Saturday, March 26, 2011

ओएसिस की प्यास

जब कभी किसी कारण
तुम्हारी आंतरिक तन्मयता
हो जाती है भंग
तो मन पर एक अनजाना बोझ
छाने लगता है धीरे-धीरे
जो बढ़ता जाता है क्रमशः
और तुम नीरस यथार्थ के तंग रास्तों पर चलने को
मजबूर हो जाती हो
और छोड़ बैठती हो
मूल शांत व्यक्तित्व
कभी-कभी सोचता हूँ
बेचारा आम आदमी
कतई दोषी नहीं
अपने ढर्रे के जीवन से उपजे
उथले और सतहीपन के लिए
क्योंकि उसके पास तो कोई
आंतरिक स्रोत भी नहीं
जहाँ तर-तृप्त होकर
वह शांत हो सके



Friday, March 25, 2011

रचना में रहूँ तो मैं 'मैं' कैसे रहूँ

लिखूँ तो मैं केवल पुरुष कैसे रहूँ
क्योंकि मुझे निबाहनी है
मेरी ही नहीं
तुम्हारी भी कथा... व्यथा और अनुभूतियाँ
केवल अपने सत्य के सापेक्ष कैसे रहूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे भी सापेक्ष हूँ
या तो स्वयं से भी निरपेक्ष रहूँ, तटस्थ रहूँ
या तुमको भी
रचना में स्वर दूँ
रचना में रहूँ तो
मैं
मैं कैसे रहूँ
ओ संगिनी
मैं तुमको संग ले
कुछ और ही हो जाऊँ
जब रचनारत होऊँ

Thursday, March 24, 2011

जल...जल...जल..

मुझको अर्घ्य में जल नहीं अग्नि रूचति है
सूर्य! क्या तुम अपनी देय पुनः स्वीकारोगे
कष्ट...कष्ट...कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल जल-सा ही
मगर मैं उमड़ा हूँ
जल...जल...जल..
सिंधु !  क्या तुम अपनी विवशता पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी कोई रत्न पाया
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष... संघर्ष... संघर्ष...
जीवन क्या तुम अपनी हठ पुनः स्वीकारोगे

Sunday, March 20, 2011

समय... समय... समय...

कभी सघन

कभी विरल
कभी सुनहरा
कभी बदरंग
कभी स्याह
कभी सतरंग
...............
मैं रंगों की नहीं
समय की बात कर रहा हूँ
कभी सापेक्ष
कभी निरपेक्ष
कभी घोर अँधेरे-सा
कभी रोशन किरण-सा
कभी रेशमी-मुलायम
कभी सख़्त फौलाद
अजीब गोरखधंधा है समय
कभी स्वर्णमृग बन जाता है
कभी अमृत-कलश बिंधवाता है
कभी लड़ता है युद्ध
कभी निष्कासन
कभी जल-समाधि दिलवाता है
समय
कभी बँट जाता है युगों में
कभी सतत चलता जाता है
कभी हारता है खुद से
कभी सबको हराता जाता है
समय
अजीब, अद्भुत, अनोखा
अनिर्वचनीय है समय
समय... समय... समय...



Friday, March 18, 2011

अनोखी है विषयों की कायनात

बड़ी अनोखी है विषयों की कायनात
इस ब्रह्मांड में सब
एक के, एक सबके
चक्कर लगाते हैं
राजनीति घूमती है अर्थ के गिर्द
अर्थशास्त्र राजनीति के
दोनों समाजशास्त्र के
और समाजशास्त्र दोनों के
ये सब इतिहास के
इतिहास, भूगोल के
भूगोल, भौतिकी के
भौतिकी घुमाती है
रसायन और जीव विज्ञान को
दोनों गणित के
और गणित
गणित संगीत के
संगीत
नृत्य के
नृत्य साहित्य को घुमाता है अपने चारों ओर
साहित्य सौंदर्यशास्त्र और मनोविज्ञान के
और ये दोनों(!)
दर्शन घुमाता है, इन्हें अपने चारों ओर
अरे यह भँवरों का भँवर
मैं फँस गया हूँ इसमें
बड़ी निराली
दुनिया है विषयों की
यहाँ सब घूमते हैं
एक-दूसरे के गिर्द
जैसे ढेर सारे घूमते लट्टू
परिक्रमा करते, करवाते हैं
दूसरे लट्टूओं की
एक-दूसरे से

Thursday, March 17, 2011

ब्यास

हर पर्वतीय नदी
उतर आती है
पर्वतीय स्त्री-पार्वती-में
निरंतरता
निस्संगता
और निर्झरता में
...........................
पहाड़ी पुरुष मगर
नदी में पड़े
विशाल शिलाखंड-सा होता है
कुनमुनाता भी है तो
बड़े जतन में

Wednesday, March 16, 2011

कुल्लू

ढिल्लू
ढूल्लू-मूल्लू
सौंदर्य की दृष्टि से निठल्लू
ब्यास का किनारा न हो
तो एकदम
हुड़कचुल्लू
कुल्लू

Tuesday, March 15, 2011

वशिष्ठ

प्रतिभाशाली सुकुमार राम को
तुमने यहीं
मनाली में
अपने बर्फीले फौलाद में ढाला होगा
तभी तो उन्होंने
राक्षसों के सर्वनाश का
व्रत ले डाला होगा

Monday, March 14, 2011

हिडिंबा

तुम तो राक्षसी थीं
अब तक
हमारे लिए
मायावी राक्षसी
जिसने रचाया था
महाबली भीम से विवाह
और घटोत्कच जन्मा था
शूरवीर पुत्र तुम्हारा
(मगर तुम राक्षसी ही रहीं थीं हमारे लिए)
मनाली में मगर
तुम पूजी जाती हो
देवी हिडिंबा के रूप में भव्य मंदिर है तुम्हारा
.................
सच है भूगोल बदलने से भी
कभी-कभी बदल जाता है इतिहास का नज़ारा
तभी तो मनाली को
अपने सबसे श्वेत बर्फीले खूबसूरत रूप में हमने यहीं निहारा

Saturday, March 12, 2011

सच और सपना...

मैदानों में बैठकर
गर याद करो
गिरती बर्फ को
तो लगता है
एक सपने-सा
............
अविश्वसनीय हो जाता है
भोगा हुआ सच भी
कभी-कभी
घोर संकट में
नास्तिक के राम-नाम जपने-सा

Friday, March 11, 2011

श्वानाली


पांडवों के साथ
युधिष्ठिर के संग
अंतिम शिखर तक
साथ गया था श्वान...
मगर
आया वह सबसे पहले
मनु महाराज के साथ
तभी तो
मनु-आलय
मनाली में
दिख जाती हैं
सर्वत्र
उसी आदि श्वान की
संतान

Wednesday, March 9, 2011

हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

झरनों की कल-कल-सी तुम
बर्फ की तरह झरती तुम्हारी हँसी
चीड़ों से आती गंध-सी सुवास
कहीं तुम्हारा साथ न छूट जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

दिन-रात कँपकँपाती यह ठंड
गर्म चाय के गुनगुने स्पर्श-सा सुख
तमाम गर्म कपड़े और गर्म टोप
मैदान में जाते ही यह सब न बीत जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

ऊनी दस्ताने और मफलर ऊनी
कांगड़ी और अलाव की आँच-सी तुम
दूर शिखरों पर जमी बर्फ
सूर्य की किरण से न पिघल जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

नवविवाहित जोड़ों का हनीमून
बाँहों में बाँहें डाले घूमते युगल
मदहोश कर देने वाला समां
ये मादक माहौल न गुम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

कुनमुनाती-सी रजाई से निकलती
बाहर जाने के नाम पर बिसूरती
बाहर निकलते ही बह निकलती
गर्म सोतों-सी यह गर्मी न जम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

Tuesday, March 8, 2011

मनाली

पल-पल
बदलता है मौसम जहाँ
मैंने दो दिन में यहाँ
मौसम देखे चार
पहले ठंड-सा लाचार,
फिर बारिश-सा बेज़ार,
 बर्फ-सा खुशगवार
और धूप का बाज़ार



Monday, March 7, 2011

मनाली में धूप


सूर्य को देवता
पहाड़ियों ने माना होगा
सर्वप्रथम-पहली बार
खासकर जहाँ गिरती हो गार
...............................
अंगार को देवता
वे ही तो करेंगे
स्वीकार
...........

-

Saturday, March 5, 2011

देवदार से झरती बर्फ

देवदार की पर्णहीन टहनियों से
बर्फबारी रूकने के बाद
झरती बरसती है
फूलों-सी बर्फ
जैसे गिरते हैं
बसंत से पहले
पत्ते इमली के
झर-झर-झर
थोड़ी-सी धूप
क्षणिक बसंत ले आती है
मनाली के पहाड़ पर......

बीहड़

अदभुत हो तुम भी
गोवा जाकर
हो जाती हो
गोवन
पहाड़ पर पहुँचते ही
हो जाती हो
पहाड़न
मैदानी हो जाती हो
जाकर
मैदान
..............
बीहड़ों में कभी
गई नहीं हो
मन में फिर
कैसे, इतना, कभी-कभी
उग आता है
बीहड़

Thursday, March 3, 2011

बर्फ का सर्द सच

सफेद, खूबसूरत
गंधहीन
रूई-सी
फाहेदार
बर्फ
थोड़ी देर बाद हो जाती है
दलदली
फिसलते हैं
गलते-जमते हैं
जूतों के अंदर
पैर और खून नसों में,
बर्फीला कीचड़ और ठंडा पानी
मिलकर
रचते हैं
सड़कों पर
सर्द बुखार
जिसका असर
रीढ़ से होकर कभी-कभी
मन तक जाता है...

Wednesday, March 2, 2011

रेत बादलों की-16 फरवरी

समुद्र के पास से आते हुए
हट में
जैसे
सब जगह से गिरती-झरती थी रेत
वैसे ही यहाँ
होटल में आने पर
सिर-बदन-कपड़ों से
झरती है बर्फ
रेत बादलों की
..........

Tuesday, March 1, 2011

तन मनाली - मन मणिकर्ण

बर्फ...बर्फ...बर्फ
प्रकृति के साथ हो जाता है
सब कुछ वैसा ही
नाक, मुँह, कान, बाल
ग्लास काँच का, लोहे का पाईप
बिस्तर, यहाँ तक कि गीज़र भी
(कैसे अपने रंग में रंग लेता है मौसम)
.................................................
मुँह से मगर निकलती है
भाप
कहती है फुसफुसाकर
- करती है आश्वस्त – बाहर से हो गए हो
मौसम की तरह सर्द
मगर मन तो मणिकर्ण है
गंधक के उबलते पानी की तरह
सच है
तन मनाली हो गया हो भले
मन तो शाश्वत मणिकर्ण है



Monday, February 28, 2011

मनाली

जैसे आए हों हम किसी पहाड़ की बारात में
बाराती की तरह
उतरते ही स्वागत में
बरसने लगी बर्फ
सफेद, गंधहीन फूलों की तरह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।