Sunday, May 25, 2014

बची है संभावना




नर्सरी से पौधे खरीदते
दंपत्ति
आश्वस्त करते हैं मुझे
हरियाली बची रहेगी अभी

लाल गुलाब
खरीदकर कोट में छिपाता
लड़का
सांत्वना देता है
प्रेम बचा हुआ है अभी

लायब्रेरी से निकलती
संजीदा नवयुवती
देती है दिलासा
पुस्तकें अब भी पढ़ी जाती हैं

सलीके से साड़ी पहने हुए
स्त्री
मानो भरोसा देती है
गरिमा हमारी अक्षुण्ण है अभी

लाख उलाहना देते हों
लोग
मुझे अब भी नजर आती है
दुनिया में संभावना

Monday, March 31, 2014

फ़्राड



तू कहता इतनी खूबसूरती से है ,तेरी हर बात पे ऐतबार हो जाए
क्या करूँ कि मुझे लफ़्जों से नहीं, काम से यकीं होता है
मैंने देखा है फरेबी को,उसकी हर अदा पर मरने को करता है दिल
वादा निभाने वाला शख़्स अक्सर साफ-गो और अपनी धुन में रहता है
अपने हुनर में उस्ताद है वो ये बात यकीनन काबिले तारीफ है
बाज़ीगरी से सचमुच कटे न सर किसी का यही अक्सर नहीं होता है
हरेक करीबी को देता है धोखा या तोड़ता है दिल
यह अजीब शौक उसे ,मौसमों की तरह बदलता रहता है
ज्यादातर बाजियों में मात खाकर भी ,शिकस्त को तैयार नहीं
खेल की तरह वो जिंदगी को ,शतरंज करता रहता है

Saturday, March 15, 2014

मखमली दलदल



जितने हो, उससे भी उथला कर जाएगा
ये भरा हुआ बाज़ार, कुछ नहीं दे पाएगा

एक दिन अचानक इस चमक-दमक से ऊब उठोगे
क्या सोचते हो, उसके बाद बुद्धत्व मिल जाएगा

वो दरिया और है, जिसे डूबकर करते है पार
ये मखमली दलदल तुम्हें पूरा लील जाएगा

दौड़ तो एक जगह से शुरू हो, दूसरी पर होती है खत्म
यह तिलस्मी सफर तुम्हें केवल कोल्हू का बैल बनाएगा

ये कौन कहता है शरीक-ए-हयात न हो
बाँधो न पट्टियाँ, नज़रों में अँधेरा बस जाएगा

Wednesday, February 26, 2014

न कृष्ण, न बुद्ध


कुछ
सौंदर्य से
दूर रहे
बेचैन रहे
कुछ
पास रहकर भी
बेज़ार रहे
कुछ को
व्यापा ही नहीं यह
पास रहे, दूर रहे
निर्विकार रहे
..................
ऐसे दुनियादार
लोगों से ही
दुनिया
गुलज़ार रहे

दिन बासंती कम हो गये

ऋतु-मौसम आगे खिसक गये
दिन बासंती कम हो गये
सर्दियाँ मार्च तक गर्मियाँ अप्रैल से
दिन बहारों के कम हो गये
शादी शाही होने लगीं ज्यादा
दिन साथ रहने के कम हो गये
लोगों से मिलने-जुलने में
दिन तन्हाई के कम हो गय
शामो-सहर एक बैचेनी सी
दिन फुर्सत के कम हो गये

Tuesday, February 18, 2014

नई-नई स्कूल टीचरृ -सा सूरज




किसी
स्कूली शिक्षिका की तरह
सूरज
आने से पहले
मुर्गे से बांग लगवाता है
पक्षियों को चौंकाता-जगाता है
भेजता है हरकारा
ब्लैक बोर्ड साफ करवाता है
फिर धीर-गंभीर चेहरा बनाकर
अपने सौंदर्य को दबा-छिपाकर
करता है प्रवेश
(मंत्रमुग्ध करने से रोक नहीं पाता, नटखट स्टूडेंट्स को)
छा जाती है
गरिमामय शांति
(अंदर से गुदगुदाती)
आसमान के धुले-पुछें
श्यामपट्ट पर
भरता है
ढेर सारे रंग
श्यामल नीला
धूसर सफेद
हल्का सिंदूरी
नारंगी
और चटख सुनहरा
लिखता
लिखता चला जाता है
कुछ उतारते हैं रंग
अपनी कॉपी में
(या कि जिंदगी में)
कुछ बस देखते रहते हैं
(जो पढ़ते हैं ट्यूशन बाद में)
कभी-कभी
सूरज का सिर चढ़ जाता है
लाल होकर अंगारा हो जाता है
भुला देता है हेकड़ी सबकी
मगर अंततः
बच्चों से प्यार करने वाली
टीचर की तरह
शांत होता है
दुलारता है
शाम लाता है
जल्दी-जल्दी समेटता है
सामान
संक्षेप में फिर
पूरा पाठ दोहराता है
सुनहरे चटख से
लोहित-श्यामल-पीले तक
कुछ पुछां, कुछ लिखा छोड़कर
क्लास से बाहर निकल जाता है
(सृजनशील छात्रों में प्रेरणा भर जाता है)
आखिर लेनी होती है
उसे दूसरी कोई क्लास
कल फिर आने के लिए
आश्वस्ति दे जाता है
नई-नई स्कूल टीचर-सा सूरज
रोज नई ड्रेस पहनकर आता है
(और सबका पहला प्यार बन जाता है)

Sunday, February 16, 2014

गहरा गोता लगाने से पहले



मन
जब प्रदर्शन-प्रिय हो जाता है
सघन विचार
आते-आते खो जाता है
गहराई में
जाने से पहले
छोड़ना ही पड़ता है
ऊँचाई की हर राह का खयाल
वरना
मन
उस नौसिखिए तैराक-सा हो जाता है
जो गहरे गोते की चाह में
ऊँचाई से कूद लगाता है
और
तमाम कोशिश के बावजूद
पानी द्वारा
तीन बार उछाला जाता है
................................
नाक-मुँह-कान में
पानी भरे
जैसे-तैसे
किनारे आता है
.............................
गहराई का गोता
ऊँचाई से नहीं
सतह के पास से
निःशब्द लगाया जाता है

Saturday, February 8, 2014

खैर हो....

जो वक्त है कुछ रचने -रचाने का,अफ़सोस
वही वक्त है दुनिया में ख़ाने-कमाने का

मेरे घर आओ तो हँसो-मुस्कराओ,याद रखो
रिवाज़ नहीं है हमारे यहाँ,रोने-रुलाने का

मेरी छत पर फूल ही फूल खिले हैं,गोया
कलियों को मौका चाहिये सूरज से आँखें लड़ाने का

कोई बात है जिससे उदास है वो,वरना
बसंत का मौसम तो है उसके खिलखिलाने का

कोई दिल की सुने या दिमाग की,खैर हो
जो मैकदे का वक्त है वही है रोज़ा निभाने का

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।