Friday, September 6, 2013

ईजाद...!



मैंने ईजाद कर ली है
एक कला
शोर-गुल के बीच
ध्यानस्थ रहने की
तुम भी चाहो तो
इसे आजमा सकते हो,
शांति के लिए...
शहर हो या गाँव
बढ़ती ही जा रही है
आवाज़ें, चिल्लपों, शोर
कहीं वाहनों का, कहीं मशीनों, कहीं मशीनी-इंसानों का
हर कहीं, हर वक्त एक शोर-सा
मचा रहता है
हम चाहें तो भी नहीं बच पाते शोर से
नीरव शांति अब एक दुर्लभ सपना है,
मैंने खोज लिया है
तरीका एक नायाब
भीड़ में शांति तो नहीं
ध्यान लग जाता है,
चिड़चिड़ाहट नहीं होती
जब भी फँसता हूँ ऐसे शोर-ओ-गुल में
बस एक- किसी एक- आवाज़ पर
लगा देता हूँ ध्यान
गौर से सुनता हूँ, सुनने की कोशिश करता हूँ
वही एक आवाज़...
और अचानक
सब आवाज़ें जैसे दब जाती है
सुनाई पड़ती है वही एक आवाज़
और अंतत संगीत में बदल जाती है
कर्कशता से संगीत का यह
कमाल
भरी-भीड़ में, ट्रेफिक जाम में
रैलियों, शादियों, पार्टियों
हर कहीं अपना जज़्बा दिखाता है
और मैं भीड़ में मुस्कुराता नहीं, शांत दीखता हूँ

Monday, August 19, 2013

जीवनी-शक्ति



फूल-फल-टहनियाँ
कोंपल और तना
काटने से भी मरता नहीं
पेड़
जीवन
जड़ों में,
गहराई में होता है
तने और ऊँचाई
में नहीं

Sunday, August 18, 2013

रचना प्रक्रिया



मेरे मन की
चंचल नदी
के किनारे
-आँख मूँदे-
बैठा है एक
बगुला(भगत)
देखते ही मनमाफिक मछली
 मारता है झपट्टा
लेता है चोंच में उसे
और नया प्राण देता है

Monday, August 5, 2013

कैसे याद रहें...!


कहाँ याद रहती है
साँप को अपनी केंचुल
कोयल को अपनें दिये अंडे
कस्तूरी-मृग को स्व-गंध
...........................
कवि को भी कैसे याद रहें
अपनी रचनाएँ....
...........
वह तो उन्हें लिख
मुक्त हो चुका
अगली पीड़ा के लिए

Friday, August 2, 2013

किस तरहा



ग़म-ए-यार से फ़ुर्सत मिले,तो
दुनिया के रंग देखूं

तुमको गिला है बेहद,मगर
किस तरह देखूं

नींद रातभर आती नहीं
कैसे सहर देखूं

मैकदा तेरा बेजोड़ है,फ़ुर्सत
आँखों से मिले,तो देखूं


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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।