Wednesday, September 15, 2010
पीली तितलियाँ
अब भी दिख जाती है
तितलियाँ
रंग-बिरंगी,
कलात्मक पंखों और
टेक्सचर वाली
मगर,
कहाँ गईं वे
सादे पीले रंगवाली
आदिम तितलियाँ
जो झुंड-का-झुंड
बैठी रहती थी
चुपचाप
पुवाड़ियों की हरी झाड़ियों की
कतारों में
पीले फूलों के बीच
उन्हीं-की-सी होकर
और पास जाते ही
उड़ जाती थीं
निःशब्द, नीरव, अनायास
सपनों की यादों-सी
..................................
जैसे उड़ गया है
मॉल की आकर्षक महँगी डिश के बीच से
पंजी-दस्सी में स्कूल के बाहर मिलने वाले
समोसे और चटनी वाली पपड़ी का स्वाद
.......................................
मुझे पीली तितलियाँ और
खस्ता पपड़ियाँ
अब ज्यादा याद आती है
Friday, September 10, 2010
खंडकाव्य(!)
तुम बिन मेरी शाम
बहुत शांत होती है, बहुत ख़ामोश...
कहीं कोई हलचल नहीं,
कोई जुम्बिश नहीं,
मगर मैं, सिर्फ मैं जानता हूँ
कि यह शांति नहीं सन्नाटा है...
तूफान के आने के पहले की
शांति-सा...।
मौन, निस्तब्ध यामिनी
यह अच्छी तरह समझती है,
कि हर तूफान के पहले
ऐसी ही शांति होती,
मरघट की शांति...
ज्यों-ज्यों शाम गहराती है,
मन की परतें खुलती जाती है
अनवरत... धीरे-धीरे...
प्याज़ के छिलकों की तरह...
चेतन पर हावी होता
जाता है अवचेतन
विवेकानंद पर हावी
होता है फ्रायड...
गोर्की पर कामू...
टॉलस्टाय पर युंग...
प्रेमचंद पर सार्त्र
मैं सोचता हूँ-
मेरा पतन हो रहा है,
मगर तभी कानों में
गूँजता है गीतासार
और आँखों में उभरता है,
कृष्ण का साँवला-सलोना,
चंचल चेहरा,
जो उद्घोषणा करता है
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मैं अलसा जाता हूँ
तभी आते हैं विवेकानंद
और कहते हैं
‘उतिष्ठ जागृत प्राप्य वरान्निबोधत्’
मगर जागने के लिए
सोना जरूरी है
सोने जाता हूँ, तो
रॉबर्ट फ्रॉस्ट कहता है
सोने से पहले कोसों चलना है...
मैं चल पड़ता हूँ
अनंत, अनवरत, अथक,
महायात्रा पर...
ठीक किसी अलसाए भौंरे की तरह
किसी थकी मंद समीर की तरह,
मगर कोई भी यात्रा
नहीं पहुँचाती किसी मंजिल तक,
मगर फिर भी मैं रोज
स्वीकारता हूँ,
अंतहीन सफर की
इस नियति को,
क्योंकि मुझे लगता है,
कोई और भी है – जो चल रहा है-
अंतहीन सफर में, यायावर की तरह
ठीक उससे पहले, जबकि नींद अपने
आग़ोश में मुझे देती है
चंद घंटों की मौत...
मैं सोचता हूँ
कि जीत जाते हैं अंतत:
दकियानूसी संस्कार...
बहुत शांत होती है, बहुत ख़ामोश...
कहीं कोई हलचल नहीं,
कोई जुम्बिश नहीं,
मगर मैं, सिर्फ मैं जानता हूँ
कि यह शांति नहीं सन्नाटा है...
तूफान के आने के पहले की
शांति-सा...।
मौन, निस्तब्ध यामिनी
यह अच्छी तरह समझती है,
कि हर तूफान के पहले
ऐसी ही शांति होती,
मरघट की शांति...
ज्यों-ज्यों शाम गहराती है,
मन की परतें खुलती जाती है
अनवरत... धीरे-धीरे...
प्याज़ के छिलकों की तरह...
चेतन पर हावी होता
जाता है अवचेतन
विवेकानंद पर हावी
होता है फ्रायड...
गोर्की पर कामू...
टॉलस्टाय पर युंग...
प्रेमचंद पर सार्त्र
मैं सोचता हूँ-
मेरा पतन हो रहा है,
मगर तभी कानों में
गूँजता है गीतासार
और आँखों में उभरता है,
कृष्ण का साँवला-सलोना,
चंचल चेहरा,
जो उद्घोषणा करता है
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मैं अलसा जाता हूँ
तभी आते हैं विवेकानंद
और कहते हैं
‘उतिष्ठ जागृत प्राप्य वरान्निबोधत्’
मगर जागने के लिए
सोना जरूरी है
सोने जाता हूँ, तो
रॉबर्ट फ्रॉस्ट कहता है
सोने से पहले कोसों चलना है...
मैं चल पड़ता हूँ
अनंत, अनवरत, अथक,
महायात्रा पर...
ठीक किसी अलसाए भौंरे की तरह
किसी थकी मंद समीर की तरह,
मगर कोई भी यात्रा
नहीं पहुँचाती किसी मंजिल तक,
मगर फिर भी मैं रोज
स्वीकारता हूँ,
अंतहीन सफर की
इस नियति को,
क्योंकि मुझे लगता है,
कोई और भी है – जो चल रहा है-
अंतहीन सफर में, यायावर की तरह
ठीक उससे पहले, जबकि नींद अपने
आग़ोश में मुझे देती है
चंद घंटों की मौत...
मैं सोचता हूँ
कि जीत जाते हैं अंतत:
दकियानूसी संस्कार...
परंपराएँ, रूढ़ियाँ...
फ्रायड, कामू, सार्त्र
हार जाते हैं,
जीत जाते हैं
टैगोर, गाँधी
प्रेमचंद...।
अनुवाद
ओ अदृश्य! मैं कर रहा अनुवाद
तुम्हारे जिए हुए जीवन को, पलों को, अनुभूतियों को...
देखो,
जीवित हो उठे फिर से एक बार वो क्षण
मगर
इस बार अपनी भाषा में, नहीं
मेरी भावनाओं में, जो अवर्ण हैं...
क्योंकि उन क्षणों को
भोगा हूँ मैंने आज
जो महसूस गए थे उन दिनों, तुम्हारे द्वारा
ओ अनाहत! मैं तो पुकार रहा हूँ
महज इसलिए;
कि तुमने भी मेरी तरह ही
देखा होगा ये सब,
तो ओ हम निगाह (एक दृष्टि)
आओ एक रूह (एकात्मा)
हो जाए। अस्पृश्य, आज तक, मगर अब
मैं तुममे, तुम मुझमें
और हम दोनों
डूबती हुई इस शाम में
खो जाएँ, खो जाएँ...
Wednesday, September 8, 2010
तुम
तुम मेरे जीवन में सबसे
ऊँची, गहरी, सबसे
भारी!
नहीं यह तेरेपन की जीत,
न ही यह मेरेपन की हार
सब कुछ लगता पूर्व नियोजित
बनना है जिसका हमको
अधिकारी।
कभी करके जिनको या
दिन जाया करते थे बीत
आज वे कोसों मुझसे दूर
लिया तुमने सबसे मुझको जीत।
बँटा था मैं कितने टुकड़ों में हाय
तुमने लिया मुझे सहेज
दिया व्यक्तित्व नया औ’ प्रीत
स्वीकारो इसे मेरे ओ’ मीत।
ऊँची, गहरी, सबसे
भारी!
नहीं यह तेरेपन की जीत,
न ही यह मेरेपन की हार
सब कुछ लगता पूर्व नियोजित
बनना है जिसका हमको
अधिकारी।
कभी करके जिनको या
दिन जाया करते थे बीत
आज वे कोसों मुझसे दूर
लिया तुमने सबसे मुझको जीत।
बँटा था मैं कितने टुकड़ों में हाय
तुमने लिया मुझे सहेज
दिया व्यक्तित्व नया औ’ प्रीत
स्वीकारो इसे मेरे ओ’ मीत।
Monday, September 6, 2010
डायरी
तुम मेरी डायरी हो,
डायरी बिना क्या मैं!
तुम मेरी लायब्रेरी हो,
लायब्रेरी बिना क्या मैं!
तुम मेरा सृजन हो,
सृजन बिना क्या मैं!
तुम मेरा चिंतन हो,
चिंतन बिना क्या मैं!
तुम मेरी कल्पना हो,
कल्पना बिना क्या मैं!
तुम मेरा वजूद हो,
वजूद बिना क्या मैं!
तुम मेरी ‘तुम’ हो,
तुम्हारे बिना क्या मैं!
Sunday, September 5, 2010
एकाकी पीड़ा
अकेलेपन की छाया में मेरी पीड़ा एकाकी
अपने से ही बात करूँ,
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ,
अपने घावों को खुद देखूँ।
अपनी पीड़ा गाऊँ
अकेलेपन की छाया में मन
मेरी पीड़ा एकाकी
सत्य के क्षितिज तक पहुँचकर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता,
कह नहीं ‘सच अंतिम’, क्यों
बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया में मन
मेरी पीड़ा एकाकी।एकाकी है तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी,
बस दो पल साथ मिला;
बाकी जीवन एकाकी।
अकेलेपन की छाया में, मन
मेरी पीड़ा एकाकी!!
कितनी दूरी तय कर ली,
कितना त्रास भोग चुका,
नहीं मील का पत्थर पथ में,
जो बतलाए- कितना चलना है बाकी।
अकेलेपन की छाया में, मन
मेरी पीड़ा एकाकी।।
Saturday, September 4, 2010
संस्कार
वे अपना कोट
नहीं उतारेंगे
भले गर्मी बढ़ गई हो-
क्योंकि
पुरानी और बेरंग कमीज़
का प्रदर्शन करे,
इतना साहस किसी का
नहीं होता।
Friday, September 3, 2010
मुझे ईर्ष्या है समुद्र से
मैं नहीं छीन रहा हूँ
तुम्हारे अंदर निहित
संभावनाओं को, तुम्हारी आशाओं
आकांक्षाओं या महत्वाकांक्षाओं को
अब भी
यही सब कुछ
इसी तरह होगा, जैसा तुम चाहोगी
बस
मुझे तुम्हारा
समुद्र के पास जाना
अच्छा नहीं लगता
मैं समुद्र से ईर्ष्या करता हूँ
उसमें तुम्हारी उदासी
या आँसू नहीं
हमारी-तुम्हारी बनाई काग़ज़ की नाव
बहाना चाहता हूँ
पता है, समुद्र से बुरा नहीं हूँ मैं
यही बात तुम्हें
बताना चाहता हूँ।
Thursday, August 12, 2010
तरक्की के कटघरे
मैदान खाली हैं और पब भरे हैं
ये हमारी तरक्की के कटघरे हैं
सड़क पे जख़्मी पड़े से वास्ता नहीं
सोशल साइट्स पर दोस्त भरे पड़े हैं
शादियाँ नाशाद करती है शाद नहीं
लिव-इन हमारी तहजीब के मकबरे हैं
हमें अपने मज़हब से वास्ता नहीं
गैरों को इसमें रास्ते दिख पड़े हैं
उम्मीद की तरह जगमगाता है वो
लोग उसके रास्ते पर चल पड़े हैं
ये हमारी तरक्की के कटघरे हैं
सड़क पे जख़्मी पड़े से वास्ता नहीं
सोशल साइट्स पर दोस्त भरे पड़े हैं
शादियाँ नाशाद करती है शाद नहीं
लिव-इन हमारी तहजीब के मकबरे हैं
हमें अपने मज़हब से वास्ता नहीं
गैरों को इसमें रास्ते दिख पड़े हैं
उम्मीद की तरह जगमगाता है वो
लोग उसके रास्ते पर चल पड़े हैं
Saturday, August 7, 2010
तब शायद इस तरह होता
तुम निकाल देती
अपनी युवावस्था
पढ़ाई में; लायब्रेरी में; विश्वविद्यालयों के गलियारों में।
मोटी थीसिस के पन्ने
पर पन्ने पलटाकर, संदर्भ ग्रंथों में सिर खपाकर
बड़े मनोयोग से अपनी एक नई थीसिस
तैयार कर लेती;
जो मौलिक और सराहनीय
होती;
तुम डॉक्टर हो जाती।
तुम्हारे नाम के आगे जुड़ी इस
उपाधि के साथ ही
जुड़ चुका होता
पदनाम
बहुत संभव है
तुम किसी कॉलेज में लेक्चरर हो जाती;
तुम अपने लॉन में मौसमी
फूलों के सदाबहार बोनसाई
और कैक्टस उगाती,
कोनों पर गुलदाऊदी और
मनीप्लांट लगाती;
दूब की विभिन्न प्रजातियों पर
अपने सहयोगियों से
चर्चा करते हुए तुम
कोई हरी, मखमली
विदेशी दूब मँगाती
सुबह चाय पीते समय
अखबार पर नजरें दौड़ाती,
अपनी बिल्ली (या कुत्ते)
को सहलाती;
फिर इठलाती फिज़ा और
रेशमी सुबह को धता
बताकर अपने
मकां में घुस जाती
(अपने उस मकान में बड़ी शान से तुम ‘मेरा घर’ बतलाती)
और जब बाहर आती तैयार होकर
तो तुम्हारे व्यक्तित्व के अनुरूप
तुम्हारे शरीर पर
वस्त्र होते,
तुम्हारे रंगों का चयन
वैसा ही अभिजात्य और
परिष्कृत होता।
कॉलेज में तुम धाराप्रवाह पढ़ाती
सहयोगियों से राजनीति पर,
साहित्य और मनोविज्ञान
पर खूब बतियाती
कभी खूब गंभीर भी हो जाती,
छात्राएँ तुम्हें सम्मान
सहयोगी स्नेह
और अधिकार
तवज्जो देते;
वहाँ से लौटकर
तुम फिर अपने घर आती
(चलो मैं तुम्हारे ही स्वर में कहे देता हूँ)
कुछ थकी-थकी कुछ
कुम्हलाई-सी
नौकर (या नौकरानी)
तुम्हारे लिए कॉफी बनाते;
उतनी देर में तुम
आँखें बंद कर सुस्ता
चुकी होती,
कॉफी पीते समय तुम्हारी
बिल्ली (या कुत्ता)
तुम्हारे कदमों में लौटता
तुम प्यार से उसे –
अपने पास बिठा लेती
उसके बाद तुम
रिकॉर्ड पर कोई पुरानी धुन,
किसी परिचित या दोस्त द्वारा
भिजवाया कोई नया
रिकॉर्ड सुनती
ग़ुलाम अली, जगजीत या
गुलज़ार को,
तुम्हारे पास निस्संदेह कुछ
विदेशी रिकॉर्ड भी होते,
जिन्हें तुम कभी नहीं सुनती,
या कभी मेहमानों के स्तर (!) के
अनुरूप उन्हें लगा देती
मेहमानों को विदा करते समय
तुम ना देख पातीं कि
दोपहर ढल गई है,
शाम हो आई हो
तुम्हारी कनपटियों के
पास के बालों की
सफेदी और आँखों
पर चढ़ा चश्मा
परिचायक होता इसका;
लेकिन अपवाद तुम
फिर भी होती,
उम्र के प्रभाव से ना
चिढ़चिढ़ाती, ना
रूखी हो जाती, ना
झुँझलाती, बल्कि और
शांत और गंभीर
हो जाती
तुम्हारे गंभीर चेहरे पर जब
कभी एक सरल, मृदुल
मुस्कान फैल जाती
तो देखने वाले
अवाक रह जाते; और
दूसरों को तुम्हारी
मिसाल बतलाते।
बेहिचक तुम समाज में
विदूषी भद्र
अनोखी महिला के
नाम से जानी जाती,
पुरूष तुम्हें (और तुम्हारी शोहरत को) हसरत भरी
और महिलाएँ ईर्ष्या
भरी निगाहों से देखती,
चारों और तुम्हारी
सहजता, सरलता और
कीर्ति की बातें होती।
लेकिन, साल में दो-एक बार
तुम
जब भी छुट्टियों में
अपनी युवावस्था
पढ़ाई में; लायब्रेरी में; विश्वविद्यालयों के गलियारों में।
मोटी थीसिस के पन्ने
पर पन्ने पलटाकर, संदर्भ ग्रंथों में सिर खपाकर
बड़े मनोयोग से अपनी एक नई थीसिस
तैयार कर लेती;
जो मौलिक और सराहनीय
होती;
तुम डॉक्टर हो जाती।
तुम्हारे नाम के आगे जुड़ी इस
उपाधि के साथ ही
जुड़ चुका होता
पदनाम
बहुत संभव है
तुम किसी कॉलेज में लेक्चरर हो जाती;
तुम अपने लॉन में मौसमी
फूलों के सदाबहार बोनसाई
और कैक्टस उगाती,
कोनों पर गुलदाऊदी और
मनीप्लांट लगाती;
दूब की विभिन्न प्रजातियों पर
अपने सहयोगियों से
चर्चा करते हुए तुम
कोई हरी, मखमली
विदेशी दूब मँगाती
सुबह चाय पीते समय
अखबार पर नजरें दौड़ाती,
अपनी बिल्ली (या कुत्ते)
को सहलाती;
फिर इठलाती फिज़ा और
रेशमी सुबह को धता
बताकर अपने
मकां में घुस जाती
(अपने उस मकान में बड़ी शान से तुम ‘मेरा घर’ बतलाती)
और जब बाहर आती तैयार होकर
तो तुम्हारे व्यक्तित्व के अनुरूप
तुम्हारे शरीर पर
वस्त्र होते,
तुम्हारे रंगों का चयन
वैसा ही अभिजात्य और
परिष्कृत होता।
कॉलेज में तुम धाराप्रवाह पढ़ाती
सहयोगियों से राजनीति पर,
साहित्य और मनोविज्ञान
पर खूब बतियाती
कभी खूब गंभीर भी हो जाती,
छात्राएँ तुम्हें सम्मान
सहयोगी स्नेह
और अधिकार
तवज्जो देते;
वहाँ से लौटकर
तुम फिर अपने घर आती
(चलो मैं तुम्हारे ही स्वर में कहे देता हूँ)
कुछ थकी-थकी कुछ
कुम्हलाई-सी
नौकर (या नौकरानी)
तुम्हारे लिए कॉफी बनाते;
उतनी देर में तुम
आँखें बंद कर सुस्ता
चुकी होती,
कॉफी पीते समय तुम्हारी
बिल्ली (या कुत्ता)
तुम्हारे कदमों में लौटता
तुम प्यार से उसे –
अपने पास बिठा लेती
उसके बाद तुम
रिकॉर्ड पर कोई पुरानी धुन,
किसी परिचित या दोस्त द्वारा
भिजवाया कोई नया
रिकॉर्ड सुनती
ग़ुलाम अली, जगजीत या
गुलज़ार को,
तुम्हारे पास निस्संदेह कुछ
विदेशी रिकॉर्ड भी होते,
जिन्हें तुम कभी नहीं सुनती,
या कभी मेहमानों के स्तर (!) के
अनुरूप उन्हें लगा देती
मेहमानों को विदा करते समय
तुम ना देख पातीं कि
दोपहर ढल गई है,
शाम हो आई हो
तुम्हारी कनपटियों के
पास के बालों की
सफेदी और आँखों
पर चढ़ा चश्मा
परिचायक होता इसका;
लेकिन अपवाद तुम
फिर भी होती,
उम्र के प्रभाव से ना
चिढ़चिढ़ाती, ना
रूखी हो जाती, ना
झुँझलाती, बल्कि और
शांत और गंभीर
हो जाती
तुम्हारे गंभीर चेहरे पर जब
कभी एक सरल, मृदुल
मुस्कान फैल जाती
तो देखने वाले
अवाक रह जाते; और
दूसरों को तुम्हारी
मिसाल बतलाते।
बेहिचक तुम समाज में
विदूषी भद्र
अनोखी महिला के
नाम से जानी जाती,
पुरूष तुम्हें (और तुम्हारी शोहरत को) हसरत भरी
और महिलाएँ ईर्ष्या
भरी निगाहों से देखती,
चारों और तुम्हारी
सहजता, सरलता और
कीर्ति की बातें होती।
लेकिन, साल में दो-एक बार
तुम
जब भी छुट्टियों में
समुद्र किनारे जाती, ( जाती ना? मैं जानता हूँ अवश्य)
तो किसे पता चलता
कि देर-देर तक
तट की रेत पर बैठकर
तुम आती-जाती लहरों को
देखा करतीं,
उदासी और अकेलेपन में डूबकर
देर रात तक अँधेरों से ग़ुफ़्तग़ूं करतीं,
किसे पता चलता कि
क्या-क्या तुम
समुद्र में बहा आती
किसे पता चलता कि
कर्मरत् और मजबूत रहने के लिए समुद्र से सम्पूर्णता को
लेकर, बदले में तुम क्या दे आती
सब तो ही समझते तुम लंबे प्रवास से आई हो।
Thursday, August 5, 2010
तुम्हें देखना
‘तुम दूर
बैठे
क्या देख रहे हो’ मैंने पूछा
‘मैं ? तुम्हें’ तुमने
उसी क्षितिज की ओर
देखते हुए कहा।
बैठे
क्या देख रहे हो’ मैंने पूछा
‘मैं ? तुम्हें’ तुमने
उसी क्षितिज की ओर
देखते हुए कहा।
‘कैसे, मैं तो तुम्हारे पीछे हूँ’
अच्छा देखो—
वहाँ दूर
जहाँ आसमान भी है,
सागर भी है
और अँधेरा भी,
(वही सब कुछ जो तुम्हें अच्छा लगता है)
इन सबको एक साथ देखना
क्या तुम्हें देखना
नहीं है?
Wednesday, August 4, 2010
निर्विकार
दुनिया
तब भी बिल्कुल वैसी थी,
जब मैं नहीं था,
व्यस्त, निर्विकार और तटस्थ, जैसी आज है- !
जब मैं हूँ।
दुनिया तब भी वैसी ही रही,
जब इस व्यस्त, निर्विकार, तटस्थ
दुनिया में मैं
डूब गया
मुझे आत्मसात कर लिया
गया कृष्ण विवर बनकर
और तब दुनिया तब भी वैसी ही रही
जब अपनी अस्तित्वहीनता के विरुद्ध
मोर्चा खड़ा कर मैंने चुनी
तनहाई और सोचा
छोड़ दी मैंने दुनिया।
दुनिया तब भी वैसी ही रही
दुनिया तब भी वैसी ही रहेगी,
जब मैं नहीं रहूँगा।
तब भी बिल्कुल वैसी थी,
जब मैं नहीं था,
व्यस्त, निर्विकार और तटस्थ, जैसी आज है- !
जब मैं हूँ।
दुनिया तब भी वैसी ही रही,
जब इस व्यस्त, निर्विकार, तटस्थ
दुनिया में मैं
डूब गया
मुझे आत्मसात कर लिया
गया कृष्ण विवर बनकर
और तब दुनिया तब भी वैसी ही रही
जब अपनी अस्तित्वहीनता के विरुद्ध
मोर्चा खड़ा कर मैंने चुनी
तनहाई और सोचा
छोड़ दी मैंने दुनिया।
दुनिया तब भी वैसी ही रही
दुनिया तब भी वैसी ही रहेगी,
जब मैं नहीं रहूँगा।
Saturday, July 31, 2010
तुम सोचती हो
पर्दे के आर-पार
आँखों पर पड़े
गुलाबी पर्दे के उस ओर
देख रहा हूँ – स्पष्ट –
दूर नहीं है- मेरा यथार्थ-
कठोर-सा (कटु नहीं मगर)-
ठोस (मगर असंवेदन नहीं)।
ऐ बताओ।
तुम्हारी आँखों के आगे क्या है?
(पर्दे (!) का रंग औ’ उससे परे)
-----
जवाब (जो, मैंने सोचा, तुम सोचती हो)
ना कोई पर्दा ना
रंग कोई
ना परे कुछ
मेरी आँखें
देख रही है
सामने तुम हो,
बस तुम....
तुमसे पहले
तुमसे परे, बस तुम....।
एक से हैं मिलन और ज़ुकाम...
बूझो तो?
-जब-
सब कुछ बेमजा,
बेरंग, बेमतलब
दिखलाई दे,....।
आँखों के आगे धुँधलाया
आलोक, सूनापन और गहराई हो....।
साँसों में उखड़ेपन
की गरमाई हो....।
स्वाद
स्वेद कण हो माथे
पर,
नासिका पुटों से
नीर झरे
-तब-
समझ लो
कुछ और नहीं
वह सर्दी है
Friday, July 30, 2010
कॉफी हाउस के कोने में…
यार
अकेले कोने!
कबसे,
बता
कब से
तू था
प्रतीक्षा में
मेरी...?
या कि
सचमुच था भी!
वैसे, पता तो तुझे होगा
कोई आएगा
कभी
और
बनेगा साथी
तेरा कुछ क्षण को,
और फिर
हो जाएगा संपृक्त
अकेले कोने!
कबसे,
बता
कब से
तू था
प्रतीक्षा में
मेरी...?
या कि
सचमुच था भी!
वैसे, पता तो तुझे होगा
कोई आएगा
कभी
और
बनेगा साथी
तेरा कुछ क्षण को,
और फिर
हो जाएगा संपृक्त
Wednesday, July 28, 2010
अक्सर
बहुत उदास हो जाता है
मन
सोचकर
कि अब जाना है
फिर जगमगाती है
अँधेरे में
एक किरण
कि इन्ही कदमों से
वापस....
मन
सोचकर
कि अब जाना है
फिर जगमगाती है
अँधेरे में
एक किरण
कि इन्ही कदमों से
वापस....
Wednesday, July 21, 2010
तुम एक नज़्म हो
1
सपनों से बहुत दूर रहती
हूँ मैं,
और ख़ौफ़ज़दा भी,
इसलिए न आते हैं,
न आने देती हूँ
अपने करीब इन्हें
2
तुम एक ख़्वाब हो
ऐसा ख़्वाब,
जिसे देखने को
मेरी आँखें मुझे
इजाज़त नहीं देती
3
तुम मेरे हाथ में हो,
और सोच रही हूँ
ख़्वाब जब हाथों में आते हैं, तो
हाथों को ये डर
क्यूँ बना रहता है
कि पकड़ कहीँ
ढीली ना हो जाए
कभी-कभी दिल करता है
तुम्हें सारी
दुनिया को दे दूँ
सारी दुनिया में
तुम्हें देख
सोच रहा हूँ तुम शायरा होती, तो
कभी चुपके से तुम्हारी इन
नज़्मों को पढ़ता
क्या हुआ गर जो तुम
शायरा नहीं,
मैंने जान लिया हैं तुम्हें
कि कितनी मासूम,
संजीदा, जज़्बाती
औ’ खूबसूरत
नज़्में हैं, तुम्हारे अंदर...
वो नज़्में तुम ना सही
मैं लिखूँगा,
और तुम्हारे तसव्वुर को
शक्ल दूँगा लफ़्जों की...
क्या हुआ जो तुम शायरा नहीं
देखो मैं-तुम
हमख़याल, हमराज़
हमजज़्बा तो हैं
तुम कह नहीं सकती
मगर मैं समझ सकता हूँ
तुम्हें,
तुम एक ऐसी नज़्म हो
जिसे पढ़ा नहीं
समझा जा सकता है
महसूसा जा सकता है
और मैंने तुम्हें पूरी
शिद्दत से समझा,
महसूसा है।
कितना जहेनसीब हूँ,
एक नज़्म को अपनी
आँखों में सजाया है
मैंने ख़्वाब की तरह,
मेरे आसमान में तुम
हो
किसी सतरंगे इंद्रधनुष की तरह
आसमान की
पाक आयतें
शफ़क की खूबसूरत नज़्म
मेरे मौसम में तुम हो
कोंपल की तरह बसंत की
पहली नज़्म - ।
मेरे आँगन में तुम हो
ताज़ा गुलाब की तरह
फूलों की
महकती नज़्म - ।
मेरे समंदर में तुम हो
हर आती-जाती
लहर की तरह
साहिल की हमसफर नज्म - ।
क्या हुआ जो तुम
शायरा नहीं - ।
तुम खुद एक नज़्म हो
आसमान से उतरी
किसी परी की तरह
मेरे बचपन की
मासूम नज़्म....।
तुम एक नज़्म हो, जो
शाया हुई है
तुम्हारी शक्ल में...।
मैंने तुम्हे जाना है अमिता
Sunday, July 18, 2010
बेसाख़्ता लिख देता हूँ कोई नज़्म...
तन्मयता के इन पलों में
तुम पास होती
तो देखती, मुझे क्या हो जाता है
एक लहर- सी उठती है
गुलाबों की खुशबू-सी मदभरी
अंदर औ’बाहर धूपबत्ती की गंध-सी तुम
समेट लेती हो मुझे अपने में!
एक सिहरन, एक कंपन
और कुछ अद्भुत, अनिर्वचनीय
सा हो जाता है, मन...
इन पलों की अनुभूतियाँ
मुझे अभिभूत कर देती हैं
मैं रोमांचित हो उठता हूँ
फिर उस नशे से में
मैं उठा लेता हूँ अपनी कलम
और बेसाख़्ता लिख देता हूँ कोई
नज़्म...
मगर लिखने के बाद भी यही सोचता हूँ
काश! तुम होती, उस पल
जब एकाएक सिहर-सा गया था मैं
एक कँपकँपी, एक रोमांच, एक शांति
एक नशा... एक निर्वेद, जाने क्या-क्या देख लेती तुम
आह! तुम ही तुम याद आ रही हो,
ये मुझे क्या हो रहा है?
जाने क्या?
तुम पास होती
तो देखती, मुझे क्या हो जाता है
एक लहर- सी उठती है
गुलाबों की खुशबू-सी मदभरी
अंदर औ’बाहर धूपबत्ती की गंध-सी तुम
समेट लेती हो मुझे अपने में!
एक सिहरन, एक कंपन
और कुछ अद्भुत, अनिर्वचनीय
सा हो जाता है, मन...
इन पलों की अनुभूतियाँ
मुझे अभिभूत कर देती हैं
मैं रोमांचित हो उठता हूँ
फिर उस नशे से में
मैं उठा लेता हूँ अपनी कलम
और बेसाख़्ता लिख देता हूँ कोई
नज़्म...
मगर लिखने के बाद भी यही सोचता हूँ
काश! तुम होती, उस पल
जब एकाएक सिहर-सा गया था मैं
एक कँपकँपी, एक रोमांच, एक शांति
एक नशा... एक निर्वेद, जाने क्या-क्या देख लेती तुम
आह! तुम ही तुम याद आ रही हो,
ये मुझे क्या हो रहा है?
जाने क्या?
Saturday, July 17, 2010
महातत्व है पैसा।
आश्चर्य!
अंत में हर चीज
बदल जाती है
पैसे में....।
नाते, रिश्ते, दोस्ती
प्यार और महत्वाकांक्षा
सबका
सबब एक ही
बचता है
पैसा।
पद, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा
प्रशंसा और पराक्रम
अंत में
चाहते हैं
पैसा।
व्यवसायी, अधिकारी
नेता, अभिनेता, कलाकार
और कवि
सब हो पाते हैं
रूपांतरित...
पैसा, पैसा, पैसा।
भौतिकी या खगोलिकी।
विज्ञान है, कला है
या कि कुछ और
कि हर विषय बदल जाता है
वाणिज्य में,
पैसे में...।
हवाएँ, बर्फ, पहाड़
नदियाँ और पेड़
सब पूँजीभूत, संघनित
संगठित हो जाते हैं
पैसे में...।
पंचतत्व सब हो जाते हैं
विलीन
इस एक तत्व में....
ऐसा महातत्व है पैसा।
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- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।








