Saturday, June 12, 2010

संतति का सच

वह तेज हवा थी
तोड़ गई
आखिरी पत्ता दरख़्त का
शाख ने कहा
-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर में
यह क्यों
मुझसे क्या बैर तेरा
धीरे से मुस्काई हवा
कहा सुरीले स्वर में
सुन, इसलिए कि
कोंपले फूटे दोबारा
बहारें आए फिर से
तुझे मोह छो़ड़ना ही होगा
जीवन मोह से शुरू होता है
मोह-भंग पर अंत (तो बहारें, कोंपलें, मौसम?)
अरी पागल !
पुनर्जन्म, मोह की संतति

Friday, June 11, 2010

स्वाति बूँद

पीयूषवर्णी मेघ ने
द्रवित हो
एक बूँद टपकाई सहसा
कदली, सीप और भुजंग ने
तुरंत अपना
मुँह खोला
लेकिन
बूँद की कोई और मर्जी
वह गिरी
साँवली गोरी के
उत्तुंग वक्ष पर-
गोरी सिहर कर लरज गई,
गंध कपूर की
मोती की शुभ्रता
और जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णता
उस बूँद ने पाई
और हो गई सार्थक.....
विधाता की माया अजब.....
स्वाति नक्षत्र हुआ कृतार्थ।

Thursday, June 10, 2010

चिरमिलन हो चिरंतन


अधरों से अधर
धड़कता वक्ष सीने से
कपोल कपोलों से
मिले,.....।
भर गई नासापुटों में,
साँसों की गरमाई,
आँखों से लाज के
हरसिंगार झरे....।
कान तक कपोल
हो गए रतनार.....।
श्यामवर्णी केशों में
घूमती
ऊँगलियों ने
स्वाद जाना
प्यार का....।
शरबती आँखों से
छलक गई
ढेर सारी शराब
तृप्त होकर अंतस से
आई आवाज
चिरमिलन हो चिरंतन
या कि आखिरी साँस हो

Wednesday, June 9, 2010

एक सीमाहीन वृत्त


एक धुँधले से आलोक में
मैंने चाहा
उसे घेर लूँ
एक वृत्त बनकर
मैंने यत्न किया
कभी चित्रकार
कभी मूर्तिकार
कभी कवि बना
मेरे सब प्रयास
निष्फल हुए
और स्वप्न के एक
जागरण में
मैंने देखा
वह मुझे घेरे हुए है
क्योंकि
वह स्वयं
एक सीमाहीन वृत्त था

Tuesday, June 8, 2010

गम में लिखे मैंने गीत

उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
पा जगत का प्यार एक दिन
मन था फूला न समाया
मैं मदमाता फिर रहा था
 तू अचानक पास आया
छूने को बढ़े जब हाथ मेरे
तू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
मधु- मौसम था मन में छाया
कोयल की कूक से मन भरमाया
मैं पुष्प-सा खिल रहा था
तू भँवरे -सा पास आया
सोचा साथी तुझे बनाऊँगा
तू मिटाकर तृष्णा अपनी
राह गया विपरीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत
सुर-छंद-ताल सब सजे
था वाद्य मन- वीणा का बजा
तेरे आने की खुशी में
मैंने थी महफिल सजाई
राग-बेराग हो गया सब
जब छोड़ चला मझधार में
सभा और संगीत
उछला-कूदा खुशी में –हरदम-
गम में लिखे मैंने गीत

Monday, June 7, 2010

तुमको रास मौन की भाषा


मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
चाहे सदा ये मन मेरा
सजा कर स्वर की रंगोली
युगल स्वर में लगाए
नेह के गीतों की बोली
मैं ललक कर जब पास आता
मौन के समक्ष दब जाती पिपासा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
इंद्रधनुष से ढेर सारे रंगों को मैं चुरा लूँ
लेकर तेरा दामन, चोरी से
गगन-सा उसको सजा दूँ
रूक जाते बढ़ते हाथ मेरे
देख तेरी नीरस प्रत्याशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा
पास आकर मैं जो तेरे
हाथ से कुछ चाहता हूँ
तू इशारों से उस तक
पहुँचा देती है मुझे
मैं चाहता स्पर्श तेरा
हरदम मिलता मुझे निराशा
मैं मुखरित हर क्षण हर पल
तुमको रास मौन की भाषा

Sunday, June 6, 2010

अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों ?

क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
जीवन पथ की इन राहों में
हैं कितने कंटक और प्रस्तर
घिसट-घिसट अपनी देह को
अनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
है अंतरमन में छटपटाहट
मुख पर छद्म स्मित लिए
जीवन के इस रंगमंच पर
अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?
महत्वाकांक्षा को समेटे
दिवास्वप्नों को सहेजे
हृदय और आँखों में अनगिनत
आशा सजा रहा हूँ क्यों
क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?

Saturday, June 5, 2010

मेरी पीड़ा और एकाकी मन


अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
अपने से ही बात करूँ
अपने सुख-दुख का हाल कहूँ
अपने घावों को खुद सहलाऊँ
खुद अपनी पीड़ा को गाऊँ
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
सत्य के क्षितिज पर पहुँच कर
अंतिम सत्य शून्य ही पाता
यह नहीं अंतिम सत्य
क्यों बार-बार मैं दोहराता
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
एकाकी है मेरा तन-मन
मंजिल मेरी एकाकी
दो पल साथ मिला किसी का
बाकी जीवन एकाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन
कितनी दूरी तय कर ली
कितना त्रास भोग चुका
नहीं मील का पत्थर पथ में
समझूँ कितना चलना है बाकी
अकेलेपन की छाया सघन
मेरी पीड़ा और एकाकी मन

Friday, June 4, 2010

क्यों लिखूँ गीत वेदना के


क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
तू मेरे गीतों को पढ़, मेरी
भावुकता पर तरस खाए
और स्वयं की जीत पर
मंद-मंद मुस्कुराए
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
मैं अपनी भावुकता को तज
अपनी राह बनाऊँगा
जो तेरे दर तक पहुँचाए
उस राह कभी ना आऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
कभी था चाहा तुझे बहुत
अब पाने को अरमान नहीं
पास मेरे भी हैं प्रतीक्षित
तू ही एक पैगाम नहीं
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
याद करके मेरा प्रणय
नयन एक होंगे एक दिन सजल
दूर बहुत दूर लेकिन तब
तलक मैं चला जाऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ

Sunday, May 30, 2010

बरखा गीत


दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
मेघमय आकाश सारा
आच्छन्न है हरीतिमा पर
हौले से आकर गालों पर
टकराती है बूँद कोई
तनमन सिहर सा जाता
मन कहता है स्वयं से
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
रोम-रोम पुलक उठता
मात्र जिसके स्मरण से
बह चली है मधुर गति से
अल्हड़-सी वो पुरवाई
वो जो मुझसे दूर कहीं है
रे तू सहेली है न उसकी
जा जरा उसको जगा दे
रूठ कर जो है सोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
बूँद बनकर बरस
रिमझिम-रिमझिम नृत्य कर
मैं चातक-सी तृष्णा लिए
जोहता हूँ बाट तेरी
पावस की इस ऋतु में
हम-तुम हो जाए समरस
मैं मस्त मतवाला बन जाऊँ
तुम रख लो साक़ी वेश कोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई

Friday, May 28, 2010

सुंदरता को अपूर्ण ही होना चाहिए


रिमझिम झरती बूँदों को
बेधकर जब निकली
रवि-रश्मि
तो नीले आकाश पर
तन गया
इकहरा इंद्रधनु
रे धनु
तू भी है अभागा
सचमुच मेरी तरह
जो सुंदर है किंतु
संपूर्ण नहीं
अपूर्ण है
क्योंकि तीर नहीं
सुंदर है
क्योंकि तीर नहीं
तीर का होना
संधान का होना है
और संधान
नष्ट करता है
मिटाता है, गिराता है
ध्वंस करता है
लगा सचमुच सुंदरता को
अपूर्ण ही होना चाहिए

Thursday, May 27, 2010

ताकि तराश सकूँ....


लिखता रहा
ताकि मर ना जाए
उन क्षणों की अनुभूतियाँ
जिन्हें मैंने जिया
जिंदा रहे वह मधुरस
और हलाहल
अपनी खुशी से
वक्त के हाथों
जिसे मैंने पिया
लिखता रहा
ताकि बने रहे
उन ज़ख़्मों के निशां
जिन्हें अपने ही हाथों
अकेले में मैंने सिया
लिखता रहा
ताकि फूटती रहे कोंपलें
[दर्द के दरख़्त से
जिस्म और रूह में
अपने ही हाथों
जिसे मैंने बोया
लिखता रहा
ताकि तराश सकूँ
अपने ही बुत को
मेरे ख़्वाबों ने
मेरी आँखों में
जिसे हर रात संजोया
लिखता रहा.....लिखता रहा....

Wednesday, May 26, 2010

पुरवाई बहार की !


घूँट-- दर घूँट पीकर दर्द तेरे इंतजार का
रफ्ता-रफ्ता देख यूँ ही उम्र गुज़ार दी

खुद की हार का ग़म, या तेरी जीत की खुशी
हर शाम जिंदगी की मगर, यूँ ही निसार की

कोई आकर पूछेगा तो इतना ही कहेंगे नीरव
अबके ये बाज़ी बिना खेले ही हार दी

कोई एक ज़ख्म हो तो बताए दिल पर
नश्तर को भी अब तो, मिलती है लाचारगी

कोई सहेगा क्या हम- सा दर्द ए दोस्त
टूटे जब भी ऐसे हँसे गोया खुशी इज़हार की

वो तेज झोंके -सा आकर तोड़ गया, आखिरी पत्ता
दरख़्त का, हम ये समझे कि चली पुरवाई बहार की

Tuesday, May 25, 2010

कितनी क्षुद्र लेखनी मेरी


गिनती के गीत जुटा पाया
अपनी आँहों को उर में भर
तप कर, जलकर जीवन भर
संसृति सागर से गगरी में
दो-चार बूँद ही भर पाया
गिनती के गीत जुटा पाया
अलबेली मंजिल के दुष्कर पथ पर
कुछ फूल खिले कुछ काँटे थे
इनकी ही गंध चुभन को
अपनी साँसों में भर लाया
गिनती के गीत सुना पाया
मनचाहा यदि लगे तुम्हें कुछ
बिन पूछे ही ले जाओ
होगा कृतार्थ जीवन मेरा
किंचित भी यदि दे पाया
गिनती के गीत सुना पाया
इन्हें पढ़कर जी भर हँसना
मेरी भावुकता और नादानी पर
कितनी क्षुद्र थी लेखनी मेरी
सार की बात न कह पाया
गिनती के गीत सुना पाया।

Monday, May 24, 2010

कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ














जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
झूठे वादे करूँ कब तक
कब तक प्यार की कसमें खाऊँ
रस्में दकियानूसी निभाऊँ कब तक
कब तक झूठी बात करूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
जानता हूँ तू नहीं महबूबा मेरी
छोड़ कर साथ एक दिन जाएगी
तो फिर आज ही क्यों न कहूँ
लिव मी अलोन, क्यों बोझ सहूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
क्यों भला तुझको हँसा कर मैं दर्दों गम उठाऊँ
रूठ जाए तो तुझे मनाऊँ
क्यों नाज़ो-नखरे उठाऊँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
देख दूर से वो सौत तेरी
मुझे करीब बुला रही है
ढूँढ ले अब तू भी साथी
अलविदा मैं तो चलूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ

Sunday, May 23, 2010

विलंबित खुशियाँ


क्या इनको लेकर करूँगा,

असमय जो तूने दी सौगातें
क्या इनको लेकर करूँगा।।
जब इनकी कुछ चाह मुझे थी.
जब इनकी परवाह मुझे थी,
उस समय तूने की बेपरवाही अब
क्या इनको लेकर करूँगा।।
खुशियों को गम में बदलकर,
ग़म को भी भोगा तनहा,
अब यदि नीरव नीर बहाएँ,
क्या इनको लेकर करूँगा।।
मेरे नेह का कोमल पौधा,
मुरझाकर जब सूख गया।
अब यदि मधुऋतु आए,
क्या इसको लेकर करूँगा।।
मेरे भावमय छंद सुन,
तू हरदम मुझ पर हँसा,
मैं मरणशय्या पर, तू इनको गाएँ,
क्या सुनकर इनको करूँगा।।
ना अब दे तू मुझे कुछ,
मैं कुछ ना ले सकूँगा,
तनहा, तगं हाथ रखा ताजिंदगी,
अब भी तनहा खाली हाथ ही मरूँगा।।

Saturday, May 22, 2010

छोड़ दी मैंने तल्खियाँ


कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
कितना पहरे बैठाए थे तूने
खुद पर खुद की आरजुओं पर
ये गज़ब कैसे हुआ मगर
तुझ पर तेरा ही न बस चल पाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
उसके आने की न मुझको खबर हुई
न सुराग, न आहट, न अहसास
मेरे पास आकर जब तक ये न बतलाया
तू जिसके ख़्वाबों में गुम, मैं उसी का साया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
और जब वो मेरा मेहमाँ हुआ
छोड़ दी मैंने तल्खियाँ, पुरानी रंजिश
पहले उसके साथ एक जाम पिया, फिर
फिर से नग़मा भूले प्यार का गाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया

Friday, May 21, 2010

कोई कैसे कहेगा, जिंदा है अब हम







तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
अब न उदास धड़कनें हैं न प्यास है
न तुम, न तुम्हारी याद, न खुशी, न ग़मन
मचलते अरमाँ है, न बदहवासी का आलम
अब तो हमारी तनहाई है और है हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न शरबती लब है, न मय छलकाती आँखें
न लहराते गेसू हैं, न खोजती किसी को नज़र
न तुम, न तुम्हारी खुशबू न साँसें है गर्म
अब तो हमारी रूसवाई हैं और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न उमंग है, न मस्ती, न ज़ुंबिश कहीं
न उदासी, खालीपन नहीं, बेचैनी भी नहीं
अजब सा वीराना है, अजब-सा है मौसम
अब तो अजनबी पन है और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न रानाईयाँ है तेरे हुस्न की, न नशा
न तेरे जमाल की मदमाती अँगड़ाई है
न रूप की तपती धूप है, न गेसूओं की छाँव नरम
अब तो बेहया जिंदगी है, और हैं हम

Thursday, May 20, 2010

न गेसूओं को तुम हटाओ


यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
महकने दो साँसों में शबाब
खिलने दो गालों में गुलाब
छलकने दो आँखों से मधु
होंठो से बरसने दो शराब
यूँ ही छाई रहने दो ख़ुमारी
मदहोश हूँ न होश में मुझको लाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
टिका रहने दो सर अपनी गोद में
शानों पर रेशमी ज़ुल्फें लहराने दो
मुझको मालूम है हक़ीक़त ख़्वाबों की मगर
यह ख़्वाब जिंदगी भर का हो जाने दो
ख़ामोशी से देखती रहो मुझको बस
हो सके तो मेरी आँखों में बस जाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ

Wednesday, May 19, 2010

.....और गज़ल कहे कोई

दिल गमों से चूर हो
और गज़ल कहे कोई
दर्द को छिपा ले कलेजे में
और गज़ल कहे कोई
सौ तल्खियाँ हो चेहरे पे
और गज़ल कहे कोई
ख़लिश न मिटती हो दिल की
और गज़ल कहे कोई
लरज़ते ज़ख्म हो दिल के
और गज़ल कहे कोई
टूटते लफ़्ज हो जुबाँ पर
और गज़ल कहे कोई
बहुत कहने को हो अरमाँ
और गज़ल कहे कोई
आखिरी लम्हा हो जिंदगी का
और गज़ल कहे कोई
वसीयत में लिख जाए गज़ल
और गज़ल कहे कोई

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