, 2014

इलहाम




सब छोड़ना पड़ता है, सब पाने के लिए
जब तक डूबे नहीं चाँद, सवेरा नहीं होता

हम ही कहाँ ख़्वाहिशों के लिए जुनूनी हैं
कौन-सा ख़्वाब है वरना है, जो पूरा नहीं होता

पहले सीखो, फिर कमाओ, फिर आँखें फेरो, भूल जाओ
जिंदगी चार पहर की, हर पहर दोबारा नहीं होता

किस्मत से तुम्हें-मुझे मिल गई है असल तालिम
फ़लसफ़ा जिंदगी का हरेक पे तारी-नुमाया नहीं होता

इलहाम हो ही गया है तो खोल लो आँखें
दरवाज़े पे दस्तक हो दुबारा, दुबारा नहीं होता

Sunday, December 22, 2013

सुख ने थोड़ा हमें थकाया




मैं अपने पिता-सा मजबूत कहाँ हूँ
तुम ही अपनी माँ-सी सुघड़ कहाँ
अलस्सुबह दिन होता था, रात देर से ढलती थी
दौर बदला, बदले हम, शाम कहाँ वो, सहर कहाँ
मेरी ज़द में दसों दिशाएँ, जह हम अलग-अलग थे
एक लीक पर अब हम-तुम, पहले वाली हुलस कहाँ
सुख ने थोड़ा हमें थकाया, तोड़ा भी हमको थोड़ा
हाड़-तोड़ मेहनत वाली, वो पसीने की महक कहाँ
सब कोई अपने थे, हर लम्हा जीते थे
लोग कहाँ वो रीत कहाँ, साज़ कहाँ वो गीत कहाँ

Sunday, November 10, 2013

दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है




थोड़ी-सी उदासी रूह को संवार-सजा देती है
सीली हो अगरबत्ती,ज्यादा ख़ुशबू-धुआं देती है

सुख ज्यादा हो छिन जाता है नींद-चैन
थोड़ी तकलीफ़ ज़िन्दगी को मज़ा देती है

कौन माँगता है तकदीर में ख़लिश-काँटे
पेशानी की सिलवटें हर शै को सजा देती है

जरा-सा नमक बढ़ा देता है लज्जत सबकी
दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है

आग गहरे में हो शख्स बन जाए कुन्दन
सतही गर्मी तो बस मसखरा बना देती है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।