Sunday, February 16, 2014

गहरा गोता लगाने से पहले



मन
जब प्रदर्शन-प्रिय हो जाता है
सघन विचार
आते-आते खो जाता है
गहराई में
जाने से पहले
छोड़ना ही पड़ता है
ऊँचाई की हर राह का खयाल
वरना
मन
उस नौसिखिए तैराक-सा हो जाता है
जो गहरे गोते की चाह में
ऊँचाई से कूद लगाता है
और
तमाम कोशिश के बावजूद
पानी द्वारा
तीन बार उछाला जाता है
................................
नाक-मुँह-कान में
पानी भरे
जैसे-तैसे
किनारे आता है
.............................
गहराई का गोता
ऊँचाई से नहीं
सतह के पास से
निःशब्द लगाया जाता है

Saturday, February 8, 2014

खैर हो....

जो वक्त है कुछ रचने -रचाने का,अफ़सोस
वही वक्त है दुनिया में ख़ाने-कमाने का

मेरे घर आओ तो हँसो-मुस्कराओ,याद रखो
रिवाज़ नहीं है हमारे यहाँ,रोने-रुलाने का

मेरी छत पर फूल ही फूल खिले हैं,गोया
कलियों को मौका चाहिये सूरज से आँखें लड़ाने का

कोई बात है जिससे उदास है वो,वरना
बसंत का मौसम तो है उसके खिलखिलाने का

कोई दिल की सुने या दिमाग की,खैर हो
जो मैकदे का वक्त है वही है रोज़ा निभाने का

Friday, January 17, 2014

इलहाम




सब छोड़ना पड़ता है, सब पाने के लिए
जब तक डूबे नहीं चाँद, सवेरा नहीं होता

हम ही कहाँ ख़्वाहिशों के लिए जुनूनी हैं
कौन-सा ख़्वाब है वरना है, जो पूरा नहीं होता

पहले सीखो, फिर कमाओ, फिर आँखें फेरो, भूल जाओ
जिंदगी चार पहर की, हर पहर दोबारा नहीं होता

किस्मत से तुम्हें-मुझे मिल गई है असल तालिम
फ़लसफ़ा जिंदगी का हरेक पे तारी-नुमाया नहीं होता

इलहाम हो ही गया है तो खोल लो आँखें
दरवाज़े पे दस्तक हो दुबारा, दुबारा नहीं होता

Sunday, December 22, 2013

सुख ने थोड़ा हमें थकाया




मैं अपने पिता-सा मजबूत कहाँ हूँ
तुम ही अपनी माँ-सी सुघड़ कहाँ
अलस्सुबह दिन होता था, रात देर से ढलती थी
दौर बदला, बदले हम, शाम कहाँ वो, सहर कहाँ
मेरी ज़द में दसों दिशाएँ, जह हम अलग-अलग थे
एक लीक पर अब हम-तुम, पहले वाली हुलस कहाँ
सुख ने थोड़ा हमें थकाया, तोड़ा भी हमको थोड़ा
हाड़-तोड़ मेहनत वाली, वो पसीने की महक कहाँ
सब कोई अपने थे, हर लम्हा जीते थे
लोग कहाँ वो रीत कहाँ, साज़ कहाँ वो गीत कहाँ

Sunday, November 10, 2013

दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है




थोड़ी-सी उदासी रूह को संवार-सजा देती है
सीली हो अगरबत्ती,ज्यादा ख़ुशबू-धुआं देती है

सुख ज्यादा हो छिन जाता है नींद-चैन
थोड़ी तकलीफ़ ज़िन्दगी को मज़ा देती है

कौन माँगता है तकदीर में ख़लिश-काँटे
पेशानी की सिलवटें हर शै को सजा देती है

जरा-सा नमक बढ़ा देता है लज्जत सबकी
दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है

आग गहरे में हो शख्स बन जाए कुन्दन
सतही गर्मी तो बस मसखरा बना देती है

Friday, October 18, 2013

शरद-पूर्णिमा, नहीं!



जब-जब
तुम अपना वजूद पहचानती हो
चमकते सूर्य की परछाई बन दमकता चाँद बनना नकारती हो
दुनिया में बढ़ जाती है शान, यकीन मानो,
चमक-दमक के इतर तुम अस्तित्व स्वीकारती हो
मेरे लिए स्वयं सूर्य बन जाती हो
मैं ऐश्वर्य नहीं ऐशवर्यपूर्ण सादगी पर मरता हूँ
शरद-पूनम नहीं,सघन-मावस मनाता हूँ
(कवि हूँ न. अँन्धेरों से रोशनी पाता हूँ)
जितनी भी हो खुद से हो रोशन तुम
मैं अपनी चमक को ढँक
तुम्हारे साथ तुम्हारा दिन गुजारना चाहता हूँ

Thursday, September 19, 2013

निचाट एकांत



बजता हो
भले संगीत
मुझे व्यवधान लगता है
हमारे बीच
..................
कुछ नहीं हमारे बीच
केवल रहें हम
निष्कवच
...............
कुछ जुमले तुम्हारे
मेरी हाँ-हूँ
कभी-कभी तो
लगते हैं
ये भी व्यवधान
करते व्यथित
...............
हम तुम जब अकेले हों
काश, हमेशा
बाकी हो तो केवल
रहसंलाप
हमारी आत्माओं के बीच



Thursday, September 12, 2013

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी


सब भर जाता है तो सब मर जाता है
खाली कर दो खुद को, तो वक्त लौट आता है

हार कर बैठना भी ईलाज है एक किस्म का
हर वक्त जीतने से, इसका मायना मर जाता है

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी
जिंदादिली से मरना भी, अमर कर जाता है

हम अपने ही प्रेत के होते हैं ग़ुलाम
गुज़रा हुआ तो भूत है, कहाँ लौट पाता है

वक्त जिया तो ठीक, गुज़ारा-गँवाया तो ठीक
हम जो मानें, बही-खाते में वही नजर आता है

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।