Thursday, June 13, 2013

कार ड्राइव करते हुए....!

मुझे इन दिनों
ड्राइव करते हुए
जिंदगी नज़र आती है
फूल-पत्तियों से ढंकी-अटी होकर भी
घर में खड़ी हो तो सुकून पाती है
स्टार्ट करते ही गंतव्य तक पहुँचने की
हड़बड़ी हो जाती है
कोई एफएम आनंद देता नहीं
विविध-भारती भी कभी-कभी ही भाती है
अपने पेन-ड्राइव की धुनें, गज़लें भी
जैसे सुनी-सुनाई मालूम होती है
भीड़-भरी सड़कों पर से
गियर बदलते, टकराते, बलखाते-झुंझलाते
जब लंबी, शांत हरियाली सड़क आती है
तो कार भी जैसे फूलों भरी हो जाती है
टॉप गियर में लगते ही
ज़िंदगी भी हवा-सी हो जाती है
अपनी तीव्रगति के बावजूद
लक्ष्य तक जल्दी पहुँचने की प्रत्याशा में
गाती-गुनगुनाती-मुस्कुराती है
सारी लाइट्स भी ग्रीन पाती है
और थोड़ा रूकना पड़ जाए तो भी
स्टियरिंग पर अँगुलियों की थाप पाती है
लेकिन, जब-कभी लग जाता है जाम
तो झुँझलाहट आ जाती है
खोज़ती है नए रास्ते
भले थोड़े लंबे हों
गतिमान रहना चाहती है
किंतु अनुभूत सच यह है कि
रिवर्स लगाते हुए-कार हो या जिंदगी
कभी सहज नहीं रह पाती है

Thursday, April 4, 2013

मैं जलती आग-सा, तेरा शबनमी वजूद

 उसने मुकर्रर किया है मेरे माज़ी को मेरा मुसिफ़ 
मुझे कोई शक नहीं अब नतीजा क्या निकलेगा
उसके जमाल की रानाईयों में खोकर रहा ग़ाफ़िल
मैं साहिर नहीं मगर जानता हूँ मुस्तकबिल क्या निकलेगा

एक उलझन बुनता है फिर खोलता है रेशा-रेशा ,
 इस उधेड़बुन से कौन जाने उसे क्या मिलेगा
वो जिस तरफ़ ले जाता मैं चल पड़ता था ,ताउम्र
मुसाफ़िर रहा,मंजिलों पे ढ़ू़ढ के मुझे क्या निकलेगा
मैं जलती आग-सा, तेरा शबनमी वजूद
सच कहता हूँ, तुझे छल के मुझे क्या मिलेगा  

Saturday, March 9, 2013

रीतते मटके का पानी



उसका मेरी ज़िन्दगी से ऐसा नाता है
जैसे नये मटके में पानी ठंडाता है

कतरा-कतरा वो रिसता जाता है मुझसे
फ़ना होकर भी स्वादो-खुशबू बढ़ाता है

मेरा अस्ल कहना नहीं महसूस करना है
रीतते मटके का पानी ठंडा होता जाता है

पता नहीं वो मुझमे है या मैं उसमें
जादू-सा है कुछ, हममे बढ़ता जाता है

पास रहे या दूर, आगे-पीछे-दाएं-बाएं
कहीं रहे वो कायनात-सा फैलता जाता है

Tuesday, February 26, 2013

हमेशा ज़िद पे रहता है

अकेला रहता है, अकेला बहता है,भीड़ में
है तनहा, जमाना उसे अपना कहता है

उसकी हर अदा दुनिया से जुदा है हरदम
खुशियाँ बाँटता है सबमें,दर्द अकेले सहता है

हर लम्हा सूझती है कोई नई शरारत
दिल बच्चे-सा है, हमेशा ज़िद पे रहता है

नाम का रिश्ता दिन से नही रात से है
सपने देखता है ऊँचे,पूरे करके दम लेता है

कुछ बातें दिल छूती हैं,कुछ लगती हैं दिल पे
एक उल्का-सा है,हरदम अपनी रौ में रहता है

उसको नाग़वार हैं ज़माने की दुश्वारियां
जेहन में उसके तराशने का हुनर रहता है

Monday, February 25, 2013

संभावनाओं से लबरेज़ जीवन



संभावनाओं से लबरेज़ जीवन हरेक को लुभाता है
तुम बसंत के आम्रव्रक्ष बन जाते हो,और
हर आमोख़ास तुम पर निगाह गढ़ाता है
पिछली उपलब्धियों के आधार पर दूसरों को तौला जाता है
इस मौसम में कितना फलोगे
अनुमान लगाया जाता है
तुम्हारे बौराते ही जग ख़ुश हो जाता है
तुम्हारा बौराना बसंत को रितुराज बनाता
हवाओं को महकाता-मदमाता है
माह में घोलता है मधु, मधुमास बनाता है
फल की आस हरेक को है
इसीलिए,
फलदार पेड़ एक उम्मीद जगाता है
तुम एक उम्मीद हो-बस याद रहे-
तुमही से दुनिया है,गति है, जीवन है,इसका बनना-बनाना है
(यह न सोचते बैठ जाना कि
फल में ख़ुशबू-रंग-स्वाद भरने में
जड़ों को कितना गहरे,अँधेरे में जाना है
कितनी ग़ुमनामी,तनहाई,ख़ला में खो जाना है)


Saturday, January 19, 2013

अपना पता नहीं देती..

जाने ये आग है या प्यास अपना पता नहीं देती..
जलाकर राख कर दे या, फिर बुझा क्यों नही देती

एक बवंडर-सा है अंदर, दिल भी परेशां -परेशां है
किस्सा शुरू होगा या कोताह, तकदीर बता क्यों नही देती

वो परेशां किसी ओर से नहीं, बस अपने-आपसे ही
किससे सीखी यह तहजीब-तालीम, जता क्यों नही देती

बच्चे-सा है मगर बच्चा नहीं है उसका दिल
बहलाने की लाख कोशिशें, बहला क्यों नही देती

मुखड़ा तुमसे बनवाती, बाकी ग़ज़ल मुझ से लिखवाती
ज़िन्दगी दोनों को मुकम्मल हुनर सिखा क्यों नही देती.

Monday, December 10, 2012

स्वर्ण-सद्रश्य

दुख
जब तुम्हारे पास आया
औरों की तरह
तुमको उसने सिर्फ छुआ नहीं
उत्तरोत्तर
तपाया,सुखाया, जलाया
.................
इसमें ज्यादा अचरज की नहीं
दुख भी
सही पात्र पर अपना हाथ आजमाता है
जिसमें सह लेने की क्षमता हो
इस पर ही होता है तारी
.............................
जलती है केवल वही लकड़ी निर्धूम
जिसने कड़ी धूप में सूखकर
कर ली हो पहले ही तैयारी
.....................
ईमानदारी से
दुख अपना फर्ज निभाता है
जिसकी नींव हो मज़बूत
उसी ढाँचे को अपना घर बनाता है.

Thursday, November 1, 2012

तुम्हारी मौजूदगी के मायने


सब सामान्य था...
पहले-पहले जब देखा घना जंगल,
खामोशी को खटखटाती हवा,
कानों में रस घोलती कोयल, पपीहा, झींगुर और टिटहरी,
सघन वन में घास की सरसराहट,
कल-कल बहती नदी, उसमें
दीखते किनारे के प्रतिबिंब
गोल-गोल पत्थर,
सब पहले से था, ऐसा ही,
तुम्हीं ने पहले-पहल देखा, सराहा, आह भरी
तुम्हारे देखे जाने से पहले
सब सामान्य था,
पहाड़ी पर बना गेस्टहाउस,
आस-पास उगी जंगली तुलसी
रात को दूर से आती
आदिवासी संगीत की लय-तान
खिड़की के बाहर चमकता चाँद-शरद का
फ़िजाओं पर तारी चाँदनी का दुपट्टा,
जब तक तुमने नहीं देखा था,
सामान्य था..
तुम्हारी नज़रों ने देखा,
तुम्हारे कानों ने सुना,
तुम्हारी त्वचा ने छुआ,
तुम्हारी नाक ने सूंघा,
तुम्हारी जुबान ने चखा और
महसूस किया तुम्हारी रूह ने
..... सब विशिष्ट हो गया ....
सब सामान्य था, पहले
तुमने अपनी ख़ासियत का एक हिस्सा इन्हें दे दिया

Thursday, October 4, 2012

द्वीप ही बने रहना चाहता हूँ


मैं एक द्वीप रहना चाहता हूँ
बहती नदी है संसार की
आस-पास में बहती रहे
मैं नहीं संग बहना चाहता हूँ

जानता हूँ तिल-तिल रेतती हैं
धार हरहराती मुझे
मैं, अक्षुण्ण भले न
अड़े रहना चाहता हूँ

कौन जाने आपदा जो मुझपर है
कल को अनिवार कारणों से नदी पर आए
मैं यहीं, यूँ ही बना रहूँ अटल
नदी की ही धार मुड़ जाए या कि
नदी को ही स्वयं मोड़नी पड़ जाए

जो हो, जब तक रेत न हो जाऊँ पूरी तरह
(और जानता हूँ इसमें वक्त लगेगा बहुतेरा)
मैं न घुटने टेकना चाहता हूँ,
न नदी के संग बहना चाहता हूँ,

मैं जहाँ हूँ, जैसा हूँ, जबसे हूँ
बसो उतना वैसा भले न, मगर बने रहना चाहता हूँ।

Monday, September 17, 2012

हर वक्त कोई कहाँ सिकंदर रह पाता है!


 खेल कोई भी हो, अपरिहार्य वजहों से,
खतरा बढ़ जाता है
एक वक्त के बाद
हर खेल खतरनाक हो जाता है
नहीं रहता खेलने वाले के हाथ में,
किसी ओर का हो जाता है
जाने-अनजाने चली
हर चाल धारण कर लेती है
एक अर्थ
अर्थ से अनर्थ का मेल शुरू हो जाता है
प्यादे, घोड़े, हाथी, वज़ीर
सब बदलने लगते हैं रूख औ रूप
हर गोट महत्वपूर्ण हो जाती है
कोई भी चलो बाज़ी
खेल खत्म होने का
खेल शुरू हो जाता है
सारी इंद्रियाँ सजग हो जाती है
हर हरकत आ जाती है नज़रों के दायरे में
माथे के पास फड़कती नस हो
या पुतलियों का स्थिर-एकाग्र होना
हर जुंबिश का एक मायना
अज़ब और अज़ीब नजर आता है
क्या राजनीति, क्या भूगोल
क्या समाजशास्त्र, वाणिज्य, अर्थशास्त्र
हर शास्त्र बन जाता है विज्ञान
विज्ञान में कलाकार नजर आता है
एक तरफ कुआँ, एक तरफ खाई
तनी रस्सी भले नहीं पड़ती ढ़ीली
रस्सी पे चलते रहने का हुनर डगमगा जाता है
इन सब खतरों को खेते हुए
हानि, अमंगल, नुकसान सहते हुए
जो कोई इसे निभा ले जाने का
साहस जुटा पाता है
तिलस्मी दरवाजे खुलते हैं, उसी के लिए
जीत जाता है वो हर बाजी
सिकंदर बनकर उभर आता है
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नियति यह है कि कोई भी सिकंदर
हर वक्त कहाँ सिकंदर रह पाता है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।