Thursday, June 24, 2010
अवशता
एक दिन
एक निश्चित दिन
तुमसे न मिल पाने की
अवशता के पूर्व ही मुझे आज लगा
जैसे
तुम दू...र कहीं चली गई हो......
Wednesday, June 23, 2010
कभी खुद कविता का विषय
कितना विचित्र है मन
खुद ही बुनता है परेशानियाँ
झेलता है दुख और त्रास
रहता है बेचैन
और देर-देर तक उदास
और फिर
खुद ही
आशा की किरण
खोज निकालता है
देता है दिलासा
भरता है उत्साह
जाँबाजी और जिंदादिली
कभी कविता लिखवाता है
कभी खुद कविता का विषय बन जाता है
Monday, June 21, 2010
मेटामार्फि़स्म
ज्यादा अंतर्मुखी
ज्यादा बेचैन
ज्यादा परेशान
कुछ-कुछ चिढ़चिढ़ा
क्या तुम सोच सकती हो
तुम्हारे सामने
अल्हड़,पागल, दीवाना औऱ हँसमुख
रहने वाला मैं
ऐसा भी हो रहा हूँ
Sunday, June 20, 2010
Saturday, June 19, 2010
Thursday, June 17, 2010
मैंने घर को जंगल बना रखा है !
इधर या उधर आगे या पीछे
नीचे और उपर(!) जिधर से शुरू करूँ
पेड़ ही पेड़ हैं
(झाड़ियों को भी यही समझता हूँ मैं
जैसे ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग एक ही समझे जाते हैं)
बाँस, पीले फूलों वाला केल
कटहल, गूलर, गुच्छों और विरल फूलों वाला लाल कनेर
अशोक, बोगनबेलिया लाल, गुलाबी, पीला, सफेद
नीम कड़वा और मीठा
नींबू कागजी और बिजौरा, बेर
आम कलमी और देसी, पपीता
लिली सफेद, गुलाबी और लाल फुटबॉली
कोयल/नीलकंठ, चंपा लाल और पीला
गोल्डन ग्रीन हैज, सीताफल, बदाम
जामफल, गुलमोहर, अमलतास, संतरा
लेमनग्रास, गुलटर्रा, चमेली, जूही
जामुन, रबर, क्रिसमस फ्लॉवर, मोगरा
क्रिसमस ट्री, पारिजात जंगली, गुलाब देसी, पीले, लाल, सफेद
पीपल, बरगद, सागौन, आँवला, गोल्डन शॉवर, तुलसी, मनीप्लांट
कैक्टस, लतरें, फर्न, दवा बिच्छु की, जरकंडा, अडेनियम, ज़ेड
कुछ बिन उगाए ही, उग गए हैं, जंगली फूल और पौधे....
मैं अपने घर के चारों ओर जंगल लगा रखा है
तुम कहते / कह सकते हो, मैंने घर को जंगल बना रखा है
Wednesday, June 16, 2010
मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैं
मौसम चितरता रहता है ,मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैं
लोग कहते हैं घर के चारों ओर, कैनवास सजा रखे हैंरंग, रूप, आकृति, गंध और छाया क्या नहीं
कुदरत ने मेरे घर के चारों ओर,जादू बिछा रखे हैं
ठंड में कुनकुना और भर गर्मी में शीतल है मेरा घर
भरम है तुमको, मैंने एसी और कूलर्स लगा रखे हैं
Monday, June 14, 2010
मैं तो मायूस लौटा हूँ
जरूरी नहीं कि चीजें सुलझती है अक्ल के हवाले से
मैंने तो अक्सर सुलझते देखा है इन्हें हीले-हवाले से
गर तेज हो हवा तो गुल हो जाती है शमा
कुछ दिए जब भी जलते रहते हैं तूफान में मतवाले से
मौत अजीब शै है, दूर कर देती है शक्लो सूरत
याद कहाँ छीन पाता है कोई माशूक की दिलवाले से
तुम्हें मिला होगा ख़ुदा, मुबारक़ हो, गर मिला
मैं तो मायूस लौटा हूँ, हर दीनो-हरम, मस्जिद-ओ-शिवाले से
वो मेरी गोद, मेरे कांधे पे रोकर हल्के हुए
मैं अपने छालों को सहलाऊँ, किस रिसाले से
Sunday, June 13, 2010
वह अनजानी जगह
दूर बॉटल बुरूस
शीशम, अमलतास और गुलमोहर
निगाहें लौट आती हैं
इनकी खुशबू
और आकर्षण से
सराबोर होकर
शीशम, अमलतास और गुलमोहर
निगाहें लौट आती हैं
इनकी खुशबू
और आकर्षण से
सराबोर होकर
मैं
यहाँ दूर बैठा हूँ
क्या सचमुच
हाँ भी, नहीं भी
तो फिर?
अनजानी
अनपहचानी
धुँधलाई-सी एक
गुफा-सी में
अरे! यह तो मन है किसी का
किसका?
खोज रहा हूँ, उसी को
अथक, अनवरत ........
Saturday, June 12, 2010
संतति का सच
वह तेज हवा थी
तोड़ गई
आखिरी पत्ता दरख़्त का
शाख ने कहा
-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर में
यह क्यों
मुझसे क्या बैर तेरा
धीरे से मुस्काई हवा
कहा सुरीले स्वर में
सुन, इसलिए कि
कोंपले फूटे दोबारा
बहारें आए फिर से
तुझे मोह छो़ड़ना ही होगा
जीवन मोह से शुरू होता है
मोह-भंग पर अंत (तो बहारें, कोंपलें, मौसम?)
अरी पागल !
पुनर्जन्म, मोह की संतति
तोड़ गई
आखिरी पत्ता दरख़्त का
शाख ने कहा
-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर में
यह क्यों
मुझसे क्या बैर तेरा
धीरे से मुस्काई हवा
कहा सुरीले स्वर में
सुन, इसलिए कि
कोंपले फूटे दोबारा
बहारें आए फिर से
तुझे मोह छो़ड़ना ही होगा
जीवन मोह से शुरू होता है
मोह-भंग पर अंत (तो बहारें, कोंपलें, मौसम?)
अरी पागल !
पुनर्जन्म, मोह की संतति
Friday, June 11, 2010
स्वाति बूँद
पीयूषवर्णी मेघ ने
द्रवित हो
एक बूँद टपकाई सहसा
कदली, सीप और भुजंग ने
तुरंत अपना
मुँह खोला
लेकिन
बूँद की कोई और मर्जी
वह गिरी
साँवली गोरी के
उत्तुंग वक्ष पर-
गोरी सिहर कर लरज गई,
गंध कपूर की
मोती की शुभ्रता
और जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णता
उस बूँद ने पाई
और हो गई सार्थक.....
विधाता की माया अजब.....
स्वाति नक्षत्र हुआ कृतार्थ।
द्रवित हो
एक बूँद टपकाई सहसा
कदली, सीप और भुजंग ने
तुरंत अपना
मुँह खोला
लेकिन
बूँद की कोई और मर्जी
वह गिरी
साँवली गोरी के
उत्तुंग वक्ष पर-
गोरी सिहर कर लरज गई,
गंध कपूर की
मोती की शुभ्रता
और जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णता
उस बूँद ने पाई
और हो गई सार्थक.....
विधाता की माया अजब.....
स्वाति नक्षत्र हुआ कृतार्थ।
Thursday, June 10, 2010
चिरमिलन हो चिरंतन
अधरों से अधर
धड़कता वक्ष सीने से
कपोल कपोलों से
मिले,.....।
भर गई नासापुटों में,
साँसों की गरमाई,
आँखों से लाज के
हरसिंगार झरे....।
कान तक कपोल
हो गए रतनार.....।
श्यामवर्णी केशों में
घूमती
ऊँगलियों ने
स्वाद जाना
प्यार का....।
शरबती आँखों से
छलक गई
ढेर सारी शराब
तृप्त होकर अंतस से
आई आवाज
चिरमिलन हो चिरंतन
या कि आखिरी साँस हो
Wednesday, June 9, 2010
एक सीमाहीन वृत्त
एक धुँधले से आलोक में
मैंने चाहा
उसे घेर लूँ
एक वृत्त बनकर
मैंने यत्न किया
कभी चित्रकार
कभी मूर्तिकार
कभी कवि बना
मेरे सब प्रयास
निष्फल हुए
और स्वप्न के एक
जागरण में
मैंने देखा
वह मुझे घेरे हुए है
क्योंकि
वह स्वयं
एक सीमाहीन वृत्त था
Tuesday, June 8, 2010
गम में लिखे मैंने गीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
पा जगत का प्यार एक दिन
मन था फूला न समाया
मैं मदमाता फिर रहा था
तू अचानक पास आया
छूने को बढ़े जब हाथ मेरे
तू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
मधु- मौसम था मन में छाया
कोयल की कूक से मन भरमाया
मैं पुष्प-सा खिल रहा था
तू भँवरे -सा पास आया
सोचा साथी तुझे बनाऊँगा
तू मिटाकर तृष्णा अपनी
राह गया विपरीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
सुर-छंद-ताल सब सजे
था वाद्य मन- वीणा का बजा
तेरे आने की खुशी में
मैंने थी महफिल सजाई
राग-बेराग हो गया सब
जब छोड़ चला मझधार में
सभा और संगीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
गम में लिखे मैंने गीत
पा जगत का प्यार एक दिन
मन था फूला न समाया
मैं मदमाता फिर रहा था
तू अचानक पास आया
छूने को बढ़े जब हाथ मेरे
तू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
मधु- मौसम था मन में छाया
कोयल की कूक से मन भरमाया
मैं पुष्प-सा खिल रहा था
तू भँवरे -सा पास आया
सोचा साथी तुझे बनाऊँगा
तू मिटाकर तृष्णा अपनी
राह गया विपरीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
सुर-छंद-ताल सब सजे
था वाद्य मन- वीणा का बजा
तेरे आने की खुशी में
मैंने थी महफिल सजाई
राग-बेराग हो गया सब
जब छोड़ चला मझधार में
सभा और संगीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
Monday, June 7, 2010
तुमको रास मौन की भाषा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
चाहे सदा ये मन मेरा
सजा कर स्वर की रंगोली
युगल स्वर में लगाए
नेह के गीतों की बोली
मैं ललक कर जब पास आता
मौन के समक्ष दब जाती पिपासा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
इंद्रधनुष से ढेर सारे रंगों को मैं चुरा लूँ
लेकर तेरा दामन, चोरी से
गगन-सा उसको सजा दूँ
रूक जाते बढ़ते हाथ मेरे
देख तेरी नीरस प्रत्याशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
पास आकर मैं जो तेरे
हाथ से कुछ चाहता हूँ
तू इशारों से उस तक
पहुँचा देती है मुझे
मैं चाहता स्पर्श तेरा
हरदम मिलता मुझे निराशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
Sunday, June 6, 2010
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों ?
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
Saturday, June 5, 2010
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अपने से ही बात करूँ
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ
अपने घावों को खुद सहलाऊँ
खुद अपनी पीड़ा को गाऊँ
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
सत्य के क्षितिज पर पहुँच कर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता
यह नहीं अंतिम सत्य
क्यों बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
एकाकी है मेरा तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी
दो पल साथ मिला किसी का
बाकी जीवन एकाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
कितनी दूरी तय कर ली
कितना त्रास भोग चुका
नहीं मील का पत्थर पथ में
समझूँ कितना चलना है बाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
Friday, June 4, 2010
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
तू मेरे गीतों को पढ़, मेरी
भावुकता पर तरस खाए
और स्वयं की जीत पर
मंद-मंद मुस्कुराए
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
मैं अपनी भावुकता को तज
अपनी राह बनाऊँगा
जो तेरे दर तक पहुँचाए
उस राह कभी ना आऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
कभी था चाहा तुझे बहुत
अब पाने को अरमान नहीं
पास मेरे भी हैं प्रतीक्षित
तू ही एक पैगाम नहीं
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
याद करके मेरा प्रणय
नयन एक होंगे एक दिन सजल
दूर बहुत दूर लेकिन तब
तलक मैं चला जाऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
Sunday, May 30, 2010
बरखा गीत
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
मेघमय आकाश सारा
आच्छन्न है हरीतिमा पर
हौले से आकर गालों पर
टकराती है बूँद कोई
तनमन सिहर सा जाता
मन कहता है स्वयं से
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
रोम-रोम पुलक उठता
मात्र जिसके स्मरण से
बह चली है मधुर गति से
अल्हड़-सी वो पुरवाई
वो जो मुझसे दूर कहीं है
रे तू सहेली है न उसकी
जा जरा उसको जगा दे
रूठ कर जो है सोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
बूँद बनकर बरस
रिमझिम-रिमझिम नृत्य कर
मैं चातक-सी तृष्णा लिए
जोहता हूँ बाट तेरी
पावस की इस ऋतु में
हम-तुम हो जाए समरस
मैं मस्त मतवाला बन जाऊँ
तुम रख लो साक़ी वेश कोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
Friday, May 28, 2010
सुंदरता को अपूर्ण ही होना चाहिए
रिमझिम झरती बूँदों को
बेधकर जब निकली
रवि-रश्मि
तो नीले आकाश पर
तन गया
इकहरा इंद्रधनु
रे धनु
तू भी है अभागा
सचमुच मेरी तरह
जो सुंदर है किंतु
संपूर्ण नहीं
अपूर्ण है
क्योंकि तीर नहीं
सुंदर है
क्योंकि तीर नहीं
तीर का होना
संधान का होना है
और संधान
नष्ट करता है
मिटाता है, गिराता है
ध्वंस करता है
लगा सचमुच सुंदरता को
अपूर्ण ही होना चाहिए
Subscribe to:
Posts (Atom)
मेरा काव्य संग्रह
Blog Archive
-
▼
2020
(2)
- ► 01/19 - 01/26 (1)
-
►
2018
(1)
- ► 03/04 - 03/11 (1)
-
►
2015
(23)
- ► 10/18 - 10/25 (16)
- ► 04/12 - 04/19 (4)
- ► 01/25 - 02/01 (2)
- ► 01/18 - 01/25 (1)
-
►
2014
(14)
- ► 11/02 - 11/09 (1)
- ► 09/07 - 09/14 (1)
- ► 08/03 - 08/10 (1)
- ► 07/06 - 07/13 (2)
- ► 05/25 - 06/01 (1)
- ► 03/30 - 04/06 (1)
- ► 03/09 - 03/16 (1)
- ► 02/23 - 03/02 (2)
- ► 02/16 - 02/23 (2)
- ► 02/02 - 02/09 (1)
- ► 01/12 - 01/19 (1)
-
►
2013
(16)
- ► 12/22 - 12/29 (1)
- ► 11/10 - 11/17 (1)
- ► 10/13 - 10/20 (1)
- ► 09/15 - 09/22 (1)
- ► 09/08 - 09/15 (1)
- ► 09/01 - 09/08 (1)
- ► 08/18 - 08/25 (2)
- ► 08/04 - 08/11 (1)
- ► 07/28 - 08/04 (1)
- ► 06/09 - 06/16 (1)
- ► 03/31 - 04/07 (1)
- ► 03/03 - 03/10 (1)
- ► 02/24 - 03/03 (2)
- ► 01/13 - 01/20 (1)
-
►
2012
(14)
- ► 12/09 - 12/16 (1)
- ► 10/28 - 11/04 (1)
- ► 09/30 - 10/07 (1)
- ► 09/16 - 09/23 (1)
- ► 08/12 - 08/19 (1)
- ► 07/01 - 07/08 (2)
- ► 05/27 - 06/03 (1)
- ► 04/22 - 04/29 (2)
- ► 04/01 - 04/08 (1)
- ► 02/26 - 03/04 (1)
- ► 01/29 - 02/05 (2)
-
►
2011
(75)
- ► 12/18 - 12/25 (1)
- ► 10/09 - 10/16 (1)
- ► 08/21 - 08/28 (1)
- ► 07/31 - 08/07 (2)
- ► 07/17 - 07/24 (1)
- ► 06/26 - 07/03 (3)
- ► 06/19 - 06/26 (4)
- ► 06/05 - 06/12 (2)
- ► 05/29 - 06/05 (5)
- ► 05/22 - 05/29 (6)
- ► 05/15 - 05/22 (6)
- ► 05/08 - 05/15 (1)
- ► 04/17 - 04/24 (4)
- ► 04/10 - 04/17 (4)
- ► 04/03 - 04/10 (4)
- ► 03/27 - 04/03 (3)
- ► 03/20 - 03/27 (4)
- ► 03/13 - 03/20 (5)
- ► 03/06 - 03/13 (5)
- ► 02/27 - 03/06 (6)
- ► 01/09 - 01/16 (1)
- ► 01/02 - 01/09 (6)
-
►
2010
(179)
- ► 12/05 - 12/12 (3)
- ► 11/28 - 12/05 (4)
- ► 11/14 - 11/21 (1)
- ► 11/07 - 11/14 (4)
- ► 10/31 - 11/07 (6)
- ► 10/24 - 10/31 (1)
- ► 10/17 - 10/24 (5)
- ► 10/10 - 10/17 (4)
- ► 10/03 - 10/10 (5)
- ► 09/12 - 09/19 (1)
- ► 09/05 - 09/12 (6)
- ► 08/29 - 09/05 (2)
- ► 08/08 - 08/15 (1)
- ► 08/01 - 08/08 (3)
- ► 07/25 - 08/01 (4)
- ► 07/18 - 07/25 (2)
- ► 07/11 - 07/18 (5)
- ► 07/04 - 07/11 (5)
- ► 06/27 - 07/04 (5)
- ► 06/20 - 06/27 (4)
- ► 06/13 - 06/20 (5)
- ► 06/06 - 06/13 (7)
- ► 05/30 - 06/06 (3)
- ► 05/23 - 05/30 (6)
- ► 05/16 - 05/23 (5)
- ► 05/09 - 05/16 (6)
- ► 04/25 - 05/02 (2)
- ► 04/18 - 04/25 (7)
- ► 04/11 - 04/18 (6)
- ► 04/04 - 04/11 (1)
- ► 03/28 - 04/04 (1)
- ► 03/21 - 03/28 (2)
- ► 03/14 - 03/21 (5)
- ► 03/07 - 03/14 (3)
- ► 02/28 - 03/07 (6)
- ► 02/21 - 02/28 (3)
- ► 02/14 - 02/21 (5)
- ► 02/07 - 02/14 (7)
- ► 01/31 - 02/07 (5)
- ► 01/24 - 01/31 (6)
- ► 01/17 - 01/24 (6)
- ► 01/10 - 01/17 (5)
- ► 01/03 - 01/10 (6)
-
►
2009
(70)
- ► 12/27 - 01/03 (7)
- ► 12/20 - 12/27 (7)
- ► 12/13 - 12/20 (7)
- ► 12/06 - 12/13 (7)
- ► 11/29 - 12/06 (4)
- ► 11/15 - 11/22 (6)
- ► 11/08 - 11/15 (7)
- ► 11/01 - 11/08 (6)
- ► 10/25 - 11/01 (6)
- ► 10/18 - 10/25 (7)
- ► 10/04 - 10/11 (2)
- ► 09/20 - 09/27 (4)
about me
- डॉ. राजेश नीरव
- मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।





