मैं तुम्हें पसंद करती हूँ
इसलिए नहीं कि
तुम आर्दशवादी हो
या कि व्यक्तित्ववान हो
या हर चीज को परखते हो तुम
अपने नजरिए से
बल्कि इसलिए कि
तुम एकदम जुदा हो
आम आदर्शवादियों से
तुम्हारे पास है न गंभीर चेहरा
न भारी-भरकम बातें
न उत्तरदायित्व का युग-बोझ
न व्यवहार में कहीं खटकती शुष्कता या उथलापन
तुम एक किताब हो
जो हर पृष्ठ पढ़ने पर ही समझ आती है
केवल प्रस्तावना या उपसंहार पढ़कर नहीं
अपनी वैचारिक उलझनों के बीच भी
कब तुम रोमेंटिक हो जाओगे
कोई कह नहीं सकता
और कब मेरे काँधे पर सिर रखकर
युगीन समस्याओं पर सोच उठोगे
कई बार मुझे भी मालूम नहीं पड़ता
सच कहूँ, तुम्हारी इन्हीं संभावनाओं
और अनिश्चितताओं से प्यार है मुझे
और मैं निश्चिंत हूँ यह जानते हुए भी
कि मेरे कंधे पर टिका हुआ तुम्हारा माथा
सुलझा रहा है, कोई साहित्यिक समस्या
क्योंकि मैं जानती हूँ
लिखते, पढ़ते, सोचते
या कि बाजार से गुजरते भी
मैं तुम्हारे आसपास ही होती हूँ ( औऱ जैसा कि तुम अक्सर कहते हो)
आसपास और अंदर...