Thursday, May 26, 2011

माथे पे लगी ये रोशनाई


देर तक सोचकरभी न लिख सके कुछ
कोरे कागज की रंगत ये बता देती है
तेरा हाल मुझको तेरी खामोशी बता देती है
तेरी कितनी बातें मुझे तन्हाई सुना देती है
एक मुद्दत हुई देखे को तुझेअब तो आजा
दूर से आती हवामुझको ये सुना देती है
चाहा कि लिखा जाए कोई खत
हश्र पुर्जा-पुर्जा हुई ये चिंदियाँ बता देती है
परेशानी बढ़ी ज्यादा तो उठाई होगी कोई कलम
तेरे माथे पे लगी ये रोशनाई बता देती है

जो 'था' के लिए, जो 'है' की तरफ से


कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
दूर-दूर तक खामोशी
और बिखरा सन्नाटा होना
कितना अच्छा लगता है
शोर-गुल से काटकर
खुद को
कलमनुमा
सन्नाटे में बोना
फिर सन्नाटों की जमीन से
कविता बनकर निकलना
कोंपल-दर-कोंपल
फूटकर
कभी उदासी, कभी खुशी
कभी गम के मौसम के बीच
फूलना-फलना
पल्लवित होना
कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
खुले आकाश में दिन भर उड़ते फिरना
कभी बादलों से, कभी इंद्रधनुषों से
कभी बारिश, कभी धूप से
गुफ्तगू करना
दिन भर यायावर की तरह फिरकर
वापस नीड़ में लौटना
साथ लाई यादों में से
तुमको चुनना
और घोंसलों में सजाना
सजाते हुए खो जाना
खोकर तुम्हारे पास होना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
और अकेलेपन के इस बीहड़ में
किसी खोह का होना
जहाँ शांति के संगीत का वास
सुनकर जिसे तुम्हें पाना
खुद को खोना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
वीरानों की मरू में
प्यासे मृग-सा भटकना
दौड़ना-दौड़ना निरंतर दौड़ना
न पाना
हार न मानना
और दौड़ना
और यकायक
ओएसिस पाकर
विस्मित होना
मारे खुशी के
अनुभूति शून्य होना
तृप्ति की कल्पना से घबराकर
रूकने से पहले ही
दौड़ और तेज कर देना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
कितना अच्छा लगता है बूँद-बूँद रिसकर
दो किनारों के बीच
धारा-सा बहना
और
सागर में मिलने से पहले ही
प्रवाह के विरुद्ध तैरकर
वापस स्रोत तक पहुँचना
और फिर बहते जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
बिखरे पन्नों के बीच
खुद को पाना
सहेजना, संभालना
और क्रमबद्ध करते जाना
अनायास ही कहानी-सा बन जाना
और किसी खास किरदार में
तुमको पाना
भीड़ सी जुट जाना
और भीड़ के बीच
तुमको अलग-अलहदा अकेले पाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
डूबती शामों के साथ
विदा होते सूर्य को देखना
उड़ते पखेरूओं को बिनना
उनके कलरव को सुनना
भूली कोई बात याद आ जाना
कभी हँसी, कभी खुमार, कभी उदासी छा जाना
देर-देर तक देखना आसमान को
उगते तारों में से अपना तारा पहचानना
और खुद ही से
घंटों बात किए जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
घड़ी का बंद हो जाना
समय का रूक जाना
तारीख और दिन की गिनती को
केलैंडर और घड़ी से उतारकर
स्पंदनों, धड़कनों से नापना
सुबह, शाम, दोपहर और रात
बस यही गिनती दोहराना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
सुबह देर तक सोए रहना
देर तक रातों को जागा करना
सूरज चढ़ आना सूरत पर
गर्मी के मारे नींद खुलना
अभी-अभी आए स्वप्न को देर तक
याद किया करना
जिसमें कहा हो तुमने
उठिए जनाब क्या कुछ और नहीं है करना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना

Tuesday, May 24, 2011

वो बच्चा है सचमुच



वो नहीं डरता है मुझसे
बिल्कुल नहीं
जब वो अपने मूड में होता है
मेरी धमकियाँ, मेरी आँखें
मेरी डाँट और मेरे आँसू तक
सब बेअसर होत हैं, उस पे
बस वो करता है, उधम ढेर सारी
वो नहीं रूकता, बिल्कुल नहीं रूकता
मेरे लाख कहने पर भी
पर कभी-कभी
वो डर जाता है मुझसे
बहुत डर जाता है
रूआँसा हो जाता है
मेरी जरा-सी बात पर
वो बच्चा है सचमुच
बड़ा बच्चा

Monday, May 23, 2011

जीना मुहाल है


उफ् ये बंदिशें
ये ताने ये तंगियाँ
जीना मुहाल है
मुझे मयस्सर होगी
कब तुम
कब मिलेगी
तुम्हारे साथ तनहाइयाँ
जीना मुहाल है
तेरे गेसुओं की छाव
तेरी शोखियाँ
कब बजेगी शहनाइयाँ
जीना मुहाल है
अब मुश्किल है इंतजार
मुश्किल हर पल है
अब मुश्किल है जीना
जीना मुहाल है

अपनी नावें, अपने द्वीप


सागरिक
छोड़ो मोह
उन कूलों का
जिन पर लिखी
लीक की भाषा
साहस हो तो खोजो
जीवन बीच भँवर में
देख थके ना तेरी बाँहें
तुझे सर्जना है
नव-परिभाषा

Sunday, May 22, 2011

अनुमान


बहुत
शिद्दत से
यह लगने लगा है
अब मुझे
कि खुलेंगी
सारी गुत्थियाँ
झर जाएँगें, सब अवसाद
लंबी खामोशी के बाद
फिर से
लिखूँगा मैं कथा-कविता-उपन्यास




Friday, May 20, 2011

ज़िद


जिंदगी तुझसे माँगी है
 सर छुपाने को छत
खड़े रहने को जमीं
और साँस लेने भर हवा
खुशी से दे तो अहसान
वरना मेरी तो जरूरत है
ले लूँगा किसी भी तरह
बिना कोई दिए कीमत

Thursday, May 19, 2011

ऐसा भी वक्त आता है

बिखरे बाल
मन उदास
कभी रूकी, कभी तेज चलती साँस
न खुद का न किसी और का
न तन्हाई का खयाल
रूके हुए सृजन का
उलझती हुई राहों का दुख
बढ़ती हुई समंदर की प्यास
छटपटाती हुई आत्मा का त्रास
पेशानी पे सिलवटें सोच की
आँखें दूर कहीं
मगर टिकी हुई नहीं
उमड़ती घुमड़न का शोर मचाता ज्वार
लहरों से टकराते
बेतरतीब विचार
कभी-कभी
ऐसा भी वक्त आता है
जिंदगी में

Wednesday, May 18, 2011

मंजूषा


सत्य को नहीं
सहेजूँ यदी शब्दों में
तो जल्द ही मुझसे
वह खो जाता है
बैठ जाता है कहीं
तलहटी में
मन एकाकी उपर
रह जाता है
कहानी, कविता
ये सब मंजूषा है

Tuesday, May 17, 2011

कब? आखिर कब!


धूप-छाँह के अंतहीन सिलसिले में
कोई गहरी छाँह पर
दिन-रात के घूमते चक्र में
अपनी-सी एक शाम कब
बासंती, हेमंती, पतझड़ी मौसम में
प्रतीक्षित कोई कोंपल पर
ऊँची-नीची स्वरलहरियों के कोरस में
अपना कोई छंद कब
यह सब जाने कब
अभी तो बस
दौड़, प्रतीक्षा, संघर्ष
और गहरी, गहराती उदासी सब

Monday, May 16, 2011

कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं


पुस्तक प्रदर्शनी में
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती हैं
न इन्हें कोई खरीदता है
न पढ़ता है
न समझता है
(देखने वाले भी होते हैं इक्के-दुक्के ही)
फिर
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है
कवि
इतना असंपृक्त क्यों होता है
न उसे कोई सराहता है
न दुलारता है
न समझता है
(जो समझते हैं, वो भी उपरी तहों में)
फिर
कवि कविताएँ क्यों लिखता है
कवि इतना स्वांत सुखाय कैसे होता है
कविताएँ इतनी महँगी क्यों होती है

Sunday, May 15, 2011

दुनियादारी


संपूर्ण दिवस में एक क्षण
एक क्षण
जब अपना प्राकृत रूप पाता हूँ
तो देखता हूँ अपने मुखौटों को
जो नए और आकर्षक
ढ़ंग से सृजन किए हुए हैं
मेरी महत्वाकांक्षाएँ
देखता हूँ, ओढ़ रहा हूँ
सुबह की व्यस्तता का मुखौटा
स्वप्निल नींद से जाग जाने की झुँझलाहट
और दिन भर की
व्यस्तताओं की सूची
मेरे माथे की शिकन तक
लिखी हुई
आँखें उनींदी-सी
अभी भी रात के सपनों में
खोई-खोई
तभी याद आता है
आज का दिया हुआ हुआ
अपांइटमेंट
वही तोड़ता है मेरी काहिली
और बना देता है
मुझे मशीनी
थोड़ी देर बाद
जब बाहर कदम रखता हूँ
तो देखता हूँ
आईना
जमे हुए बालों से लेकर
जुराबों के रंग तक
सभी कुछ ठीक है
मगर
तभी आईने के अंदर से
कोई हँसता है
व्यंग्यपूर्वक
विद्रूप हँसी
मैं बलपूर्वक दबाता हूँ उसे
और चल देता हूँ
अभी थोड़ी देर बाद
किसी से मिलना जो है

Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



Wednesday, April 20, 2011

केसरिया है प्रेम म्हारो

एक फूल में
उगते हैं
दो फूल केसर
एक कहलाता है केसर
खुशबू, स्वाद, सौंदर्यवर्धक
दूसरा
कहलाता है घास
भाई लोग इसे
केसरिया रंग और खुशबू में
रंग, बना देते हैं केसर
असली-सा
कसौटी पर गर न चढ़े
तो कोई जान नहीं पाता असलियत
बिकता है ज्यादा नकली, असली से
मगर जब होती है पहचान
तब असल पाता है
अपनी जगह और मान
...............
प्यार जो मैंने किया है तुम्हें
काश! कभी कसौटी पर चढ़े
तब हो पहचान

Tuesday, April 19, 2011

सोनमर्ग

आए ढेरों मिसरे
लिख न पाया
एक भी
नज़म
एक भी गज़ल
बस उठा लिए कुछ बीज
जिन्हें
बनाने की कोशिश करूँगा
चिनार, सफेदा, देवदार, चीड़
या जो भी कुछ...

Monday, April 18, 2011

रोमांस

पत्ते चिनार के
रखती है सफ़ों के बीच
एक लड़की
गोकि याद रहे
चिनार बाग और कश्मीर
उन सफ़ों को खोलने का
वक्त भले ना हो
उसके पास



Sunday, April 17, 2011

पहलगाम

कल-कल लिद्दर
ठंडी छाँह
दसियों रंग
ढेरों फूल
महँगी रोटी, सस्ती धाम
जितने घोड़े, उतनी गाड़ी
अब तो नहीं
पहले होगा गाम
पहलगाम


Thursday, April 14, 2011

गुलमर्ग टॉप

बर्फ पिघलने से
उपजी
दलदली जमीन किनारे
उगा है जीवन
पीले-बैंजनी
नन्हें-से फूल
जीवन कहाँ-कहाँ
कैसे-कैसे पनपता है

Tuesday, April 12, 2011

बहता अम्रत

यहाँ पहाड़ों पर
खेतों के
ढलवाँ किनारे
दौड़ता है
बर्फ से निकला पानी
मैं कलपता हूँ मैदानी
हाय! व्यर्थ ही बहा जा रहा है पानी

Monday, April 11, 2011

डल किनारे

दौड़ रहा है
जीवन
बहते पानी-सा
और मैं किनारे

Sunday, April 10, 2011

गुलमर्ग

दूर से चमकती
दीखती थी बर्फ
श्वेत-धवल चाँदी-सी
पास पहुँचे
लिए धौंकनी साँसें
और पसीने से तरबतर
तो मिट्टी सनी बर्फ
गंदला पानी
और कीचड़ निकला
धत् तेरे की
गुलमर्ग भी
जिंदगी-सा
भ्रम औऱ नीरस निकला

Saturday, April 9, 2011

श्रीनगर ( 07-06-07 )

जल्द होती है सुबह
देर तलक रहती है रोशनी
मौसम फिर भी ठंडा और खुशगवार
शायद यही बात
गुजरती हो दुश्मनों को नागवार
फैलाते थे दहशत
करते थे मासूमों पर वार
अब
सबकुछ ठीकठाक
पुरसुकून, खुशमिजाज
ओ कश्मीर! तुझपे जाँनिसार

Friday, April 8, 2011

पटनीटॉप

दिन भर में मुझे मिला
थोड़ा-सा एकांतिक अनुभव
खुशबू चीड़ की
चीड़ की एक टहनी
और चीड़ की छाल
झुंड बनाकर बैठे कश्मीरी
उनके बच्चे
मासूम बच्चियाँ
सेब के रंग-से
रंग-बिरंगे फूल
चीड़ की सीकों की धूल
भरे हुए पाँव-पिंडलियाँ
धौंकनी साँसें
गुलाब के गुच्छों वाली हैज
शांत-एकांत वाली सेज
और रह गया – बच गया जो
सनासर, टूटे पेड़ों के तनों के
बीच से निकलता हो अमिता का सर
ऐसा फोटो लेने का अवसर
और माईलस्टोन-सा तुम्हारा कथन
सोच के होती है हैरानी कि स्साला ! पसीना कैसे आता होगा?

Wednesday, April 6, 2011

एंथेलियम

अभी-अभी चाँद के चारो ओर
रोशनी का एक घेरा देखा
अजीब-से रोमांच के साथ सोचा
महान आत्मा
जन्म लेती हो , न लेती हो
इस समय
दिव्य क्षण के जरूर
निकट होते है हम

Tuesday, April 5, 2011

ऐ सपने !

मैंने तो देख लिया
ऐसा सपना
जो कभी पूरा न होगा
मगर
कभी नहीं
ये निर्धारण कैसे मेरा
ये तो सपने के ही हाथ
कि वह वही रहे
या साकार हो जाए
ऐ सपने !
मैं तो तुझसे यही कहूँ
तू कभी पूरा न हो



Friday, April 1, 2011

ओ निर्माता

स्वयं को
अकेला रखने का मैंने
एक अजब तरीक चुना
पहले तुमसे जुड़कर
काटता रहा सबको
हर रिश्ते हर बंधन को
और जब सबसे मुक्त हो गया
तो तुमसे भी अलग हो गया
इस तरह मैं
पूरी तरह
मैं रह गया

Monday, March 28, 2011

हम अपरिभाषित

व्यक्तित्व से अस्तित्व तक की
देते रहे हम परिभाषा
बाँधते रहे उन्हें
कभी शब्दों से
कभी चुप्पियों में
कभी शब्द और सन्नाटे के अंतरालों में
किंतु स्वयं की न तो कभी दी परिभाषा
न बाँधना भाया किसी से
तो खुद अपरिभाषित
अपरिमित
निर्बंध रह गए।

Sunday, March 27, 2011

खोजने निकला तो

खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर...
कोई चंचल मिला, कोई शांत मिला
कोई खुश मिला, कोई अशांत मिला
कोई बौराया, कोई पगलाया-सा
कोई उदास, कोई निराश मिला
खोजने निकला तो
कोई प्यारा-सा, कोई न्यारा-सा
कोई जीता-सा, कोई हारा-सा
कोई उत्साहित, कोई विथकित
कोई अनुरक्त, कोई विरक्त
कोई यायावर, कोई सैलानी
कोई रमता जोगी, कोई तपी-ध्यानी
खोजने निकला तो
एक तुम ही न मिले
कहीं
ओ अभिमानी
ओ तेजोमय
ओ प्रभामय
ओ अमित स्वरूप
ओ मुझ मृग की तृष्णा के झिलमिल पानी
खोजने निकला तो
मिले तो बहुत
मगर एक तुम ही मिले



Saturday, March 26, 2011

ओएसिस की प्यास

जब कभी किसी कारण
तुम्हारी आंतरिक तन्मयता
हो जाती है भंग
तो मन पर एक अनजाना बोझ
छाने लगता है धीरे-धीरे
जो बढ़ता जाता है क्रमशः
और तुम नीरस यथार्थ के तंग रास्तों पर चलने को
मजबूर हो जाती हो
और छोड़ बैठती हो
मूल शांत व्यक्तित्व
कभी-कभी सोचता हूँ
बेचारा आम आदमी
कतई दोषी नहीं
अपने ढर्रे के जीवन से उपजे
उथले और सतहीपन के लिए
क्योंकि उसके पास तो कोई
आंतरिक स्रोत भी नहीं
जहाँ तर-तृप्त होकर
वह शांत हो सके



Friday, March 25, 2011

रचना में रहूँ तो मैं 'मैं' कैसे रहूँ

लिखूँ तो मैं केवल पुरुष कैसे रहूँ
क्योंकि मुझे निबाहनी है
मेरी ही नहीं
तुम्हारी भी कथा... व्यथा और अनुभूतियाँ
केवल अपने सत्य के सापेक्ष कैसे रहूँ
क्योंकि मैं तुम्हारे भी सापेक्ष हूँ
या तो स्वयं से भी निरपेक्ष रहूँ, तटस्थ रहूँ
या तुमको भी
रचना में स्वर दूँ
रचना में रहूँ तो
मैं
मैं कैसे रहूँ
ओ संगिनी
मैं तुमको संग ले
कुछ और ही हो जाऊँ
जब रचनारत होऊँ

Thursday, March 24, 2011

जल...जल...जल..

मुझको अर्घ्य में जल नहीं अग्नि रूचति है
सूर्य! क्या तुम अपनी देय पुनः स्वीकारोगे
कष्ट...कष्ट...कष्ट
ज्वालामुखी की भीतरी उबलन-सा
मैं उबला हूँ
लाख तपा हूँ
जला, झुलसा, पिघला हूँ
बाहर सदैव निर्मल जल-सा ही
मगर मैं उमड़ा हूँ
जल...जल...जल..
सिंधु !  क्या तुम अपनी विवशता पुनः स्वीकारोगे
अपनी ही खोज में अनुक्षण
प्रलय-सी लंबी अँधेरी गुफाओं में
कितनी बार मैं भटका हूँ
जब भी कोई रत्न पाया
अर्पित कर इंद्रधनुष-सा मैं खिला हूँ
संघर्ष... संघर्ष... संघर्ष...
जीवन क्या तुम अपनी हठ पुनः स्वीकारोगे

Sunday, March 20, 2011

समय... समय... समय...

कभी सघन

कभी विरल
कभी सुनहरा
कभी बदरंग
कभी स्याह
कभी सतरंग
...............
मैं रंगों की नहीं
समय की बात कर रहा हूँ
कभी सापेक्ष
कभी निरपेक्ष
कभी घोर अँधेरे-सा
कभी रोशन किरण-सा
कभी रेशमी-मुलायम
कभी सख़्त फौलाद
अजीब गोरखधंधा है समय
कभी स्वर्णमृग बन जाता है
कभी अमृत-कलश बिंधवाता है
कभी लड़ता है युद्ध
कभी निष्कासन
कभी जल-समाधि दिलवाता है
समय
कभी बँट जाता है युगों में
कभी सतत चलता जाता है
कभी हारता है खुद से
कभी सबको हराता जाता है
समय
अजीब, अद्भुत, अनोखा
अनिर्वचनीय है समय
समय... समय... समय...



Friday, March 18, 2011

अनोखी है विषयों की कायनात

बड़ी अनोखी है विषयों की कायनात
इस ब्रह्मांड में सब
एक के, एक सबके
चक्कर लगाते हैं
राजनीति घूमती है अर्थ के गिर्द
अर्थशास्त्र राजनीति के
दोनों समाजशास्त्र के
और समाजशास्त्र दोनों के
ये सब इतिहास के
इतिहास, भूगोल के
भूगोल, भौतिकी के
भौतिकी घुमाती है
रसायन और जीव विज्ञान को
दोनों गणित के
और गणित
गणित संगीत के
संगीत
नृत्य के
नृत्य साहित्य को घुमाता है अपने चारों ओर
साहित्य सौंदर्यशास्त्र और मनोविज्ञान के
और ये दोनों(!)
दर्शन घुमाता है, इन्हें अपने चारों ओर
अरे यह भँवरों का भँवर
मैं फँस गया हूँ इसमें
बड़ी निराली
दुनिया है विषयों की
यहाँ सब घूमते हैं
एक-दूसरे के गिर्द
जैसे ढेर सारे घूमते लट्टू
परिक्रमा करते, करवाते हैं
दूसरे लट्टूओं की
एक-दूसरे से

Thursday, March 17, 2011

ब्यास

हर पर्वतीय नदी
उतर आती है
पर्वतीय स्त्री-पार्वती-में
निरंतरता
निस्संगता
और निर्झरता में
...........................
पहाड़ी पुरुष मगर
नदी में पड़े
विशाल शिलाखंड-सा होता है
कुनमुनाता भी है तो
बड़े जतन में

Wednesday, March 16, 2011

कुल्लू

ढिल्लू
ढूल्लू-मूल्लू
सौंदर्य की दृष्टि से निठल्लू
ब्यास का किनारा न हो
तो एकदम
हुड़कचुल्लू
कुल्लू

Tuesday, March 15, 2011

वशिष्ठ

प्रतिभाशाली सुकुमार राम को
तुमने यहीं
मनाली में
अपने बर्फीले फौलाद में ढाला होगा
तभी तो उन्होंने
राक्षसों के सर्वनाश का
व्रत ले डाला होगा

Monday, March 14, 2011

हिडिंबा

तुम तो राक्षसी थीं
अब तक
हमारे लिए
मायावी राक्षसी
जिसने रचाया था
महाबली भीम से विवाह
और घटोत्कच जन्मा था
शूरवीर पुत्र तुम्हारा
(मगर तुम राक्षसी ही रहीं थीं हमारे लिए)
मनाली में मगर
तुम पूजी जाती हो
देवी हिडिंबा के रूप में भव्य मंदिर है तुम्हारा
.................
सच है भूगोल बदलने से भी
कभी-कभी बदल जाता है इतिहास का नज़ारा
तभी तो मनाली को
अपने सबसे श्वेत बर्फीले खूबसूरत रूप में हमने यहीं निहारा

Saturday, March 12, 2011

सच और सपना...

मैदानों में बैठकर
गर याद करो
गिरती बर्फ को
तो लगता है
एक सपने-सा
............
अविश्वसनीय हो जाता है
भोगा हुआ सच भी
कभी-कभी
घोर संकट में
नास्तिक के राम-नाम जपने-सा

Friday, March 11, 2011

श्वानाली


पांडवों के साथ
युधिष्ठिर के संग
अंतिम शिखर तक
साथ गया था श्वान...
मगर
आया वह सबसे पहले
मनु महाराज के साथ
तभी तो
मनु-आलय
मनाली में
दिख जाती हैं
सर्वत्र
उसी आदि श्वान की
संतान

Wednesday, March 9, 2011

हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

झरनों की कल-कल-सी तुम
बर्फ की तरह झरती तुम्हारी हँसी
चीड़ों से आती गंध-सी सुवास
कहीं तुम्हारा साथ न छूट जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

दिन-रात कँपकँपाती यह ठंड
गर्म चाय के गुनगुने स्पर्श-सा सुख
तमाम गर्म कपड़े और गर्म टोप
मैदान में जाते ही यह सब न बीत जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

ऊनी दस्ताने और मफलर ऊनी
कांगड़ी और अलाव की आँच-सी तुम
दूर शिखरों पर जमी बर्फ
सूर्य की किरण से न पिघल जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

नवविवाहित जोड़ों का हनीमून
बाँहों में बाँहें डाले घूमते युगल
मदहोश कर देने वाला समां
ये मादक माहौल न गुम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

कुनमुनाती-सी रजाई से निकलती
बाहर जाने के नाम पर बिसूरती
बाहर निकलते ही बह निकलती
गर्म सोतों-सी यह गर्मी न जम जाए
हाय! कहीं ये स्वप्न न बीत जाए

Tuesday, March 8, 2011

मनाली

पल-पल
बदलता है मौसम जहाँ
मैंने दो दिन में यहाँ
मौसम देखे चार
पहले ठंड-सा लाचार,
फिर बारिश-सा बेज़ार,
 बर्फ-सा खुशगवार
और धूप का बाज़ार



Monday, March 7, 2011

मनाली में धूप


सूर्य को देवता
पहाड़ियों ने माना होगा
सर्वप्रथम-पहली बार
खासकर जहाँ गिरती हो गार
...............................
अंगार को देवता
वे ही तो करेंगे
स्वीकार
...........

-

Saturday, March 5, 2011

देवदार से झरती बर्फ

देवदार की पर्णहीन टहनियों से
बर्फबारी रूकने के बाद
झरती बरसती है
फूलों-सी बर्फ
जैसे गिरते हैं
बसंत से पहले
पत्ते इमली के
झर-झर-झर
थोड़ी-सी धूप
क्षणिक बसंत ले आती है
मनाली के पहाड़ पर......

बीहड़

अदभुत हो तुम भी
गोवा जाकर
हो जाती हो
गोवन
पहाड़ पर पहुँचते ही
हो जाती हो
पहाड़न
मैदानी हो जाती हो
जाकर
मैदान
..............
बीहड़ों में कभी
गई नहीं हो
मन में फिर
कैसे, इतना, कभी-कभी
उग आता है
बीहड़

Thursday, March 3, 2011

बर्फ का सर्द सच

सफेद, खूबसूरत
गंधहीन
रूई-सी
फाहेदार
बर्फ
थोड़ी देर बाद हो जाती है
दलदली
फिसलते हैं
गलते-जमते हैं
जूतों के अंदर
पैर और खून नसों में,
बर्फीला कीचड़ और ठंडा पानी
मिलकर
रचते हैं
सड़कों पर
सर्द बुखार
जिसका असर
रीढ़ से होकर कभी-कभी
मन तक जाता है...

Wednesday, March 2, 2011

रेत बादलों की-16 फरवरी

समुद्र के पास से आते हुए
हट में
जैसे
सब जगह से गिरती-झरती थी रेत
वैसे ही यहाँ
होटल में आने पर
सिर-बदन-कपड़ों से
झरती है बर्फ
रेत बादलों की
..........

Tuesday, March 1, 2011

तन मनाली - मन मणिकर्ण

बर्फ...बर्फ...बर्फ
प्रकृति के साथ हो जाता है
सब कुछ वैसा ही
नाक, मुँह, कान, बाल
ग्लास काँच का, लोहे का पाईप
बिस्तर, यहाँ तक कि गीज़र भी
(कैसे अपने रंग में रंग लेता है मौसम)
.................................................
मुँह से मगर निकलती है
भाप
कहती है फुसफुसाकर
- करती है आश्वस्त – बाहर से हो गए हो
मौसम की तरह सर्द
मगर मन तो मणिकर्ण है
गंधक के उबलते पानी की तरह
सच है
तन मनाली हो गया हो भले
मन तो शाश्वत मणिकर्ण है



Monday, February 28, 2011

मनाली

जैसे आए हों हम किसी पहाड़ की बारात में
बाराती की तरह
उतरते ही स्वागत में
बरसने लगी बर्फ
सफेद, गंधहीन फूलों की तरह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।