Wednesday, May 18, 2011

मंजूषा


सत्य को नहीं
सहेजूँ यदी शब्दों में
तो जल्द ही मुझसे
वह खो जाता है
बैठ जाता है कहीं
तलहटी में
मन एकाकी उपर
रह जाता है
कहानी, कविता
ये सब मंजूषा है

Tuesday, May 17, 2011

कब? आखिर कब!


धूप-छाँह के अंतहीन सिलसिले में
कोई गहरी छाँह पर
दिन-रात के घूमते चक्र में
अपनी-सी एक शाम कब
बासंती, हेमंती, पतझड़ी मौसम में
प्रतीक्षित कोई कोंपल पर
ऊँची-नीची स्वरलहरियों के कोरस में
अपना कोई छंद कब
यह सब जाने कब
अभी तो बस
दौड़, प्रतीक्षा, संघर्ष
और गहरी, गहराती उदासी सब

Monday, May 16, 2011

कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं


पुस्तक प्रदर्शनी में
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं
न इन्हें कोई खरीदता है
न पढ़ता है
न समझता है
(देखने वाले भी होते हैं इक्के-दुक्के ही)
फिर
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है
कवि
इतना असंपृक्त क्यों होता है
न उसे कोई सराहता है
न दुलारता है
न समझता है
(जो समझते हैं, वो भी उपरी तहों में)
फिर
कवि कविताएँ क्यों लिखता है
कवि इतना स्वांत सुखाय कैसे होता है
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है

Sunday, May 15, 2011

दुनियादारी


संपूर्ण दिवस में एक क्षण
एक क्षण
जब अपना प्राकृत रूप पाता हूँ
तो देखता हूँ अपने मुखौटों को
जो नए और आकर्षक
ढ़ंग से सृजन किए हुए हैं
मेरी महत्वाकांक्षाएँ
देखता हूँ, ओढ़ रहा हूँ
सुबह की व्यस्तता का मुखौटा
स्वप्निल नींद से जाग जाने की झुँझलाहट
और दिन भर की
व्यस्तताओं की सूची
मेरे माथे की शिकन तक
लिखी हुई
आँखें उनींदी-सी
अभी भी रात के सपनों में
खोई-खोई
तभी याद आता है
आज का दिया हुआ हुआ
अपांइटमेंट
वही तोड़ता है मेरी काहिली
और बना देता है
मुझे मशीनी
थोड़ी देर बाद
जब बाहर कदम रखता हूँ
तो देखता हूँ
आईना
जमे हुए बालों से लेकर
जुराबों के रंग तक
सभी कुछ ठीक है
मगर
तभी आईने के अंदर से
कोई हँसता है
व्यंग्यपूर्वक
विद्रूप हँसी
मैं बलपूर्वक दबाता हूँ उसे
और चल देता हूँ
अभी थोड़ी देर बाद
किसी से मिलना जो है

Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



Wednesday, April 20, 2011

केसरिया है प्रेम म्हारो

एक फूल में
उगते हैं
दो फूल केसर
एक कहलाता है केसर
खुशबू, स्वाद, सौंदर्यवर्धक
दूसरा
कहलाता है घास
भाई लोग इसे
केसरिया रंग और खुशबू में
रंग, बना देते हैं केसर
असली-सा
कसौटी पर गर न चढ़े
तो कोई जान नहीं पाता असलियत
बिकता है ज्यादा नकली, असली से
मगर जब होती है पहचान
तब असल पाता है
अपनी जगह और मान
...............
प्यार जो मैंने किया है तुम्हें
काश! कभी कसौटी पर चढ़े
तब हो पहचान

Tuesday, April 19, 2011

सोनमर्ग

आए ढेरों मिसरे
लिख न पाया
एक भी
नज़म
एक भी गज़ल
बस उठा लिए कुछ बीज
जिन्हें
बनाने की कोशिश करूँगा
चिनार, सफेदा, देवदार, चीड़
या जो भी कुछ...

Monday, April 18, 2011

रोमांस

पत्ते चिनार के
रखती है सफ़ों के बीच
एक लड़की
गोकि याद रहे
चिनार बाग और कश्मीर
उन सफ़ों को खोलने का
वक्त भले ना हो
उसके पास



Sunday, April 17, 2011

पहलगाम

कल-कल लिद्दर
ठंडी छाँह
दसियों रंग
ढेरों फूल
महँगी रोटी, सस्ती धाम
जितने घोड़े, उतनी गाड़ी
अब तो नहीं
पहले होगा गाम
पहलगाम


Thursday, April 14, 2011

गुलमर्ग टॉप

बर्फ पिघलने से
उपजी
दलदली जमीन किनारे
उगा है जीवन
पीले-बैंजनी
नन्हें-से फूल
जीवन कहाँ-कहाँ
कैसे-कैसे पनपता है

Tuesday, April 12, 2011

बहता अम्रत

यहाँ पहाड़ों पर
खेतों के
ढलवाँ किनारे
दौड़ता है
बर्फ से निकला पानी
मैं कलपता हूँ मैदानी
हाय! व्यर्थ ही बहा जा रहा है पानी

Monday, April 11, 2011

डल किनारे

दौड़ रहा है
जीवन
बहते पानी-सा
और मैं किनारे

Sunday, April 10, 2011

गुलमर्ग

दूर से चमकती
दीखती थी बर्फ
श्वेत-धवल चाँदी-सी
पास पहुँचे
लिए धौंकनी साँसें
और पसीने से तरबतर
तो मिट्टी सनी बर्फ
गंदला पानी
और कीचड़ निकला
धत् तेरे की
गुलमर्ग भी
जिंदगी-सा
भ्रम औऱ नीरस निकला

Saturday, April 9, 2011

श्रीनगर ( 07-06-07 )

जल्द होती है सुबह
देर तलक रहती है रोशनी
मौसम फिर भी ठंडा और खुशगवार
शायद यही बात
गुजरती हो दुश्मनों को नागवार
फैलाते थे दहशत
करते थे मासूमों पर वार
अब
सबकुछ ठीकठाक
पुरसुकून, खुशमिजाज
ओ कश्मीर! तुझपे जाँनिसार

Friday, April 8, 2011

पटनीटॉप

दिन भर में मुझे मिला
थोड़ा-सा एकांतिक अनुभव
खुशबू चीड़ की
चीड़ की एक टहनी
और चीड़ की छाल
झुंड बनाकर बैठे कश्मीरी
उनके बच्चे
मासूम बच्चियाँ
सेब के रंग-से
रंग-बिरंगे फूल
चीड़ की सीकों की धूल
भरे हुए पाँव-पिंडलियाँ
धौंकनी साँसें
गुलाब के गुच्छों वाली हैज
शांत-एकांत वाली सेज
और रह गया – बच गया जो
सनासर, टूटे पेड़ों के तनों के
बीच से निकलता हो अमिता का सर
ऐसा फोटो लेने का अवसर
और माईलस्टोन-सा तुम्हारा कथन
सोच के होती है हैरानी कि स्साला ! पसीना कैसे आता होगा?

Wednesday, April 6, 2011

एंथेलियम

अभी-अभी चाँद के चारो ओर
रोशनी का एक घेरा देखा
अजीब-से रोमांच के साथ सोचा
महान आत्मा
जन्म लेती हो , न लेती हो
इस समय
दिव्य क्षण के जरूर
निकट होते है हम

Tuesday, April 5, 2011

ऐ सपने !

मैंने तो देख लिया
ऐसा सपना
जो कभी पूरा न होगा
मगर
कभी नहीं
ये निर्धारण कैसे मेरा
ये तो सपने के ही हाथ
कि वह वही रहे
या साकार हो जाए
ऐ सपने !
मैं तो तुझसे यही कहूँ
तू कभी पूरा न हो



Friday, April 1, 2011

ओ निर्माता

स्वयं को
अकेला रखने का मैंने
एक अजब तरीक चुना
पहले तुमसे जुड़कर
काटता रहा सबको
हर रिश्ते हर बंधन को
और जब सबसे मुक्त हो गया
तो तुमसे भी अलग हो गया
इस तरह मैं
पूरी तरह
मैं रह गया

Monday, March 28, 2011

हम अपरिभाषित

व्यक्तित्व से अस्तित्व तक की
देते रहे हम परिभाषा
बाँधते रहे उन्हें
कभी शब्दों से
कभी चुप्पियों में
कभी शब्द और सन्नाटे के अंतरालों में
किंतु स्वयं की न तो कभी दी परिभाषा
न बाँधना भाया किसी से
तो खुद अपरिभाषित
अपरिमित
निर्बंध रह गए।

Sunday, March 27, 2011

खोजने निकला तो

खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर...
कोई चंचल मिला, कोई शांत मिला
कोई खुश मिला, कोई अशांत मिला
कोई बौराया, कोई पगलाया-सा
कोई उदास, कोई निराश मिला
खोजने निकला तो
कोई प्यारा-सा, कोई न्यारा-सा
कोई जीता-सा, कोई हारा-सा
कोई उत्साहित, कोई विथकित
कोई अनुरक्त, कोई विरक्त
कोई यायावर, कोई सैलानी
कोई रमता जोगी, कोई तपी-ध्यानी
खोजने निकला तो
एक तुम ही न मिले
कहीं
ओ अभिमानी
ओ तेजोमय
ओ प्रभामय
ओ अमित स्वरूप
ओ मुझ मृग की तृष्णा के झिलमिल पानी
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर एक तुम ही मिले



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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।