Friday, June 4, 2010

क्यों लिखूँ गीत वेदना के


क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
तू मेरे गीतों को पढ़, मेरी
भावुकता पर तरस खाए
और स्वयं की जीत पर
मंद-मंद मुस्कुराए
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
मैं अपनी भावुकता को तज
अपनी राह बनाऊँगा
जो तेरे दर तक पहुँचाए
उस राह कभी ना आऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
कभी था चाहा तुझे बहुत
अब पाने को अरमान नहीं
पास मेरे भी हैं प्रतीक्षित
तू ही एक पैगाम नहीं
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ
याद करके मेरा प्रणय
नयन एक होंगे एक दिन सजल
दूर बहुत दूर लेकिन तब
तलक मैं चला जाऊँगा
क्यों लिखूँ गीत वेदना के
क्यों स्वर को कटुतर बनाऊँ

Sunday, May 30, 2010

बरखा गीत


दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
मेघमय आकाश सारा
आच्छन्न है हरीतिमा पर
हौले से आकर गालों पर
टकराती है बूँद कोई
तनमन सिहर सा जाता
मन कहता है स्वयं से
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
रोम-रोम पुलक उठता
मात्र जिसके स्मरण से
बह चली है मधुर गति से
अल्हड़-सी वो पुरवाई
वो जो मुझसे दूर कहीं है
रे तू सहेली है न उसकी
जा जरा उसको जगा दे
रूठ कर जो है सोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई
बूँद बनकर बरस
रिमझिम-रिमझिम नृत्य कर
मैं चातक-सी तृष्णा लिए
जोहता हूँ बाट तेरी
पावस की इस ऋतु में
हम-तुम हो जाए समरस
मैं मस्त मतवाला बन जाऊँ
तुम रख लो साक़ी वेश कोई
दूत बनाकर बादलों को
मैं लिखूँ पाती कोई

Friday, May 28, 2010

सुंदरता को अपूर्ण ही होना चाहिए


रिमझिम झरती बूँदों को
बेधकर जब निकली
रवि-रश्मि
तो नीले आकाश पर
तन गया
इकहरा इंद्रधनु
रे धनु
तू भी है अभागा
सचमुच मेरी तरह
जो सुंदर है किंतु
संपूर्ण नहीं
अपूर्ण है
क्योंकि तीर नहीं
सुंदर है
क्योंकि तीर नहीं
तीर का होना
संधान का होना है
और संधान
नष्ट करता है
मिटाता है, गिराता है
ध्वंस करता है
लगा सचमुच सुंदरता को
अपूर्ण ही होना चाहिए

Thursday, May 27, 2010

ताकि तराश सकूँ....


लिखता रहा
ताकि मर ना जाए
उन क्षणों की अनुभूतियाँ
जिन्हें मैंने जिया
जिंदा रहे वह मधुरस
और हलाहल
अपनी खुशी से
वक्त के हाथों
जिसे मैंने पिया
लिखता रहा
ताकि बने रहे
उन ज़ख़्मों के निशां
जिन्हें अपने ही हाथों
अकेले में मैंने सिया
लिखता रहा
ताकि फूटती रहे कोंपलें
[दर्द के दरख़्त से
जिस्म और रूह में
अपने ही हाथों
जिसे मैंने बोया
लिखता रहा
ताकि तराश सकूँ
अपने ही बुत को
मेरे ख़्वाबों ने
मेरी आँखों में
जिसे हर रात संजोया
लिखता रहा.....लिखता रहा....

Wednesday, May 26, 2010

पुरवाई बहार की !


घूँट-- दर घूँट पीकर दर्द तेरे इंतजार का
रफ्ता-रफ्ता देख यूँ ही उम्र गुज़ार दी

खुद की हार का ग़म, या तेरी जीत की खुशी
हर शाम जिंदगी की मगर, यूँ ही निसार की

कोई आकर पूछेगा तो इतना ही कहेंगे नीरव
अबके ये बाज़ी बिना खेले ही हार दी

कोई एक ज़ख्म हो तो बताए दिल पर
नश्तर को भी अब तो, मिलती है लाचारगी

कोई सहेगा क्या हम- सा दर्द ए दोस्त
टूटे जब भी ऐसे हँसे गोया खुशी इज़हार की

वो तेज झोंके -सा आकर तोड़ गया, आखिरी पत्ता
दरख़्त का, हम ये समझे कि चली पुरवाई बहार की

Tuesday, May 25, 2010

कितनी क्षुद्र लेखनी मेरी


गिनती के गीत जुटा पाया
अपनी आँहों को उर में भर
तप कर, जलकर जीवन भर
संसृति सागर से गगरी में
दो-चार बूँद ही भर पाया
गिनती के गीत जुटा पाया
अलबेली मंजिल के दुष्कर पथ पर
कुछ फूल खिले कुछ काँटे थे
इनकी ही गंध चुभन को
अपनी साँसों में भर लाया
गिनती के गीत सुना पाया
मनचाहा यदि लगे तुम्हें कुछ
बिन पूछे ही ले जाओ
होगा कृतार्थ जीवन मेरा
किंचित भी यदि दे पाया
गिनती के गीत सुना पाया
इन्हें पढ़कर जी भर हँसना
मेरी भावुकता और नादानी पर
कितनी क्षुद्र थी लेखनी मेरी
सार की बात न कह पाया
गिनती के गीत सुना पाया।

Monday, May 24, 2010

कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ














जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
झूठे वादे करूँ कब तक
कब तक प्यार की कसमें खाऊँ
रस्में दकियानूसी निभाऊँ कब तक
कब तक झूठी बात करूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
जानता हूँ तू नहीं महबूबा मेरी
छोड़ कर साथ एक दिन जाएगी
तो फिर आज ही क्यों न कहूँ
लिव मी अलोन, क्यों बोझ सहूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
क्यों भला तुझको हँसा कर मैं दर्दों गम उठाऊँ
रूठ जाए तो तुझे मनाऊँ
क्यों नाज़ो-नखरे उठाऊँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ
देख दूर से वो सौत तेरी
मुझे करीब बुला रही है
ढूँढ ले अब तू भी साथी
अलविदा मैं तो चलूँ
जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ

Sunday, May 23, 2010

विलंबित खुशियाँ


क्या इनको लेकर करूँगा,

असमय जो तूने दी सौगातें
क्या इनको लेकर करूँगा।।
जब इनकी कुछ चाह मुझे थी.
जब इनकी परवाह मुझे थी,
उस समय तूने की बेपरवाही अब
क्या इनको लेकर करूँगा।।
खुशियों को गम में बदलकर,
ग़म को भी भोगा तनहा,
अब यदि नीरव नीर बहाएँ,
क्या इनको लेकर करूँगा।।
मेरे नेह का कोमल पौधा,
मुरझाकर जब सूख गया।
अब यदि मधुऋतु आए,
क्या इसको लेकर करूँगा।।
मेरे भावमय छंद सुन,
तू हरदम मुझ पर हँसा,
मैं मरणशय्या पर, तू इनको गाएँ,
क्या सुनकर इनको करूँगा।।
ना अब दे तू मुझे कुछ,
मैं कुछ ना ले सकूँगा,
तनहा, तगं हाथ रखा ताजिंदगी,
अब भी तनहा खाली हाथ ही मरूँगा।।

Saturday, May 22, 2010

छोड़ दी मैंने तल्खियाँ


कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
कितना पहरे बैठाए थे तूने
खुद पर खुद की आरजुओं पर
ये गज़ब कैसे हुआ मगर
तुझ पर तेरा ही न बस चल पाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
उसके आने की न मुझको खबर हुई
न सुराग, न आहट, न अहसास
मेरे पास आकर जब तक ये न बतलाया
तू जिसके ख़्वाबों में गुम, मैं उसी का साया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया
और जब वो मेरा मेहमाँ हुआ
छोड़ दी मैंने तल्खियाँ, पुरानी रंजिश
पहले उसके साथ एक जाम पिया, फिर
फिर से नग़मा भूले प्यार का गाया
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आया
तेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आया

Friday, May 21, 2010

कोई कैसे कहेगा, जिंदा है अब हम







तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
अब न उदास धड़कनें हैं न प्यास है
न तुम, न तुम्हारी याद, न खुशी, न ग़मन
मचलते अरमाँ है, न बदहवासी का आलम
अब तो हमारी तनहाई है और है हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न शरबती लब है, न मय छलकाती आँखें
न लहराते गेसू हैं, न खोजती किसी को नज़र
न तुम, न तुम्हारी खुशबू न साँसें है गर्म
अब तो हमारी रूसवाई हैं और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न उमंग है, न मस्ती, न ज़ुंबिश कहीं
न उदासी, खालीपन नहीं, बेचैनी भी नहीं
अजब सा वीराना है, अजब-सा है मौसम
अब तो अजनबी पन है और हैं हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हम
कोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हम
न रानाईयाँ है तेरे हुस्न की, न नशा
न तेरे जमाल की मदमाती अँगड़ाई है
न रूप की तपती धूप है, न गेसूओं की छाँव नरम
अब तो बेहया जिंदगी है, और हैं हम

Thursday, May 20, 2010

न गेसूओं को तुम हटाओ


यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
महकने दो साँसों में शबाब
खिलने दो गालों में गुलाब
छलकने दो आँखों से मधु
होंठो से बरसने दो शराब
यूँ ही छाई रहने दो ख़ुमारी
मदहोश हूँ न होश में मुझको लाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ
टिका रहने दो सर अपनी गोद में
शानों पर रेशमी ज़ुल्फें लहराने दो
मुझको मालूम है हक़ीक़त ख़्वाबों की मगर
यह ख़्वाब जिंदगी भर का हो जाने दो
ख़ामोशी से देखती रहो मुझको बस
हो सके तो मेरी आँखों में बस जाओ
यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँ
न गेसूओं को तुम हटाओ

Wednesday, May 19, 2010

.....और गज़ल कहे कोई

दिल गमों से चूर हो
और गज़ल कहे कोई
दर्द को छिपा ले कलेजे में
और गज़ल कहे कोई
सौ तल्खियाँ हो चेहरे पे
और गज़ल कहे कोई
ख़लिश न मिटती हो दिल की
और गज़ल कहे कोई
लरज़ते ज़ख्म हो दिल के
और गज़ल कहे कोई
टूटते लफ़्ज हो जुबाँ पर
और गज़ल कहे कोई
बहुत कहने को हो अरमाँ
और गज़ल कहे कोई
आखिरी लम्हा हो जिंदगी का
और गज़ल कहे कोई
वसीयत में लिख जाए गज़ल
और गज़ल कहे कोई

Sunday, May 16, 2010

मुझसे सहा जाता नहीं...


बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
अंर्तमन में है पीड़ा सभी को
बिन पीड़ा जीवन कोई पाता नहीं
कैसे कहूँ, डाल लो आदत सहने की
आशावादी यह कह पाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
माना तुम्हारी परिभाषा से
यह दुख है सुख का साधन
एक बात तुम भी मानो
यह साधन साध्य तक पहुँचाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
कैसे कहूँ तुम्हारा कल्पना दर्शन
कहीं-न-कहीं दोषयुक्त सखे
स्वयं मेरा अनुभव दर्शन भी तो
मुझको छिद्रांवेषण सिखलाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं
प्रकृति के नियमों पर चलो
रोने से पहले जी भर हँस लो
नियति को जो मंजूर वह जाने
कर्म से विमुख भी तो रहा जाता नहीं
बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना
साथी मुझसे सहा जाता नहीं

Saturday, May 15, 2010

तब हुई कोई कविता

विरही के यादों के मौसम में
रिमझिम बरसते सावन में
दो बूँद मिली हो अश्रु की
ऐसा संगम जब-जब हुआ
तब हुई कोई कविता
हिरण-से इस चंचल मन ने
स्मृति वन में दौड़ लगाई
कहीं ठहर दो लम्हे काटे
ऐसी जब कोई ठौर मिली
तब हुई कोई कविता
तनहाई के सूने क्षण में
बेचैन के दर्द भरे आलम में
पायल की झंकार बजी कोई
वंशी कहीं मधुर सुनी कोई
तब हुई कोई कविता
भीड़ भरे इस जंगल में
बेगाना हर शख्स मिला
सुकुन कितना मिला नीरव
जब कोई अपना-सा मिला
तब हुई कोई कविता
कल्पना ने जब ख्वाब बुना
कवि के खयालों में लिपट कर
ऐसा अद्भुत मिलन हुआ
खुशी रोई दर्द से लिपटकर
तब हुई कोई कविता

मैं दागदार चाँद हूँ गगन का


रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह से प्रणय हुआ संभव कहीं है
संस्कार मुझसे छूटने वाले नही
और तू नहीं लाज तजना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
इस तरह आराधन भी अच्छा नहीं है
मैं निरा-निपट पाषाण और
तू देव मूरत गढ़ना चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
चकोर-सी यह अभिलाषा सच्ची नहीं है
मैं दागदार चाँद हूँ गगन का और
तू निर्मल चाँदनी का स्नान चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है
अपराधी पर इतना विश्वास भी अच्छा नहीं है
मैं गुनाहों का देवता ठहरा और
तू मुझसे पुण्य कर्म चाहती है
रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती है

Friday, May 14, 2010

भूल गया हूँ, तब से खुदा को


रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से
गम बढ़ता है जीने से
खलिश मिटती है पीने से
पीकर एक लम्हा जीना है अच्छा
बिन पिए बरसों जीने से
कैसे रिंद हो जो डरते हो
नशीली नजरों से पीने से
काफिर मुझको कहते हैं, लोग
बंदगी मेरी, तेरे हाथों पीने से
भूल गया हूँ, तब से खुदा को
लगा जबसे हूँ तेरे सीने से
रोको चाहे मुझको जीने से
मत रोको यारों पीने से

Thursday, May 13, 2010

तब तलक गम को सहेजूँ


दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
जार-जार रोता है दिल
रक्तिम है हर कोना
कोई मरहम, मैं पाऊँगा
मुश्किल लगता ऐसा होना
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
तज इसे सकता नहीं मैं
साथ निभ सकता नहीं
मजबूर है हालात इतने
खुल कर रो भी सकता नहीं
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
काश ऐसा हो सके कि
फैल जाए दामन मेरा
फिर जी भर समेटू
बचा जो दर्दों गम तेरा
दर्द को समेटू कहाँ तक
कब तलक गम को सहेजूँ
चल रहा हूँ यह सोचकर
वह मुकद्दस वक्त आए
दूर कहीं किसी क्षितिज पर
मिलन तुझसे हो ही जाए
दर्द को समेटू वहाँ तक
तब तलक गम को सहेजूँ

Monday, May 10, 2010

मधु ऋतु


दूर कहीं कोयल बोली
वीरान पड़ा था कब से गुलशन
तितली, भँवरे, माली थे चुप
तनहा-तनहा लगता मौसम
ऐसे में यह मधुबोली
दूर कहीं कोयल बोली
कलियाँ मुस्काएँगी अब
बहारें आएँगी गुलशन में
भँवरे फूलों पर मँडराएँगें
होगी फूलों संग आँख-मिचौली
दूर कहीं कोयल बोली
खुशनुमा होगा हर लम्हा
मधु ऋतु होगी बगियन में
खुशबू से सराबोर होंगी साँसें
रंगों की सजेगी रंगोली
दूर कहीं कोयल बोली
फूलों के संग होगी बातें
कलियों संग कटेगी रातें
स्मित होगी हर अधर पर
नयनों में होगी  नीरव बोली
दूर कहीं कोयल बोली

मिलन यामिनी का सुख-सार भूला

मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
मादकता भूला साकी नयनों की
मधु की मदहोशी भूला
प्यालों की खनक पायल झंकार
मधुबाला की डपट-दुलार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
कंचन देह की द्य़ुति भूला
साँसों में महकता कचनार भूला
चपलता भूला मृग नयनों की
ओंठो से हुआ अभिसार भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला
याद उसे कब कर पाऊँगा
याद उसे कब आऊँगा
दूर बैठा कहीं, मीत मन का
मैं उसे, शायद वह भी है मुझको भूला
मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूला

Friday, April 30, 2010

अभिसारिका बिन कैसा मिलन

अभिसारिका बिन कैसा मिलन

कैसी मिलन की यामिनी
कब तक रचूँ शब्द देह
कब तक कल्पित अभिसार करूँ
कब तक रचूँ मूर्ति कल्पना की
कब तक रचूँ कंचन कामिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
कैसी सुहानी रात है यह
कैसी धवल है चाँदनी
मन वीणा के तार कह रहे
छेड़े कोई आकर रति रागिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी
प्रीत का कोई गीत गाए
संग प्रिया के मन भी गाए
खोजती है जिनको निगाहें
आ जाओ मधुबन की मालिनी
अभिसारिका बिन कैसा मिलन
कैसी मिलन की यामिनी

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