Thursday, October 4, 2012

द्वीप ही बने रहना चाहता हूँ


मैं एक द्वीप रहना चाहता हूँ
बहती नदी है संसार की
आस-पास में बहती रहे
मैं नहीं संग बहना चाहता हूँ

जानता हूँ तिल-तिल रेतती हैं
धार हरहराती मुझे
मैं, अक्षुण्ण भले न
अड़े रहना चाहता हूँ

कौन जाने आपदा जो मुझपर है
कल को अनिवार कारणों से नदी पर आए
मैं यहीं, यूँ ही बना रहूँ अटल
नदी की ही धार मुड़ जाए या कि
नदी को ही स्वयं मोड़नी पड़ जाए

जो हो, जब तक रेत न हो जाऊँ पूरी तरह
(और जानता हूँ इसमें वक्त लगेगा बहुतेरा)
मैं न घुटने टेकना चाहता हूँ,
न नदी के संग बहना चाहता हूँ,

मैं जहाँ हूँ, जैसा हूँ, जबसे हूँ
बसो उतना वैसा भले न, मगर बने रहना चाहता हूँ।

Monday, September 17, 2012

हर वक्त कोई कहाँ सिकंदर रह पाता है!


 खेल कोई भी हो, अपरिहार्य वजहों से,
खतरा बढ़ जाता है
एक वक्त के बाद
हर खेल खतरनाक हो जाता है
नहीं रहता खेलने वाले के हाथ में,
किसी ओर का हो जाता है
जाने-अनजाने चली
हर चाल धारण कर लेती है
एक अर्थ
अर्थ से अनर्थ का मेल शुरू हो जाता है
प्यादे, घोड़े, हाथी, वज़ीर
सब बदलने लगते हैं रूख औ रूप
हर गोट महत्वपूर्ण हो जाती है
कोई भी चलो बाज़ी
खेल खत्म होने का
खेल शुरू हो जाता है
सारी इंद्रियाँ सजग हो जाती है
हर हरकत आ जाती है नज़रों के दायरे में
माथे के पास फड़कती नस हो
या पुतलियों का स्थिर-एकाग्र होना
हर जुंबिश का एक मायना
अज़ब और अज़ीब नजर आता है
क्या राजनीति, क्या भूगोल
क्या समाजशास्त्र, वाणिज्य, अर्थशास्त्र
हर शास्त्र बन जाता है विज्ञान
विज्ञान में कलाकार नजर आता है
एक तरफ कुआँ, एक तरफ खाई
तनी रस्सी भले नहीं पड़ती ढ़ीली
रस्सी पे चलते रहने का हुनर डगमगा जाता है
इन सब खतरों को खेते हुए
हानि, अमंगल, नुकसान सहते हुए
जो कोई इसे निभा ले जाने का
साहस जुटा पाता है
तिलस्मी दरवाजे खुलते हैं, उसी के लिए
जीत जाता है वो हर बाजी
सिकंदर बनकर उभर आता है
--------------------------------
नियति यह है कि कोई भी सिकंदर
हर वक्त कहाँ सिकंदर रह पाता है

Sunday, August 12, 2012

विरोधाभास...


मई-जून की
तेज धूप में
जल जाती हैं
कोंपलें, पत्तियाँ
जड़ें
बच जाती हैं
जुलाई-अगस्त की
बारिश
ठूँठ में भी
रवानी
ले आती है
लगातार तेज बारिश
मगर जब गलाती है
तो जड़ें भी
अपना
अस्तित्व
नहीं बचा पाती हैं
.....................
अभाव
झुलसा देते हों
भले, किंतु
हमारे
मूल्य बच जाते हैं
अमीरी मगर
जब गलाती है
तो
जड़ें, मूल्य, संस्कार
सब
मिटा डालती है
.....................
पुनश्चः
.................
भोग ही में
गर रस पाओ
तो
पहले अपनी जड़ें मजबूत बनाओ

Thursday, July 5, 2012

मेरे विरोधाभास

एक क्षण में
काव्यमय
तत्क्षण ही
दुनियादार
मेरे विरोधाभास
मुझे कहीं नहीं छोड़ते

Sunday, July 1, 2012

साथ स्वयं का...


जब कहीं जाना नहीं हो
तब ठहरनाजब कुछ माना नहीं हो
तो जीना
जब कुछ पराया नहीं हो
तो सहना
जब कोई सबब नहीं हो
तो रोना
जब कोई सुनता नहीं हो
तो कहना
..............................
अपने आप में
अपने साथ गुजरना
कितना अच्छा लगता है

Tuesday, May 29, 2012

असल बात

ख़ुला ही
रखा जाता है
ख़ुशबूदार फ़ूलों को
-ग़ुलदानों में-
शाख से तोड़ने के बाद भी
बरअक्स
रंगीन फूलों के
जिन्हे लपेट दिया जाता है
पारदर्शी पन्नियों में
...................
रंग हों जीवन में
अच्छा है ,मगर
असल बात
ख़ुशबू ही में है.

Thursday, April 26, 2012

धूप पहाड़ों की


पहले छूती है
फुनगियाँ
फिर पत्ते
फिर शाख
तना
और अंत में जमीन को
.........................
धूप पहाड़ों की
प्यार की तरह नहीं
करूणा की तरह आती है
झनझनाती नहीं
जड़ों तक को
आहिस्ते से
सहला जाती है

सफेद तितलियाँ


उतनी ही चपल-चंचल,
ढेर-की-ढेर हैं ... मगर
हैं सफेद, तितलियाँ
पहाड़ों की
इनको देखकर
करूणा का भाव आता है

तेज धूप के हों हजार नुकसान,
किंतु
जीवन में रंग
उसी से आता है

शायद इसी से
समतल से ऐश्वर्य का
और पहाड़ों से वैराग्य का
गहरा नाता है..

Sunday, April 1, 2012

मालिक-मजदूर


रोज़
सुबह-सुबह
निकलते हैं घर से
मोबाइल कानों में लगाए
बैठते हैं गाड़ी में
दफ्तर जाते हैं
ढ़ेर सारे काम
करते-करवाते हैं
आते हैं देर शाम
थोड़ा टीवी देखकर
खर्राटे भरते हुए
सो जाते हैं
साहब हैं
मजदूर-सा जीवन बिताते हैं
छुट्टी के दिन
घूमते हैं घर के चारों गिर्द
धूल-मिट्टी, कचरा उठाते हैं
देते हैं पौधों को पानी
पानी की तेज बौछार से
गेट-गाड़ी धोते हैं
पसीना बहाते हैं
बन जाते हैं मजदूर
तभी हम घर के मालिक बन पाते हैं


Monday, February 27, 2012

टर्मिनेटर


कुम्हलाए फूलों ने कहा
हमें नहीं दुलराओगे
तीन दिन हो गए है, पानी कब पिलाओगे!
टपकते नल ने कहा
बातें करते हो जल संरक्षण की
मुझे कब सुधरवाओगे!
तीखे पत्थर के टुकड़े ने कहा
मुझ पर डालो रेती-मिट्टी
वरना चोटिल हो जाने के आरोप लगाओगे
टूटे गमलों, सूखी घास, छत के जालों
गंदे कपड़ो, रूखे जूतों, किताबों की गर्द ने भी
अपना-अपना हिस्सा माँगा
हमारी भी सुनो हमें कब सहलाओगे
सबको दिया उनका दाय
और भूल गया दिल की पुकार
जिसने की थी इल्तिज़ा
अल्लसुबह, आज इतवार है यार
फुर्सत के कुछ लम्हें मेरे साथ बिताओगे!

Tuesday, January 31, 2012

विंटर ब्लूज़


रोज़े-अब्र (बरसात के दिन) उदास रहती है
शबे-माहताब (चाँद की रात) उदास रहती है
खूबसूरत शै है वो मगर
जहीन बनकर उदास रहती है
सर्दियों में जाने क्या बात है
सरे-शाम उदास रहती है
गज़लें सुनती है लेटकर
लेटे-लेटे उदास रहती है
मुझसे करती है बेहद मुहब्बत
मुझसे मिलकर उदास रहती है
दुनिया में है मंदी, मोहल्ले में शोर
बस सुनती है और उदास रहती है
सच्चे मायनों में है इंसान
हर किसी के दुख में उदास रहती है


Monday, January 30, 2012

मुझे मुहब्बत है तुमसे...

कई बार रात-बिरात
नींद खुल जाती है
देर तलक कोशिश
करुँ सोने की,
नींद नहीं आती है
यक-ब-यक
रोशन हो जाता है
दिमाग़
घुप्प अँधेरे कमरे में
जैसे, रोशनी की एक
किरण आती है...
तनहाई और उनींदेपन में
एक कविता उतर आती है
रात गुलज़ार हो जाती है
.............................
यह अलहदा है कि
अक्सर सुबह वह
-   बहुत सोचने पर भी –
याद नहीं आती है
.......................
मैं आश्वस्त हो जाता हूँ
मुझे मुहब्बत है तुमसे
क्योंकि, अब भी उनींदी रातों में
कविता ही मुझ तक आती है...


Saturday, December 24, 2011

आश्चर्य है...!


माथे से
अंगूठे की पोर तक उमड़ती
जाती, ये लहरें...
सीने का वो उमड़ता तूफान,
खुशबू के दुर्निवार भँवर,
आँखों की अमाप गहराई
कोई शख्स कैसे
पूरा समंदर
हो जाता है

Sunday, October 9, 2011

हम जिसे छू सके, उसको ख़ुदा कहते हैं


कोई जरूरी तो नहीं, दरवेश की शक्ल बनाए
जिसकी तबीयत हो सूफ़ी, हम उसको खुदा कहते हैं

मेरे आगे कुछ और, मेरे पीछे अलहदा
मेरे बारे में पता नहीं, वो अस्ल में क्या कहते हैं

जब तलक तू है तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसको छू सके, उसको खुदा कहते हैं

मेरे माज़ी को लेकर या मुस्तकबिल की जानिब
कुछ भी कहें, वो हर बात बामज़ा कहते हैं

मैं तस्वीरों में सोचता हूँ, कहता हूँ लफ़्ज़ों में
कुछ लोग मगर खुद को काम से बाअदा कहते हैं

अजनबी इस दुनिया में, एक शख़्स तो अपना-सा है
इस अता से भी नीरव, सब लोग जुदा रहते हैं

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।